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समुद्र में ग़ायब हुए 500 से ज़्यादा रोहिंग्या, आख़िर उनके साथ क्या हुआ?
- Author, जोनाथन हेड
- पदनाम, दक्षिण-पूर्व एशिया संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
दो नावों पर सवार क़रीब 530 रोहिंग्या शरणार्थी 29 जून को म्यांमार के रखाइन राज्य से रवाना हुए थे.तब से उनका कोई पता नहीं चला है.
यह संख्या लगभग एक बड़े यात्री विमान में सवार लोगों के बराबर है, जो मानो अचानक ग़ायब हो गए हों. बहुत संभावना है कि दोनों नावें समुद्र में डूब गईं.
इस इलाक़े में मानसून शुरू हो चुका है और समुद्र में ऊंची लहरें उठ रही हैं. जिन नावों में वे लोग सवार थे, वह आमतौर पर पुरानी मछली पकड़ने वाली नौकाएं होती हैं.
अक्सर इनकी हालत समुद्री यात्रा के लायक नहीं होती और इनके इंजन भरोसेमंद नहीं होते.
यह भी आशंका है कि इनमें सवार बहुत कम लोग बचे होंगे, या शायद कोई भी नहीं बचा हो. माना जा रहा है कि यात्रियों में क़रीब आधी संख्या महिलाओं और बच्चों की थी. लेकिन सचाई क्या है, यह शायद कभी पता नहीं चल पाएगी.
विद्रोहियों के इलाक़े से रवाना हुए थे रोहिंग्या
रखाइन राज्य कई वर्षों से संघर्ष की चपेट में है. विद्रोही संगठन अराकान आर्मी ने म्यांमार की सेना को राज्य के ज़्यादातर हिस्सों से बाहर कर दिया है.
उसने राज्य की राजधानी सित्वे में स्थित आख़िरी बड़ी चौकी को घेर रखा है. सित्वे तक अब केवल हवाई या समुद्री रास्ते से ही पहुंचा जा सकता है. सेना ने इलाक़े में लगभग सभी दूरसंचार सेवाएं भी बंद कर दी हैं.
रोहिंग्या लोगों की स्थिति सुधारने के लिए काम करने वाले संगठन अराकान प्रोजेक्ट की प्रमुख क्रिस लेवा यह जानने की कोशिश कर रही हैं कि इन दोनों नावों के साथ क्या हुआ होगा.
लेकिन यह काम बेहद मुश्किल है. अब उनके पास सित्वे या सिन टेट माव गांव में ऐसे संपर्क नहीं बचे हैं, जिनसे वे सीधे जानकारी ले सकें.
सिन टेट माव वही गांव है जहां से ये नावें रवाना हुई थीं और फ़िलहाल यह अराकान आर्मी के नियंत्रण में है.
फिर भी, दूसरे स्रोतों और अलग-अलग जानकारियों के आधार पर उन्हें भरोसा है कि दोनों नावें 29 जून को ही निकली थीं. एक सुबह रवाना हुई थी, जबकि दूसरी बाद में दिन के समय में निकली थी.
उनका कहना है कि इन नावों का रुख़ म्यांमार के दक्षिणी तट की ओर रहा होगा, जहां इनमें सवार लोगों को उतारा जाना था.
इसके बाद उन्हें सड़क मार्ग से, जंगलों में बने अस्थायी ट्रांज़िट शिविरों से होते हुए थाईलैंड के रास्ते मलेशिया की सीमा तक पहुंचाया जाना था.
आमतौर पर यात्रियों के परिवारों को एक हफ़्ते या 10 दिनों के भीतर उनकी ख़बर मिल जाती है. लेकिन लगभग तीन हफ़्ते बीत जाने के बाद भी उनकी कोई सूचना नहीं मिली है.
बांग्लादेश के अधिकारियों को समुद्र से बहकर आई एक महिला का शव मिला है. वहीं, इरावदी डेल्टा और मोन राज्य के तट के बीच मछली पकड़ने वाले मछुआरों को नौ दिन बाद कई अन्य शव भी मिले.
