कोरोना वायरस: प्रवासी मज़दूरों की वापसी कई राज्यों में बढ़ने लगा संक्रमण

    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़कर एक लाख के पार पहुंच गए है. मरने वालों की संख्या भी तीन हज़ार से अधिक हो चुकी है.

देश में लॉकडाउन का चौथा चरण चल रहा है, जिसमें केंद्र सरकार की ओर से कई तरह की छूट दी गई है और इस बार ज़्यादा ज़िम्मेदारी राज्यों के हिस्से है.

बढ़े हैं संक्रमण के मामले

इन सबके बीच प्रवासी मज़दूरों का अपने-अपने गांव और ज़िलों में लौटना भी जारी है.

तीन मई के बाद से राज्यों में संक्रमण के जो आँकड़े सामने आ रहे हैं उनमें कई मामले प्रवासियों के भी हैं. उन राज्यों में भी संक्रमण के मामले बढ़ गए हैं जहां अब तक संक्रमण बहुत नियंत्रित था.

सड़क के रास्ते पैदल चलकर, ट्रकों-ट्रॉलियों में लदकर कितने प्रवासी मज़दूर अपने घरों को लौटे हैं इसका कोई सटीक आँकड़ा तो नहीं है लेकिन पीआईबी की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते 19 दिनों में भारतीय रेलवे ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन के ज़रिए क़रीब 21.5 लाख से अधिक प्रवासियों को उनके गृह-राज्य पहुंचाया है. इसके अलावा कुछ राज्यों ने प्रवासी मज़दूरों की वापसी के लिए बस की भी व्यवस्था की है.

एक ओर जहां केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का ये फ़ैसला सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र पैदल तय करने को मजबूर हो चुके प्रवासियों के लिए राहत की ख़बर है वहीं प्रवासी मज़दूरों की वापसी से उनके गृह राज्यों में संक्रमण का ख़तरा बढ़ा है.

बिहार, ओडिशा, राजस्थान, झारखंड जैसे कई राज्यों में प्रवासियों की वापसी से संक्रमण के मामले बढ़े हैं.

बड़े शहरों से अपने गृह राज्य और गांवों को लौटने वाले कई लोग कोरोना वायरस संक्रमित पाए गए हैं.

बिहार के शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारी संजय कुमार ने बताया है कि मई महीने की शुरुआत से बिहार में कोरोना वायरस से संक्रमण के जितने मामले सामने आए हैं उनमें से 70 फ़ीसदी मामले प्रवासी मज़दूरों से संबंधित हैं.

20 मई को बिहार स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक़, तीन मई के बाद बिहार लौटे कुल प्रवासी मज़दूरों में से 788 प्रवासी कोरोना पॉज़ीटिव पाए गए हैं.

ओडिशा में तीन मई से लेकर 19 मई तक क़रीब 1,91,925 प्रवासी वापस लौटे हैं.

20 मई को राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी पिछले 24 घंटे के आँकड़ों के मुताबिक़, 74 लोगों का टेस्ट पॉज़ीटिव आया है जिसमें से 72 मामले प्रवासियों से जुड़े हुए हैं.

राजस्थान के आँकड़े भी कुछ ऐसे ही हैं. राज्य में अभी तक क़रीब साढ़े छह लाख प्रवासी वापसी कर चुके हैं और इनमें से 20 मई तक 946 प्रवासियों का कोरोना टेस्ट पॉज़ीटिव पाया गया है.

पश्चिम बंगाल में भी जो प्रवासी लौटे हैं उनमें से कुछ के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है.

संक्रमण के मामले में भारत चीन से भी आगे निकल गया है और ये स्थिति तब है जब देश में 25 मार्च के बाद से ही लॉकडाउन है.

सरकारी रणनीति में कमी कहां

ऐसे में सवाल यह उठता है कि लॉकडाउन की रणनीति से संक्रमण को नियंत्रित करने की सरकार की नीति क्या अब धरी की धरी रह जाएगी? आख़िर क्यों सरकार प्रवासियों की समस्या का हल नहीं तलाश पा रही है? जिस तरह (बिना टेस्ट के, बिना सोशल डिस्टेंसिंग के) ये मज़दूर अपने गृह-प्रदेश या ज़िले पहुंच रहे हैं उससे संक्रमण का ख़तरा बढ़ा है.

