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'उम्मीद' एक ज़िंदा शब्द है: आकृति चौधरी को मुआवज़ा देंगे डीएम और अफ़सर, हाई कोर्ट ने और क्या कहा?
- Author, विनीत भल्ला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा में दिल्ली विश्वविद्यालय की 24 वर्षीय लॉ स्टूडेंट और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को हिरासत में लिए जाने को लेकर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर जुर्माना लगाया है.
जस्टिस अचल सचदेव और जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने 'साफ़ तौर पर तथ्य गढ़ने' की बात कही है और निर्देश दिया है कि उनके फ़ैसले को इन अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए.
दो सितंबर को सुनाए गए फ़ैसले को सात सितंबर को अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत आकृति चौधरी की हिरासत को ग़लत बताया गया है.
एनएसए के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ख़तरे से जुड़े मामलों में किसी व्यक्ति को बिना मुक़दमे के हिरासत में रखने की अनुमति है.
लेकिन अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि एनएसए के तहत एहतियातन हिरासत एक अपवाद है, और इसका इस्तेमाल सामान्य क़ानून के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता.
सैलरी से मुआवज़ा देंगे डीएम और बाक़ी अफ़सर
जस्टिस सचदेव और श्रीधरन की दो सदस्यीय बेंच ने आकृति चौधरी को पाँच लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है.
अदालत ने आदेश दिया कि यह रक़म गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की ज़िलाधिकारी और हिरासत का आदेश जारी करने के लिए ज़िम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए.
फ़ैसला अपलोड होने वाले दिन सोमवार को आकृति चौधरी ने अपने दोस्त के ज़रिए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के कुछ सवालों का जवाब भेजा. इस समय वह नोएडा की कासना जेल में हैं और उन पर कुल 11 मुक़दमे दर्ज किए गए हैं.
आकृति 'मज़दूर बिगुल' अख़बार के लिए नोएडा के विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करते हुए इन प्रदर्शनों से जुड़ी थीं. आकृति पिछले दो-तीन सालों से स्टूडेंट और मज़दूरों के अधिकारों से जुड़े संगठनों के साथ बतौर वॉलंटियर भी काम कर रही थीं.
आकृति ने मज़दूरों के प्रदर्शन से जुड़ने की वजह पूछे जाने पर अपने दोस्त के ज़रिए कहा कि "प्रदर्शन करने वाले वे लोग हैं जो हमारे देश का निर्माण करते हैं. वे बहुत बुनियादी चीज़ों की मांग कर रहे हैं, जैसे महँगाई और शोषण से राहत."
'उम्मीद एक ज़िंदा शब्द है'
दोस्त के माध्यम से आकृति चौधरी ने कहा कि उन्हें "उम्मीद नहीं थी कि एनएसए का आदेश इतनी जल्दी रद्द कर दिया जाएगा, ख़ासकर हाई कोर्ट ने जिस तरह इसे पूरी तरह ख़ारिज किया है, उसकी तो बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी." आकृति के दोस्त का नाम उनके अनुरोध की वजह से ज़ाहिर नहीं किया जा रहा है.
आकृति ने अपने दोस्त से कहा कि जब उन पर एनएसए लगाया गया था तो उन्हें बहुत हैरानी नहीं हुई.
उनसे जेल में मिलने वाले दोस्तों ने कहा कि गिरफ़्तारी के बाद आकृति को उम्मीद थी कि कुछ ही दिनों में उन्हें रिहा कर दिया जाएगा, क्योंकि उनका मानना था कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है. लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके ख़िलाफ़ 11 एफ़आईआर दर्ज की गई हैं, तो उन्हें डर लगा कि उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है.
आकृति का कहना था, "यह मेरे और मेरे माता-पिता दोनों के लिए बहुत मुश्किल था. उन्हें भी एक अलग तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और इस पूरी प्रक्रिया में उलझना पड़ा."
