महिलाओं को अपने निजी अंगों पर शर्म करने के लिए किसने मजबूर किया?

    • Author, बीबीसी अफ़्रीका
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  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

इंसान हज़ारों सालों से स्त्री जननांगों के बाहरी हिस्से, यानी वल्वा के बारे में बात करते रहे हैं.

शुरुआत में इसे प्रजनन की न‍िशानी के रूप में देखा जाता था. लेकिन वक़्त के साथ इसे ख़तरनाक, शर्म से जुड़ी और छिपाकर रखने वाली चीज़ के रूप में भी पेश किया गया.

आज वल्वा के इर्दग‍िर्द एक पूरा उद्योग मौजूद है. यह इसे "रीजुवेनेट" या "फिर से जवान और बेहतर" बनाने का दावा करने वाली सेवाएँ देता है. इसके अलावा कई तरह की कॉस्मेटिक और सर्जिकल प्रक्रियाएँ भी पेश की जा रही हैं.

आजकल कलाकार अपनी रचनाओं में वल्वा को चित्रित करते हैं. कार्यकर्ता इसे विरोध और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं. वहीं डॉक्टर यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि स्त्री जननांगों की सामान्य बनावट एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में काफ़ी अलग हो सकती है.

आख़िर इंसानी शरीर का यह हिस्सा प्रजनन के प्रतीक से शर्म की वस्तु कैसे बन गया? सुंदरता की निशानी से एक राजनीतिक प्रतीक तक का यह सफ़र कैसे तय हुआ?

फ़्रांस के अख़बार 'ल मोंद' ने इस इतिहास और उसके बदलते अर्थों को समझने की कोशिश की है. वहीं ब्रिटेन के अख़बार 'द गार्ड‍ियन' ने पोर्नोग्राफ़ी और सोशल मीडिया के असर से जुड़े आँकड़े सामने रखे हैं.

इन दोनों रिपोर्टों से यह समझ आता है कि स्त्री जननांगों को लेकर बहस सिर्फ़ शरीर तक सीम‍ित नहीं है. यह सत्ता, शर्म, सुंदरता और अपने शरीर के बारे में फ़ैसला लेने के हक़ की भी बहस है.

प्रजनन के प्रतीक के रूप में स्त्री जननांगों का बाहरी हिस्सा

आज यह कल्पना करना मुश्किल है कि स्त्री जननांगों के बाहरी हिस्से, यानी वल्वा, को कला में बिना किसी झिझक, शर्म या उसे छिपाने की कोशिश के खुले तौर पर दिखाया जाए.

लेकिन हज़ारों साल पहले इंसानों ने स्त्री शरीर के चित्र और मूर्तियाँ बनाईं. इनमें जननांगों के हिस्से को ख़ास अहमि‍यत दी गई थी. इसके सुबूत फ़्रांस के प्राचीन स्थल ला फ़ेरासी और शोवे गुफ़ा में मिले हैं. शोवे गुफ़ा दुनिया की सबसे पुरानी गुफ़ा-चित्रकला वाली जगहों में गिनी जाती है.

ऐसी ही एक दिलचस्प खोज मोनपाज़िएर की वीनस नाम की छोटी सी मूर्ति है. इसमें स्त्री के जननांगों को जानबूझकर बड़ा दिखाया गया है. माना जाता है कि प्राचीन समाज शायद स्त्री की संतान को जन्म देने की क्षमता को ख़ास तौर से उभारना चाहते थे.

प्राचीन मेसोपोटामिया में भी स्त्री की कामुकता को शर्म की नज़र से नहीं देखा जाता था. एक प्राचीन पाठ में देवी इश्तार अपने प्रिय से कहती हैं, "मेरे प्रेमी, मेरी योनि में अपना बीज बोओ."

लेकिन समय के साथ यह नज़रिया बदल गया.

प्राचीन इतिहासकार क्रिश्चियन-जॉर्ज श्वेंटज़ेल ने 'ल मोंद' को बताया कि एक बड़ा बदलाव प्राचीन यूनान और बाद में रोमन समाज में तब शुरू हुआ, जब स्त्री जननांगों को ख़तरे की चीज़ के तौर पर देखा जाने लगा.

वे कहते हैं, "यूनान में, और बाद में रोम में, स्त्री जननांगों के बाहरी हिस्से को तिरस्कार की वस्तु समझा जाने लगा."

धीरे-धीरे अपनी इच्छाओं और कामनाओं को ज़ाह‍िर करने वाली स्त्री की छवि ऐसे व्यक्ति की तरह गढ़ी जाने लगी, जिसे नियंत्रित और सीमित रखना ज़रूरी है.

यह विचार लंबे समय तक बना रहा.

