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चुनाव आयोग से राजनीति तक: पीयूष गोयल के आरोपों के बीच क्या कहता है पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का इतिहास?
- Author, दुष्यंत कुमार
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक लड़ाई में अब देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का इतिहास भी चर्चा में आ गया है.
सवाल उठ रहा है कि क्या चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के शीर्ष पद पर रहने वाले अधिकारी रिटायरमेंट के बाद राजनीति में शामिल हुए हैं? क्या उन्होंने किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ा है या उन्हें सरकारों ने बड़े पदों पर नियुक्त किया है?
यह सवाल केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के उस बयान के बाद उठा, जिसमें उन्होंने कांग्रेस पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों को राजनीतिक पद और सम्मान देने का आरोप लगाया है.
मंगलवार, 13 अक्तूबर को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पीयूष गोयल ने टीएन शेषन, एमएस गिल और आरके त्रिवेदी जैसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का नाम लेकर कांग्रेस से सवाल पूछे.
बीजेपी नेता पीयूष गोयल ने क्या आरोप लगाए?
बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया और दूसरे को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया.
उन्होंने कहा कि 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को गुजरात की गांधीनगर सीट से बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ उम्मीदवार बनाया था.
गोयल ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल का भी उदाहरण दिया.
उन्होंने कहा कि गिल को साल 2000 में मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए पद्म विभूषण दिया गया था. इसके बाद वह 2004 में कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे और 2008 में केंद्र सरकार में मंत्री बने.
गोयल ने सवाल उठाया कि क्या यह गिल को उनके काम के बदले राजनीतिक लाभ पहुंचाने का मामला नहीं था?
केंद्रीय मंत्री ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त आरके त्रिवेदी की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि त्रिवेदी को रिटायरमेंट के लगभग दो महीने बाद गुजरात का राज्यपाल बना दिया गया था.
उन्होंने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का मामला भी उठाया.
गोयल का कहना था कि तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश की थी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया.
ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि इन अधिकारियों के कार्यकाल और उसके बाद की नियुक्तियों के बारे में सरकारी रिकॉर्ड क्या बताते हैं?
टीएन शेषन: लोकसभा चुनाव से राष्ट्रपति चुनाव तक
टीएन शेषन भारत के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त थे.
भारतीय चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 12 दिसंबर 1990 को पद संभाला और 11 दिसंबर 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे.
शेषन का कार्यकाल चुनावी आचार संहिता को सख़्ती से लागू करने और चुनाव आयोग की शक्तियों के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त का पद छोड़ने के बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में क़दम रखा.
साल 1997 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव लड़ा, लेकिन केआर नारायणन से हार गए.
इसके दो साल बाद, 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें गुजरात की गांधीनगर सीट से उम्मीदवार बनाया.
उनके सामने बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी थे.
भारतीय चुनाव आयोग की 1999 के लोकसभा चुनाव की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक़, आडवाणी को 4,53,229 वोट मिले, जबकि शेषन को 2,64,285 वोट मिले.
इस तरह शेषन चुनाव हार गए.
शेषन का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटने के बाद सीधे चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया और कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा.
हालांकि, कांग्रेस का उम्मीदवार बनने और मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनके कार्यकाल के बीच लगभग तीन साल का अंतर था.
एमएस गिल: मुख्य चुनाव आयुक्त से केंद्रीय मंत्री बनने तक
टीएन शेषन के बाद एमएस गिल भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त बने.
चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक़, उन्होंने 12 दिसंबर 1996 से 13 जून 2001 तक इस पद पर काम किया.
गिल के कार्यकाल के दौरान देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम के इस्तेमाल का विस्तार हुआ. हालांकि, ईवीएम का इस्तेमाल उनके मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले शुरू हो चुका था.
पद छोड़ने के बाद गिल कांग्रेस से जुड़े.
अप्रैल 2004 में वह पंजाब से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य बने.
इसके बाद छह अप्रैल 2008 को उन्हें केंद्र सरकार में युवा मामले और खेल मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दिया गया.
वह यूपीए सरकार में मंत्री रहे और बाद में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ज़िम्मेदारी भी संभाली.
साल 2010 में वह दोबारा राज्यसभा पहुंचे और अप्रैल 2016 तक संसद के उच्च सदन के सदस्य रहे.
पीयूष गोयल ने गिल के मामले में एक और सवाल उठाया है.
उनका कहना है कि गिल को साल 2000 में मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए पद्म विभूषण दिया गया था. उन्होंने आरोप लगाया कि क्या ये उन्हें रिवॉर्ड देने का मामला नहीं है?
आरके त्रिवेदी: चुनाव आयोग से गुजरात के राजभवन तक
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त आरके त्रिवेदी का उदाहरण सक्रिय चुनावी राजनीति में उतरने से अलग है.
चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वह 18 जून 1982 से 31 दिसंबर 1985 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे.
इसके बाद 26 फ़रवरी 1986 को उन्हें गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गया.
इस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त का पद छोड़ने और राज्यपाल बनने के बीच लगभग दो महीने का अंतर था.
पीयूष गोयल ने मंगलवार को कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठाते हुए त्रिवेदी की नियुक्ति का ज़िक्र किया.
वीएस रमादेवी: दो राज्यों की राज्यपाल बनीं
भारत की पहली महिला मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस रमादेवी भी उन पूर्व अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें बाद में राज्यपाल बनाया गया.
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार वह 26 नवंबर 1990 से 11 दिसंबर 1990 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहीं.
उनका कार्यकाल केवल 15 दिन का था.
इसके लगभग सात साल बाद, 26 जुलाई 1997 को वह हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल बनीं.