झारखंड सरकार के स्वास्थ्य सचिव नितिन कुलकर्णी कहते हैं कि इस बात से इनक़ार नहीं किया जा सकता है कि प्रवासियों के लौटने से संक्रमण के मामले बढ़े हैं.

वो कहते हैं, "झारखंड में हमने स्थिति को लगभग पूरी तरह संभाल लिया था लेकिन तीन मई के बाद से जब से प्रवासियों का लौटना शुरू हुआ है. हमारे यहां संक्रमण के मामले अचानक से बढ़ गए हैं."

वो 20 मई के आँकड़ों का हवाला देते हुए कहते हैं कि आज ही 33 नए मामले सामने आए हैं और ये सभी मामले प्रवासियों से जुड़े हैं. वो कहते हैं कि राज्य में संक्रमण के क़रीब 110 मामले ऐसे हैं जो प्रवासियों के हैं.

हालांकि नितिन प्रवासियों को लेकर केंद्र सरकार की नीति पर कोई टिप्पणी नहीं करते.

वो कहते हैं "ये वो वक़्त नहीं है जिस समय हम इन बातों की चर्चा करें. अभी जो करना है वो सिर्फ़ इतना कि जैसे-जैसे मामले आ रहे हैं उन्हें सुव्यवस्थित तरीक़े देखा जाए."

तो क्या राज्य इसके लिए तैयार थे?

इस सवाल के जवाब में नितिन कहते हैं "तैयार होने की बात नहीं है लेकिन ये तो सभी को पता था ही कि एक ना एक दिन प्रवासी वापस लौटेंगे ही. किसी को कितने दिन रोका जा सकता है." तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकारें क्या कर रही हैं और क्या कोई हल निकाला जा सकेगा?

नितिन कहते हैं "अभी इसका कोई हल नहीं है. पहली चीज़ जो की जाएगी वो ये कि जो लोग लौट रहे हैं उन्हें डिसइंफ़ेक्टेड किया जाए. क्वारंटीन किया जाए."

लेकिन नितिन इस बात को लेकर चिंता ज़रूर ज़ाहिर करते हैं कि अभी तो कुछ ही स्पेशल ट्रेनें आ रही हैं लेकिन अब जबकि घोषणा हो चुकी है नियमित ट्रेन होंगी तो आने वाले समय में शायद ऐसा हो कि रिकॉर्ड रखना भी मुश्किल हो जाए.

तो क्या दूसरे फ़ेज़ की तरफ़ हम बढ़ रहे हैं?

नितिन इसका सिर्फ़ इतना ही जवाब देते हैं कि अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, आने वाले समय में ही जो होगा स्पष्ट हो सकेगा.

स्वराज पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव राज्यों में प्रवासियों के पहुंचने पर संक्रमण के बढ़ते सवाल पर कहते हैं, "क़ायदे से जब लॉकडाउन शुरू हुआ अगर सरकार उसी वक़्त ट्रेन चलने देती और लोगों के जाने की व्यवस्था करती तो उस समय संक्रमण होने की आशंका अभी से कम होती. क्योंकि उस समय संक्रमण 500 के क़रीब थे लेकिन अब जबकि संक्रमण के मामले एक लाख के पार हो गए हैं तो संक्रमण का ख़तरा दो सौ गुना बढ़ गया है. लेकिन अगर और बाद में इस लागू किया जाएगा तो ख़तरा और बढ़ जाएगा."

योगेंद्र यादव कहते हैं "सरकार ने अपने शुरुआती और पहले ग़लत क़दम की वजह से अपने लिए कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा है."

