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चीनी एक्सपर्ट ईरान समझौते को अमेरिका की हार और अपने देश की जीत क्यों बता रहे हैं?
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
चीन में एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते को स्थाई शांति की दिशा में बड़ा कदम बताकर पेश नहीं किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और इसराइल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अब भी बड़े मतभेद बने हुए हैं.
हालाँकि टिप्पणीकारों का यह भी कहना है कि चीन के "शांतिपूर्ण रुख़" वाले मॉडल और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी रणनीति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक मान्यता मिल रही है. उनके अनुसार इस संघर्ष ने ताइवान को लेकर अमेरिका के विरोध की क्षमता को भी कमजोर किया है.
हालांकि चीनी सरकार ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) का स्वागत किया है, लेकिन चीनी विश्लेषकों ने बातचीत की संभावनाओं को लेकर अधिक सतर्क रुख़ अपनाया है.
वे इस पूरे घटनाक्रम में चीन को उभरते हुए विजेता के रूप में देख रहे हैं.
बातचीत लंबे समय तक खिंचने की आशंका
15 जून को चीनी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में लिखे एक लेख में वांग जिन ने अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर "सतर्क दृष्टिकोण" अपनाने की सलाह दी. वांग चीन की नॉर्थ-वेस्ट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं.
उन्होंने कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोलने की प्रक्रिया, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और लेबनान में इसराइल की जारी सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं. इसी वजह से यह समझौता अभी भी अनिश्चितताओं और अस्थिरता से घिरा हुआ है.
16 जून को अर्ध-सरकारी समाचार मंच ग्वांचु पर लिखते हुए प्रभावशाली टिप्पणीकार चेयरमैन रैबीट ने कहा कि आगे की बातचीत के लिए तय 60 दिनों की समयसीमा बहुत कम है.
उन्होंने इसकी तुलना ज्वाइंट कंप्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन (जेसीपीओए) से की, जिसके लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में क़रीब 20 महीने तक बातचीत चली थी.
साल 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते (ज्वाइंट कंप्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन- जेसीपीओए) में भी अमेरिका समेत कई यूरोपीय देश शामिल थे. इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु संवर्द्धन कार्यक्रम को सीमित करने के बदले उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में कुछ छूट दी जानी थी.
डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2018 में अपने पहले कार्यकाल में इस समझौते से बाहर निकलने का एलान कर दिया था.
रैबीट ने आशंका जताई कि आगे की बातचीत अनिश्चितकाल तक खिंच सकती है. इससे अमेरिका और ईरान ऐसी स्थिति में फंस सकते हैं जहां न पूरी तरह शांति होगी और न युद्ध. इस दौरान बातचीत भी पूरी तरह ख़त्म नहीं होगी और कोई ठोस नतीजा भी नहीं निकलेगा.
चीन ने क्या सीखा
16 जून को ही राष्ट्रवादी टिप्पणीकार और फ़्यूदान यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर शेन यी ने कहा कि इस समझौता ज्ञापन को "ऐतिहासिक शांति" बताया जाना भूल होगी.
शेन यी ने कहा कि यह समझौता परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंधों, इसराइल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष और अमेरिका-ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे अविश्वास जैसे गहरे मुद्दों का समाधान नहीं करता.
हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि यह समझौता भले ही किसी "रणनीतिक जीत" तक नहीं पहुंचा, लेकिन इससे अमेरिका को युद्ध और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े दबाव को अस्थायी रूप से कम करने में मदद मिल सकती है. इससे उसे कूटनीतिक स्तर पर सीमित समय के लिए नए विकल्प तलाशने का अवसर मिलेगा.
वहीं शेन यी का ये भी मानना है कि ईरान को युद्ध के बाद कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इनमें घरेलू शासन व्यवस्था को मजबूत करना और विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक गुटों के बीच तालमेल स्थापित करना शामिल है.
चीन के दृष्टिकोण से शेन यी ने कहा कि इस संकट से चीन ने यह सबक लिया है कि सैन्य ताक़त की तुलना में कूटनीतिक प्रयासों में अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम दे सकता है.
उनका कहना है कि चीन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए साझा ढांचा बनाने में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है, बजाय इसके कि वह विशेष या सीमित सैन्य गठबंधनों पर निर्भर रहे.
ग्लोबल टाइम्स के पूर्व एडिटर-इन-चीफ़ हू शीजिन ने 15 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म शीना वेबो पर लिखा, "इस युद्ध ने चीन के शांतिपूर्ण मॉडल को एक बार फिर सही साबित कर दिया है."
'ताइवान को लेकर अमेरिका हुआ कमज़ोर'
हू शीजिन के अनुसार, ईरान युद्ध ने अमेरिका के संसाधनों पर भारी दबाव डाला, जबकि चीन ने स्थिर और शांतिपूर्ण विकास की अपनी गति बनाए रखी.
उन्होंने कहा कि चीन हर कुछ वर्षों में विकास के नए स्तर पर पहुंचता रहा है और अब वह दुनिया की सबसे व्यापक सप्लाई चेन वाला देश बन चुका है. साथ ही कई क्षेत्रों में दुनिया का नेतृत्व करने की स्थिति हासिल कर चुका है.
हू ने दावा किया कि ईरान युद्ध में अमेरिका की "हार" ने ताइवान स्ट्रेट में उसकी समग्र प्रतिरोधक क्षमता को भी काफ़ी कमज़ोर कर दिया है.
उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका किसी मध्यम शक्ति वाले देश के ख़िलाफ़ युद्ध में निर्णायक सफलता हासिल नहीं कर पाया, तो संभव है कि उसने चीन जैसी बड़ी शक्ति के ख़िलाफ़ ताइवान को लेकर उच्च-स्तरीय सैन्य हस्तक्षेप का विकल्प लगभग छोड़ दिया हो.
हू ने कहा कि यह धारणा अमेरिकी रणनीतिक और मीडिया हलकों में धीरे-धीरे स्वीकार की जा रही है, भले ही इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार न किया जाता हो.
इसके अलावा हू शीजिन ने चीन की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति की भी सराहना की.
उन्होंने कहा कि अलग-अलग स्रोतों से तेल आपूर्ति, बड़े पैमाने पर रणनीतिक भंडार, नई ऊर्जा तकनीकों का विकास, इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग का विस्तार और अर्थव्यवस्था के तेजी से बिजली पर निर्भरता बढ़ने से चीन को ख़ास ताक़त मिली है.
उनके अनुसार दुनिया के सबसे बड़े बिजली ग्रिड ने चीनी अर्थव्यवस्था को "उल्लेखनीय लचीलापन" दिया है. ये ग्रिड काफ़ी हद तक तेल पर निर्भर नहीं है. यही कारण है कि चीन की आर्थिक मज़बूती और संकट झेलने की क्षमता दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.