हिमाचल प्रदेश राजभवन के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वह एक दिसंबर 1999 तक इस पद पर रहीं.
इसके बाद उन्होंने कर्नाटक की राज्यपाल के रूप में भी काम किया.
रमादेवी का उदाहरण बताता है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही.
लेकिन उनके किसी राजनीतिक दल में शामिल होने की पुष्टि करने वाला कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.
इसलिए उन्हें राजनीति में शामिल होने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नहीं गिना जा सकता.
नवीन चावला को लेकर क्या विवाद हुआ था?
पीयूष गोयल ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नवीन चावला का भी ज़िक्र किया. यह मामला रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक पद पाने का नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के भीतर एक विवाद का था.
साल 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफ़ारिश की थी.
गोपालस्वामी ने चावला पर कांग्रेस के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया था. उस समय इंडियन एक्सप्रेस ने गोपालस्वामी के पत्र और उसमें लगाए गए आरोपों पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी.
हालांकि, गोपालस्वामी की सिफ़ारिश के बावजूद नवीन चावला को पद से नहीं हटाया गया.
भारतीय चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक़, वह 21 अप्रैल 2009 को मुख्य चुनाव आयुक्त बने और 29 जुलाई 2010 तक इस पद पर रहे.
एन गोपालस्वामी ने राजनीति में जाने पर रोक की मांग क्यों की थी?
पूर्व चुनाव आयुक्तों के राजनीति में आने या सरकारी पद स्वीकार करने का सवाल पहले भी उठ चुका है.
जनवरी 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को एक पत्र लिखकर इस संबंध में क़ानूनी बदलाव का सुझाव दिया था.
गोपालस्वामी ने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की निष्पक्षता पर सवाल न उठें, इसके लिए पद छोड़ने के बाद उन्हें सरकारी नियुक्तियां स्वीकार करने से रोका जाना चाहिए.
उन्होंने सुझाव दिया कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों को राज्यपाल या उपराज्यपाल जैसे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए.
इसके अलावा उन्होंने पद छोड़ने के बाद कम से कम दस साल तक किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर रोक लगाने की सिफ़ारिश की.
गोपालस्वामी ने अपने पत्र में 1990 की दिनेश गोस्वामी समिति का भी उल्लेख किया था.
इस समिति ने चुनाव सुधारों से जुड़ी अपनी सिफ़ारिशों में पूर्व चुनाव आयुक्तों की सरकारी नियुक्तियों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी.
गोपालस्वामी के पत्र के मुताबिक़, इस संबंध में 1990 में एक संविधान संशोधन विधेयक भी राज्यसभा में पेश किया गया था, लेकिन 1993 में उसे वापस ले लिया गया.
उनका तर्क था कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता के साथ-साथ जनता के बीच उसकी निष्पक्ष छवि बनाए रखना भी ज़रूरी है.
हालांकि, पद छोड़ने के बाद गोपालस्वामी स्वयं केंद्र सरकार की ओर से कलाक्षेत्र फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष नियुक्त किए गए.
यह नियुक्ति भी पूर्व चुनाव आयुक्तों के सरकारी या सार्वजनिक संस्थानों में पद स्वीकार करने की बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण है.
मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का क़ानून क्या कहता है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग से संबंधित है.
इसी अनुच्छेद में चुनाव आयोग की संरचना और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधान हैं.
साल 2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित नया क़ानून बनाया.
इस क़ानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान है.
इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं.
इस समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल नहीं किया गया है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ क्या आरोप हैं?
ज्ञानेश कुमार ने 19 फ़रवरी 2025 को भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला था.
वह 1988 बैच के केरल कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले वह चुनाव आयुक्त के रूप में काम कर चुके थे.
उनकी नियुक्ति 2023 के नए क़ानून के तहत हुई थी.
ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया है.
कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों और पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के आरोप लगाए हैं.
विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में लोगों के मताधिकार प्रभावित हुए हैं.
दूसरी तरफ़ चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रिया का बचाव किया है.
मार्च 2026 में विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में नोटिस दिए थे.
लोकसभा में इस नोटिस पर 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे.
हालांकि, अप्रैल में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने ये नोटिस स्वीकार नहीं किए.
विवाद कब बढ़ा?
सितंबर 2026 में इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर फ़ैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर मतभेदों की जानकारी सामने आई.
रिपोर्ट के मुताबिक़, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फ़ैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं.
चुनाव आयोग ने इस पर कहा कि अलग-अलग राय सामने आना फ़ैसले लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और उसके फ़ैसले निर्धारित क़ानूनी प्रक्रिया के तहत हुए हैं.
अक्तूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा.
इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि ज्ञानेश कुमार ने कुछ फ़ैसले एकतरफ़ा तरीक़े से लिए.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट का नोटिस जारी करना आरोपों को सही ठहराना नहीं है. अदालत ने इस मामले में संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है.
विपक्ष का विरोध और बीजेपी का जवाब
छह अक्तूबर को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं ने दिल्ली में चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया.
विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.
इसके बाद 12 अक्तूबर को विपक्षी नेताओं और समर्थकों ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूचियों में संशोधन को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की.
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूचियों में बदलाव से बड़ी संख्या में पात्र मतदाता प्रभावित हो रहे हैं.
बीजेपी ने इन आरोपों को ख़ारिज किया है और विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुक़सान पहुंचाने का आरोप लगाया है.
इसी राजनीतिक टकराव के बीच 13 अक्तूबर को पीयूष गोयल ने कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड का मुद्दा उठाया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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