विजय ने वो सब कैसे कर दिखाया जो रजनीकांत और कमल हासन नहीं कर पाए?

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- Author, शंकर नारायण सुदलाई
- पदनाम, बीबीसी तमिल
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
"मैंने अपने स्क्रीन करियर के शिखर को छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया है." विजय अक्सर राजनीतिक मंचों पर यह कहते थे. उनके प्रशंसकों और पार्टी सदस्यों की ओर से इसी को केंद्र में रखकर एक अभियान शुरू हुआ. इस पर दूसरे विपक्षी दलों की ओर से प्रतिक्रिया भी आई.
विजय की तरह फ़िल्म उद्योग में प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचे कई अभिनेताओं के मन में भी राजनीतिक आकांक्षाएं रही होंगी.
राजनीति में प्रवेश करना चाहने वाले और खुले तौर पर अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने वाले रजनीकांत, और राजनीति में प्रवेश कर चुनाव लड़ने वाले कमल हासन की परंपरा को विजय एक नए लेवल पर ले गए हैं.
इससे पहले जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में एक ख़ालीपन सा आ गया था.
हालांकि इन दोनों बड़े नेताओं के रहते ही अभिनेता विजयकांत ने भी राजनीति में प्रवेश किया था, और बाद में 2011 के चुनावों में एआईएडीएमके के साथ गठबंधन किया और विपक्ष में बैठे, लेकिन उनकी पार्टी विजय की तरह बड़ी जीत हासिल करने की स्थिति तक नहीं पहुंच पाई.
एमजीआर और जयललिता के बाद तमिलनाडु की राजनीति में कोई अन्य फ़िल्म स्टार उस स्तर तक नहीं उठ पाया है. ऐसे में 2026 के चुनावों में सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत नहीं मिलने के बावजूद विजय की पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है.
विजय ने वो कैसे हासिल किया जो रजनीकांत और कमल हासन नहीं कर सके?
रजनीकांत की राजनीतिक "आवाज़"

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कई सालों तक तमिल सिनेमा के शीर्ष सितारे रहे रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश को लेकर बहस 1990 के दशक के मध्य में शुरू हुई थी. 1996 के चुनावों के दौरान ही "रजनी वॉयस" शब्द पहली बार तमिलनाडु की राजनीति में एक चर्चित शब्द बना.
फ़िल्म "बादशाह" के 100 दिन की कामयाबी का जश्न मनाने के समारोह के दौरान तमिलनाडु में "बम कल्चर" को लेकर रजनीकांत की टिप्पणी बड़े स्तर पर चर्चा का विषय बनी.
इस फ़िल्म के निर्माता और उस समय के राज्य मंत्री आरएम वीरप्पन भी उस समय मंच पर मौजूद थे.
इसके बाद, हाल ही में वीरप्पन के जीवन पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री में रजनीकांत ने उन परिस्थितियों का उल्लेख किया है जिनमें उन्होंने तमिलनाडु कैबिनेट से आरएम वीरप्पन को हटाए जाने को लेकर बात की थी.
यह मुद्दा बाद में 1996 के चुनावों के दौरान उभरकर सामने आया. इसी संदर्भ में, तमिलनाडु में कांग्रेस के एआईएडीएमके के साथ गठबंधन का विरोध करते हुए पूर्व कांग्रेस नेता जीके मूपनार ने तमिल माणिला कांग्रेस का गठन किया और डीएमके के साथ गठबंधन किया.
एआईएडीएमके के ख़िलाफ़ इस गठबंधन का समर्थन करते हुए रजनीकांत ने कहा, "अगर एआईएडीएमके फिर से सत्ता में आई, तो भगवान भी तमिलनाडु को नहीं बचा पाएंगे." इस चुनाव में एआईएडीएमके हार गई.
हालांकि इस हार के पीछे कई राजनीतिक परिस्थितियां थीं, लेकिन डीएमके गठबंधन को रजनीकांत के समर्थन की काफ़ी चर्चा हुई.
फ़िल्मी करियर के शिखर पर होने के बावजूद रजनीकांत के राजनीति में आने को लेकर प्रशंसकों के बीच उम्मीदें बनीं, लेकिन रजनीकांत इसके 20 से ज़्यादा सालों तक पूर्णकालिक राजनीति में नहीं आए.
हालांकि अपनी फ़िल्मों के ज़रिए वो प्रदेश की राजनीति पर अप्रत्यक्ष रूप से टिप्पणी करते रहे.
शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गई राजनीति