क्रिस लेवा का मानना है कि ये सभी संकेत बताते हैं कि दोनों नावें डूब गईं. इनमें से एक सिन टेट माव से निकलने के कुछ घंटों बाद ही हादसे का शिकार हो गई होगी, जबकि दूसरी दक्षिण-पूर्व दिशा में कई दिनों तक सफ़र करने के बाद डूबी होगी.
दक्षिणी बांग्लादेश के भीड़भाड़ वाले शरणार्थी शिविरों में दस लाख से ज़्यादा रोहिंग्या रह रहे हैं. वहां मिलने वाली सहायता लगातार कम हो रही है, रोज़गार के अवसर लगभग नहीं के बराबर हैं.
साथ ही वहां संगठित अपराध से जुड़े गिरोह खुलेआम सक्रिय हैं. रोहिंग्या शरणार्थियों को इन शिविरों से बाहर जाने की भी अनुमति नहीं है.
मलेशिया और थाईलैंड में ढूंढ रहे ठिकाना
रखाइन राज्य में अब भी लगभग छह लाख रोहिंग्या रहते हैं. इनमें से क़रीब एक चौथाई बेहद ख़राब हालात वाले विस्थापित शिविरों (आईडीपी कैंपों) में रहने को मजबूर हैं.
बाक़ी लोग उन बस्तियों में रह रहे हैं जो संघर्ष में शामिल दोनों पक्षों के बीच फंस गई हैं. म्यांमार की सैन्य सरकार रोहिंग्याओं को जबरन सेना में भर्ती करने की कोशिश कर रही है.
दूसरी ओर, रखाइन समुदाय का समर्थन प्राप्त अराकान आर्मी, रोहिंग्याओं पर भरोसा नहीं करती. उस पर रोहिंग्याओं के ख़िलाफ़ गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगे हैं.
ऐसे कठिन हालात में रोहिंग्या शरणार्थियों को लगता है कि दूसरे देशों में जाना ही उनके लिए एकमात्र उम्मीद है.
मलेशिया में पहले से ही क़रीब दो लाख रोहिंग्या रह रहे हैं. इसलिए यह उनके लिए सबसे आकर्षक मंज़िल बन गया है.
इससे मानव तस्करों के लिए कमाई का बड़ा अवसर पैदा हो गया है. अब उनके नेटवर्क बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया तक फैले हुए हैं.
उनका काम करने का तरीक़ा सीधा है, वे नावों में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को भरते हैं. फिर अधिकारियों की नज़र से बचते हुए उन्हें मलेशिया पहुंचाने की कोशिश करते हैं.
साथ ही वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि यात्रियों के परिवार तीन हज़ार डॉलर (क़रीब 2.89 लाख रुपये) की तय रक़म चुकाएं.
जिन लोगों के परिवार यह रक़म नहीं दे पाते, उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता है. उनके साथ मारपीट की जाती है या उससे भी बुरा व्यवहार किया जाता है.
कई बार उनकी पीड़ा के वीडियो बनाकर परिवार वालों को भेजे जाते हैं, ताकि वे मांगी गई रक़म दे दें. वर्षों के दौरान तस्करी के रास्ते बदलते रहे हैं, लेकिन इस कारोबार की क्रूरता नहीं बदली है.
साल 2015 में थाईलैंड सरकार को मानव तस्करी को लेकर अपनी ख़राब छवि का सामना करना पड़ रहा था. इसके बाद उसने उन सड़क मार्गों को बंद करना शुरू कर दिया जिन्हें तस्कर इस्तेमाल करते थे.
साथ ही मैंग्रोव दलदलों और रबर के बागानों में बने अस्थायी शिविरों को भी बंद कराया, जहां तस्कर लोगों को तब तक क़ैद रखे रहते थे जब तक उनके परिवार पर्याप्त पैसे न दे दें.