एनएसए रद्द होने से आकृति के ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्यवाही ख़त्म नहीं होती. विरोध प्रदर्शनों के संबंध में उनके ख़िलाफ़ दर्ज सभी 11 एफ़आईआर में ज़मानत मिलने तक वह न्यायिक हिरासत में रहेंगी. अब तक उन्हें पांच मामलों में ज़मानत मिल चुकी है.
आकृति ने अपने दोस्तों से कहा कि जेल में रहने से सामाजिक सक्रियता का रास्ता नहीं रुकने वाला.
उन्होंने कहा, "मैंने सीखा है कि हमारे देश का निर्माण करने वाले लोगों के लिए आवाज़ उठाने की क्या क़ीमत चुकानी पड़ती है, ख़ासकर उन लोगों के लिए जिनकी अपनी आवाज़ शायद नहीं है. लेकिन पिछले पांच महीनों के अनुभव ने मुझे अपने एक्टिविज़म के परिणामों का सामना करने के लिए और बेहतर तरीक़े से तैयार किया है."
जब उनसे भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा, "जब मैं जेल से बाहर आऊंगी, तो क़ानून की अपनी पढ़ाई पूरी करूंगी और मज़दूरों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए आवाज़ उठाती रहूँगी."
यह पूछे जाने पर कि वह जेल में अपना हौसला कैसे बनाए रखती हैं, उन्होंने कहा, "'उम्मीद' एक ज़िंदा शब्द है."
हिंसा भड़काने का प्रशासन का आरोप
आकृति चौधरी पर नोएडा में मज़दूरों के असंतोष को भड़काने आरोप लगाया गया था. इस साल अप्रैल महीने में हज़ारों मज़दूरों ने कम मज़दूरी, काम के घंटों और छुट्टियों की कमी को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था.
अदालत ने पाया कि ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह पता चले कि आकृति ने हिंसा के लिए लोगों को उकसाया था.
आगे चलकर इन प्रदर्शनों में तोड़फोड़ और आगज़नी भी हुई थी, जिसमें फैक्ट्रियों को नुक़सान पहुँचाने और पुलिस की गाड़ियों समेत कई वाहनों को जलाने की घटनाएं शामिल थीं, लेकिन अदालत ने माना कि नोएडा में हिंसा 13 अप्रैल को शुरू हुई थी जबकि आकृति को इससे पहले ही पुलिस हिरासत में ले चुकी थी.
नोएडा प्रशासन का कहना था कि उन्हें 12 अप्रैल की सुबह गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन आकृति चौधरी के वकील ने कहा कि उन्हें 11 अप्रैल को शाम साढ़े पाँच बजे नोएडा के बॉटेनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से हिरासत में लिया गया था और उनके परिवार या दोस्तों को इसकी सूचना दिए बिना उन्हें हिरासत में रखा गया था.
अदालत ने राज्य सरकार की ओर से सबूत के तौर पर पेश किए गए व्हाट्सऐप मैसेज की जांच की. अदालत ने पाया कि शाम 5:56 बजे के बाद आकृति के फ़ोन से संदेशों का जवाब नहीं दिया गया, और बाद में आई एक कॉल का भी जवाब नहीं दिया गया था.
अदालत ने कहा कि इससे यह संभावना बनती है कि वह उस समय तक हिरासत में ली जा चुकी थीं और इसलिए जवाब देने में सक्षम नहीं थीं. इससे उनके इस दावे को बल मिलता है कि उन्हें पिछली शाम ही हिरासत में ले लिया गया था.
क़ानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं
बेंच ने उनकी हिरासत से जुड़े दस्तावेज़ों में भी कई अनियमितताएं पाईं.
नोएडा के अधिकारियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 के तहत आकृति को जारी किया गया एक नोटिस पेश किया, जिसके मुताबिक़ उनसे अच्छे व्यवहार के लिए बॉन्ड भरने को कहा गया था.