मनोविश्लेषक सारा पियाज़ा "स्त्री के न‍िजी अंगों के प्रति भय" की बात करती हैं. उनके मुताबिक़, यह डर प्राचीन काल से लेकर आज तक स्त्रियों के चित्रण और उनकी सामाजिक छवि को प्रभावित करता रहा है.

सुंदरता के पीछे छिपा नियंत्रण

स्त्री जननांगों की बनावट या रूप-रंग को बदलने की इच्छा कोई नई बात नहीं है.

दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों में ऐसी प्रथाएँ रही हैं, जिनमें जननांगों के कुछ हिस्सों को हटाया जाता था या उनकी बनावट बदली जाती थी.

यूरोप में आधुनिक कॉस्मेटिक सर्जरी के आने से पहले भी चिकित्सा साहित्य में ऐसे शल्य-उपचारों का ज़िक्र मिलता है, जिनका मक़सद लेबिया मिनोरा या वल्वा के अन्य हिस्सों का आकार कम करना था.

आज स्त्रियों को अपने शरीर के बारे में फ़ैसला लेने का हक़ है. वे अपने शरीर के साथ क्‍या करेंगी, इसका फ़ैसला लेने का हक़ है. लेकिन इसके साथ एक सवाल भी उठता है. अगर समाज अब भी यह तय करता रहे कि "आदर्श" स्त्री शरीर कैसा दिखना चाहिए, तो क्या यह आज़ादी पूरी तरह वास्तविक कही जा सकती है?

चिकित्सकीय दृष्टि से इसका जवाब साफ़ है. स्त्री जननांगों के बाहरी हिस्सों की कोई एक "सही" या "मानक" बनावट नहीं होती.

सेक्सोलॉजिस्ट जोएल मिग्नो का कहना है कि स्त्री जननांगों की दिखावट को परिभाषित करने वाला कोई चिकित्सकीय मानक मौजूद नहीं है. जैसे पुरुषों के शरीर में काफ़ी विविधता होती है, वैसे ही स्त्रियों के शरीर में भी बहुत फ़र्क़ पाया जाता है.

फिर भी, एक महिला अपने बिल्कुल सामान्य शरीर को देखकर सोच सकती है कि उसमें कुछ गड़बड़ है.

स्त्री जननांगों के बाहरी हिस्से का "आदर्श" रूप किसने तय किया?

पिछले कुछ दशकों में इस दबाव को पोर्नोग्राफ़ी उद्योग, सोशल मीडिया, कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं और सर्जरी के विज्ञापनों के साथ-साथ प्यूबिक हेयर को हमेशा के लिए हटाने के बढ़ते चलन ने और बढ़ाया है.

धीरे-धीरे "आदर्श स्त्री" की एक ऐसी संकीर्ण छवि बनाई गई, जिसकी त्वचा मुलायम हो, बाल न हों, झुर्रियाँ दिखाई न दें, त्वचा में कसाव हो, रंग गुलाबी हो और कोई गंध न हो.

स्त्री रोग विशेषज्ञ सोफ़ी बेरविल इसे एक तरह का "गोल्ड स्टैंडर्ड" यानी आदर्श मानक बताती हैं, जो 2000 के दशक में उभरा.

अख़बार 'द गार्डियन' का कहना है कि समस्या यह है कि कम उम्र के लोगों को यह समझना आसान नहीं होता कि स्त्री जननांगों के सामान्य रूप में भी काफ़ी विविधता हो सकती है.

साल 2024 में अख़बार ने ऑस्ट्रेलिया में हुए एक अध्ययन के नतीजों का हवाला दिया. इसके मुताबिक़, 18 से 24 साल की उम्र के युवाओं में 23 फ़ीसदी अपने लेबिया या बाहरी जननांगों की बनावट को लेकर चिंतित या शर्मिंदा महसूस करती थीं. इनमें से आधे लोग सर्जरी कराने पर विचार कर रही थीं.

इसके अलावा, अपने शरीर में बदलाव चाहने वाली हर स्त्री को सिर्फ़ विज्ञापनों, सोशल मीडिया या पोर्नोग्राफ़ी का शिकार मानना भी सही नहीं होगा.

स्त्री रोग विशेषज्ञ सोफ़ी बेरविल ने 'ल मोंद' को बताया कि उनकी कुछ मरीज़ कई सालों से अपने निजी अंगों की बनावट के बारे में असहज थीं. कुछ अपने पार्टनर के सामने कपड़े उतारने में शर्म महसूस करती थीं या पूरी तरह यौन संबंधों से बचती थीं.

उन्होंने बताया कि प्रक्रिया के बाद कुछ मरीज़ों ने मानसिक रूप से बेहतर महसूस किया और उनकी यौन ज़िंदगी में भी सुधार आया.

मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि "सर्जरी करानी है या नहीं." अहम सवाल यह है कि क्या व्यक्ति सर्जरी के जोखिम और संभावित दुष्प्रभावों को समझता है और क्या यह फ़ैसला वास्तव में उसी का अपना है.

अमेरिकन कॉलेज ऑफ़ ऑब्स्टेट्रिशियंस एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स (ACOG) इंटरनेट और पोर्नोग्राफ़ी का लोगों पर पड़ने वाले असर के बारे में चेतावनी देता है. इनके प्रभाव से लोगों को लग सकता है कि उनके शरीर की क़ुदरती बनावट स्वीकार करने लायक नहीं है. इसके अलावा, इस हिस्से में की जाने वाली कई कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं की सुरक्षा और असर को लेकर मौजूद वैज्ञानिक प्रमाण अभी भी पर्याप्त नहीं हैं.

शर्म से विरोध और जागरूकता तक

इस कहानी में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है.

जिस शरीर को लंबे समय तक छिपाने के लिए मजबूर किया गया, वही सार्वजनिक अभिव्यक्ति का ज़रिया बनने लगा.

साल 1969 में ऑस्ट्रियाई कलाकार वाली एक्सपोर्ट ने म्यूनिख के एक सिनेमा में एक ख़ास तरह की पोशाक पहनकर प्रवेश किया.

यह एक सोचा-समझा क़दम था. इसका मक़सद बहस छेड़ना और यह सवाल उठाना था कि पुरुषों की नज़र स्त्री शरीर को किस तरह एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करती है.

एक्सपोर्ट ने दर्शकों को सिर्फ़ टेलीविज़न पर दिखाई जाने वाली किसी कामुक छवि को देखने के बजाय अपने सामने मौजूद एक वास्तविक स्त्री को देखने और उससे सीधे संवाद करने का मौक़ा दिया.

साल 1970 के दशक में नारीवादी कलाकारों ने अपने काम में स्त्री जननांगों की छवियों का खुलकर इस्तेमाल करना शुरू किया. इसके ज़रिए वे स्त्री की पहचान, स्त्री शरीर और अपने शरीर के बारे में ख़ुद फ़ैसला लेने के अधिकार जैसे मुद्दों को सामने ला रही थीं.

इस आंदोलन से जुड़ी कलाकारों में जूडी शिकागो भी शामिल हैं.

कला इतिहासकार और आलोचक सिंडी नेम्सर ने भी इस आंदोलन को लोगों तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने नारीवादी कला पर लिखा और इससे जुड़ी महिला कलाकारों का समर्थन किया.

समय के साथ यह मुद्दा कला की सीमाओं से आगे निकल गया.

साल 2019 में कलाकार डेबोरा डी रोबर्टिस ने सत्ता के पदों पर महिलाओं की कम भागीदारी के विरोध में यूरोपीय संसद के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया.

इसी दौरान कुछ ऐसे प्रोजेक्ट भी सामने आए, जिनका मक़सद शर्म को ज्ञान में बदलना था.

साल 2011 में कलाकार जेमी मैककार्टनी ने "ग्रेट वजाइना वॉल" नाम की कलाकृति बनाई. इसमें स्त्री जननांगों के 400 नमूने शामिल थे. इसका मक़सद स्त्री शरीर की विविधता को दिखाना था.

साल 2016 में "वल्वा गैलरी" शुरू की गई. यह एक ऑनलाइन प्रोजेक्ट है. इसमें स्त्री जननांगों की बनावट में मौजूद विविधता को दिखाया गया है.

और साल 2019 में लंदन में वजाइना म्यूज़ियम खोला गया. इसका मक़सद लोगों को स्त्री शरीर की बनावट और स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देना है. साथ ही यह भी बताना है कि समाज स्त्री शरीर को किस नज़र से देखता रहा है.

आज स्त्री जननांग एक बार फिर सार्वजनिक रूप से सामने हैं, लेकिन इस बार वजह अलग है.

इन्हें आज़ादी की माँग के लिए सामने लाया जा रहा है.

शर्म से लड़ने के लिए इनके बारे में बात की जा रही है. कला इन्हें इस सवाल के साथ सामने रखती है कि हर व्यक्ति को अपने शरीर के बारे में ख़ुद फ़ैसला लेने की आज़ादी और अधिकार होना चाहिए.

अब सवाल यह नहीं है कि "स्त्री जननांगों के बाहरी हिस्से का रूप कैसा होना चाहिए?"

इनकी बनावट और शक्ल अलग-अलग हो सकती है.

और यह बिल्कुल सामान्य है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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