इन शिविरों में सामूहिक क़ब्रें मिलने से थाईलैंड सरकार पर कार्रवाई का दबाव और बढ़ गया.
उसी साल म्यांमार-बांग्लादेश सीमा से दक्षिण की ओर जाने वाली कई नावों ने अपना रास्ता बदलकर इंडोनेशिया के आचेह प्रांत की ओर रुख़ कर लिया.
वहां के मछुआरा समुदायों ने शुरुआत में उत्पीड़न झेल रहे इन मुस्लिम शरणार्थियों का स्वागत किया था. लेकिन अब वह स्वागत ख़त्म हो चुका है. इंडोनेशिया में सोशल मीडिया पर रोहिंग्या शरणार्थियों के ख़िलाफ़ कुछ विरोधी अभियान भी चलाए गए हैं.
घर से बेघर रोहिंग्या समुद्र के भरोसे
मलेशिया तक सीधे समुद्री रास्ते से पहुंचना रोहिंग्या लोगों के लिए अब भी बहुत मुश्किल है. मलेशिया की नौसेना उन्हें रोकने और वापस खुले समुद्र में भेजने में काफ़ी सक्षम मानी जाती है. वहीं स्थानीय मछुआरा समुदाय भी उनकी मदद नहीं करता.
क्रिस लेवा के मुताबिक़, इसी वजह से मानव तस्करों ने एक बार फिर थाईलैंड को अपने मुख्य ट्रांज़िट मार्ग के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.
बड़ी नावें या जहाज़ रखाइन के तटों या बांग्लादेश के टेकनाफ़ क्षेत्र के पास से रोहिंग्या लोगों को उठा लेते हैं. दोनों देशों के अधिकारियों की नज़र से बचने के लिए ये जहाज़ वहां ज़्यादा देर नहीं रुकते.
अब तस्कर सैटेलाइट फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं. वे थाईलैंड और इंडोनेशिया में मौजूद अपने नेटवर्क से संपर्क करते हैं और स्थानीय मछुआरों को पैसे देकर रोहिंग्या लोगों को दक्षिणी थाईलैंड या इंडोनेशिया के पूर्वी सुमात्रा के समुद्र तटों तक पहुंचवाते हैं.
इसके बाद, जब पूरी रक़म अदा कर दी जाती है, तो उन्हें गुप्त रूप से मलेशिया पहुंचाया जाता है.
कुछ रोहिंग्याओं को म्यांमार के दक्षिणी तट पर उतार दिया जाता है. वहां से उन्हें ज़मीनी सीमा पार कराकर थाईलैंड ले जाया जाता है और फिर सड़क के रास्ते से मलेशिया की सीमा तक पहुंचाया जाता है.
लेकिन रखाइन से म्यांमार के बाक़ी हिस्सों को जोड़ने वाले सभी ज़मीनी रास्ते बंद होने के कारण, उनके पलायन की शुरुआत हमेशा एक ख़तरनाक समुद्री यात्रा से होती है.
क्रिस लेवा का अनुमान है कि पिछले साल सितंबर से अब तक कम से कम दस हज़ार रोहिंग्या नावों के ज़रिए म्यांमार और बांग्लादेश से निकल चुके हैं.
यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफ़ी ज़्यादा है. इसकी सबसे बड़ी वजह शायद रखाइन और बांग्लादेश, दोनों जगह रोहिंग्याओं के जीने के लिए बेहद कठिन परिस्थितियां हैं.
संयुक्त राष्ट्र ने रोहिंग्याओं के सुरक्षित पलायन के लिए सुरक्षित रास्ते उपलब्ध कराने की अपील की है. लेकिन इस क्षेत्र का कोई भी देश उन्हें अपने यहां बसाने को तैयार नहीं दिखता.
अब तक किसी भी सरकार ने उनकी यात्रा को आसान बनाने के लिए ठोस क़दम नहीं उठाए हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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