इस नोटिस में जनरल डायरी एंट्री नंबर 37 का ज़िक्र था. अदालत ने पाया कि यह एंट्री 12 अप्रैल को सुबह 10:20 बजे दर्ज की गई थी, जबकि नोटिस जारी करने का समय नहीं बताया गया था.
अदालत ने माना कि नोटिस आकृति की गिरफ़्तारी के बाद तैयार किया गया था जो 'महज़ दिखावटी काग़ज़ी कार्रवाई' थी. जजों ने कहा कि रिकॉर्ड में 'साफ़ तौर पर की गई हेराफेरी' की सफ़ाई देने में प्रशासन नाकाम रहा.
अदालत ने सरकार के वकील से ऐसे सबूत भी पेश करने को कहा, जिनसे यह साबित हो कि आकृति ने लोगों को दंगा करने, संपत्ति जलाने या सरकारी अधिकारियों पर हमला करने के लिए उकसाया था.
अदालत को व्हाट्सऐप बातचीत या किसी वीडियो क्लिप में ऐसा एक भी संदेश नहीं मिला, जो इस तरह के उकसावे को साबित करता हो.
'काल्पनिक और निजी विचारों पर आधारित निर्णय'
सरकारी अधिकारी जिन वीडियो को सुबूत बता रहे थे, उनमें बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ दिखाई दे रही थी. इसमें पारंपरिक ग्रामीण कपड़े पहने पुरुष और महिलाएं और भीड़ को संबोधित करता हुआ एक व्यक्ति नज़र आ रहा था.
अदालत ने कहा कि फुटेज में कोई हथियारबंद या हिंसक भीड़ नहीं दिख रही थी, बल्कि ऐसा लग रहा था कि मज़दूर वेतन और काम की परिस्थितियों को लेकर विरोध करने के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे.
अदालत ने कहा, "अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता का दायरा सड़कों और आंदोलनों तक जाता है."
अदालत ने कहा कि केवल इस आशंका के आधार पर शांतिपूर्ण सभाओं को नहीं रोका जा सकता कि इससे शांति भंग हो सकती है.
हाई कोर्ट ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की तुलना प्रेशर कुकर के सेफ्टी वॉल्व से की. उसका तर्क था कि लोगों को अपनी शिकायतें और असंतोष व्यक्त करने की अनुमति देने से तनाव को उस स्तर तक पहुँचने से रोका जा सकता है, जहाँ हिंसा को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए.
ज़िलाधिकारी के आचरण को "हास्यास्पद" बताते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पाया कि ज़िलाधिकारी का आदेश "बार-बार दोहराये जाने वाला, अटकलों और निजी विचारों पर आधारित" था और उनके पीछे पर्याप्त सबूत नहीं थे.
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सीधे प्रभावित करने वाली असाधारण शक्ति का इस्तेमाल "अनुमानों, पूर्वाग्रहों, अटकलों और निजी विचारों" के आधार पर नहीं किया जा सकता.
इसी आधार पर अदालत ने हिरासत का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि एनएसए के तहत आकृति चौधरी की हिरासत जारी रखना अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन था.
अधिकारियों को अदालत ने याद दिलाया कि उनकी निष्ठा संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति और उन्हें हर समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वे जनता की सेवा करने वाले सेवक हैं.
जजों ने अपने फ़ैसले में "अपनी शपथ की अनदेखी करने वाले अधिकारियों को ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी अवशेष" की तरह बताया.
फ़ैसले में कहा गया है कि जब अधिकारी ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से या नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की परवाह किए बिना काम करते हैं, तो मुआवज़ा देना और अधिकारियों के आचरण को रिकॉर्ड में दर्ज करना उचित है.
अदालत ने माना कि ज़िलाधिकारी ने आकृति को एक मिसाल बनाकर मज़दूरों के समर्थन में आगे आने वाले लोगों को रोकने की कोशिश की.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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