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रजनीकांत ने आख़िरकार 2017 में राजनीति में प्रवेश की घोषणा की. लेकिन 3 साल बाद, कोरोना महामारी के कारण उन्होंने घोषणा की कि वो राजनीति में सक्रिय नहीं रहेंगे.
इसके साथ ही, रजनीकांत का राजनीतिक करियर पूरी तरह शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गया. उनके इस फ़ैसले के पीछे स्वास्थ्य कारण बताए गए.
इस बारे में बीबीसी तमिल से बात करते हुए राजनीतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन ने कहा, "रजनीकांत ने एक महत्वपूर्ण अवसर खो दिया है."
उन्होंने कहा कि रजनीकांत के पास एमजीआर और जयललिता जैसा राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है.
रामू मणिवन्नन कहते हैं, "जहां तक एमजीआर का सवाल है, वो पार्टी की स्थापना से पहले ही डीएमके के कोषाध्यक्ष थे. जयललिता एआईएडीएमके की नीति और प्रचार सचिव थीं."

कमल हासन का राजनीतिक सफ़र
कमल हासन ने 2018 में राजनीति में प्रवेश किया. उन्होंने जयललिता की मृत्यु और करुणानिधि के अस्वस्थ होने के बाद "मक्कल निधि मय्यम" नाम की पार्टी शुरू की.
उनकी पार्टी को 2019 और 2021 के चुनावों में कोई ख़ास सफलता नहीं मिली. 2021 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को लगभग 3.7 प्रतिशत वोट मिले, वहीं 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने डीएमके गठबंधन का समर्थन किया.
बाद में कमल हासन राज्यसभा के लिए चुने गए. उनकी मक्कल निधि मय्यम ने 2026 विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा और डीएमके का समर्थन किया.
प्रोफ़ेसर रामू मणिवन्नन का कहना है कि रजनीकांत की तरह कमल हासन के पास भी स्थिर राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है.
वो कहते हैं कि भले ही रजनीकांत और कमल हासन जैसे लोग फ़िल्म उद्योग में सफल हों, लेकिन केवल फ़िल्मी सफलता राजनीति में मदद नहीं करती.

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रजनीकांत और कमल हासन से अलग कैसे हैं विजय?
जहां रजनीकांत राजनीति से दूर रहे, वहीं कमल हासन राजनीति में आने के बाद कोई बड़ा बदलाव नहीं कर पाए.
प्रोफ़ेसर रामू मणिवन्नन का कहना है कि विजय के पास वित्तीय पृष्ठभूमि के साथ-साथ ऐसा राजनीतिक आधार भी है जो इन दोनों के पास नहीं है.
रामू मणिवन्नन का कहना है कि चुनाव में विजय का प्रभाव सही समय के इस्तेमाल के कारण था, और सिनेमा के ज़रिए मिली प्रसिद्धि के कारण वो एक नेता के रूप में उभरे.
वो कहते हैं कि विजय को अभी भी एक जनप्रिय नेता के रूप में उभरना बाकी है, और भविष्य में वो नेता के तौर पर कितनी ऊंचाई छूते हैं वो इस बात पर निर्भर करेगा कि वो लोगों की भावनाओं पर कितना खरा उतर पाते हैं.
वो कहते हैं कि विजय का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वो सरकार कैसे चलाते हैं और पार्टी को एक संगठन के रूप में कैसे विकसित करते हैं.
रामू मणिवन्नन ने कहा कि विजय की जीत तमिलनाडु के लिए एक अहम क्षण है.
वो कहते हैं कि डीएमके और एआईएडीएमके दोनों में छात्र संगठन मज़बूत नहीं हैं, और छात्र व युवा संगठनों में 50 साल से अधिक उम्र के लोगों की मौजूदगी इसी का परिणाम है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