वो कहते हैं "सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब संक्रमण के मामले कम थे तब हमने ट्रेन नहीं चलाई लेकिन अब जब मामले बढ़ गए हैं तो हम ट्रेन चला रहे हैं. उसकी वजह से संक्रमण के मामलों का बढ़ना तो तय है लेकिन अब भी अगर सरकार आने वाले पांच-छह दिनों में सभी को भेज दे या जाने दे तो वह समझदारी भरा फ़ैसला होगा. लेकिन अगर इसे और चलने दिया, लोगों को बंद करके रख दिया तो लोग तो भूख से ही मर जाएंगे."

हालांकि योगेन्द्र यादव यह ज़रूर कहते हैं "जिन लोगों को भेजा जा रहा है उन्हें पूरी तरह टेस्ट करके, सारी सावधानियां अपनाते हुए उन्हें भेजा जाना चाहिए था. लेकिन जब ज़रूरत कम थी तब इतना ज्यादा कुछ कर दिया और अब जब सबसे अधिक सतर्कता की ज़रूरत है तो अब उस स्तर की सावधानी नहीं अपनायी जा रही है."

वो मानते हैं कि इन सारी चीज़ों से एक बात जो स्पष्ट होती है वो ये कि इसे लेकर सरकार की कोई सोची-समझी रणनीति नहीं थी.

लेकिन सरकारें प्रवासियों को संभाल क्यों नहीं पा रहीं?

इस सवाल के जवाब में योगेंद्र यादव कहते हैं "सरकार को शुरू से इतनी समझ नहीं थी और सरकार के लिए ये लोग अदृश्य थे. हमारी नीतियों में शुरू से ही इन लोगों को अदृश्य बनाया गया है. लेकिन जब वो सड़क पर आए तब दिखे वरना उसके पहले तो गाइडलाइन्स में उनका ज़िक्र तक नहीं था. जब ये लोग सड़क पर आए उसके बाद भी इनके लिए कोई रणनीति नहीं बनाई गई. ये पूरी तरह से राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नज़र आती है."

हालांकि पूर्व गृह सचिव बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सरकार ने रणनीति के तहत काम नहीं किया. वो कहते हैं, "सरकार की रणनीति थी पहले कि जो प्रवासी मज़दूर और दूसरे लोग हैं वो वहीं रहें और बाहर नहीं जाएं. और सरकार उनके लिए व्यवस्था करे. लेकिन लोगों में जो आवेश था वापस लौटने का, उसके आगे सरकार की यह रणनीति धराशायी हो गई. इसके बाद लोगों को भेजने का फ़ैसला किया गया. लेकिन उस समय लोगों को यह संभावना पता क्यों नहीं दिखी कि जब लोग लौटेंगे तो वो एक बड़ी तादाद होगी और उसके बाद आप कोई रणनीति नहीं बदले सकेंगे."

बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं "अब तो जो है उसी के साथ चलना होगा और फिर आपको स्टेबलाइज़ करना होगा. सरकारें ऐसी ही होती हैं. प्रत्येक जगह कुछ ना कुछ ग़लतियां होती हैं. लेकिन कई बार ऐसे मामलों में दूरदर्शिता मुश्किल है. अब इसका कोई उपाय नहीं. अब इसे सिर्फ़ फ़ेस करना है."

तो क्या पहले लॉकडाउन की घोषणा से पहले मज़दूरों को लौटने के लिए वक़्त नहीं देना चाहिए था. इस सवाल के जवाब में बाल्मिकी प्रसाद सिंह कहते हैं "इसे भूल नहीं कहा जाना चाहिए. कई बार आकस्मिक मौक़े पर जो बातें कही जाती हैं उनका असर होता है और इस मामले में भी हुआ ही."

पूर्व गृह सचिव बाल्मिकी प्रसाद सिंह मानते हैं कि अब जो स्थिति है, हमें उसी में हल खोजना होगा. वो कहते हैं "अब सबसे ज़रूरी है कि टेस्ट किए जाएं, क्वारंटीन किया जाए क्योंकि अब जो रास्ता ले लिया गया है उसे बदला नहीं जा सकता. जिस रास्ते पर अब हम हैं उसी रास्ते पर बुद्धिमानी से आगे बढ़ने की ज़रूरत है."

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