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'हो सकता है शायद आप आख़िरी बार मेरी आवाज़ सुन रहे हों', ईरान में राजनीतिक फांसी के मामले बढ़े
- Author, कैरोलिन हॉली
- Author, ग़ोन्चेह हबीबीजाद
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
ऐसा लगता है कि लाइन में कुछ खड़खड़ाहट है, लेकिन मेहराब अब्दुल्लाज़ादेह की आवाज़ साफ़ है और, मौजूदा हालात को देखते हुए हैरानी इस बात की है कि वह काफ़ी स्थिर हैं.
वह पश्चिमी ईरान में मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं. वह जल्दी-जल्दी बोलते हैं, जैसे कि उनके पास समय कम बचा हो. उनका संदेश बेहद बेचैन करने वाला है.
कुर्दिस्तान मानवाधिकार नेटवर्क को मिली एक वॉइस नोट में वह कहते हैं, "आप मेरी आवाज़ उरुमिया सेंट्रल जेल से सुन रहे हैं, और हो सकता है कि यह आख़िरी बार हो जब आप इसे सुनें."
"मेरी गिरफ़्तारी के पहले ही दिन से उन्होंने मुझे यातनाएं देकर और धमकियां देकर ज़बरदस्ती मुझसे गुनाह कबूल करवाए. ऐसे गुनाह जो पूरी तरह से झूठे थे. मुझ पर लगाए गए आरोपों में से कुछ भी सच नहीं है. वे यह जानते हैं और ख़ुदा भी यह जानता है कि मैं बेकसूर हूँ."
मेहराब को साल 2022 में गिरफ़्तार किया गया था, उस समय पूरे ईरान में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे.
ये प्रदर्शन एक युवा महिला, महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में हुई मौत के बाद शुरू हुए थे. महसा को ठीक से हिजाब न पहनने के आरोप में हिरासत में लिया गया था.
मेहराब पर ईरान की बासिज मिलिशिया सेना के एक सदस्य की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया गया था.
42 महीनों के डर और रातों की नींद हराम करने के बाद, इस महीने की शुरुआत में उन्हें मौत की सज़ा दे दी गई.
यह ईरान में राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी आरोपों पर लोगों को दी जाने वाली मौत की सज़ाओं में अचानक आई तेज़ी का ही एक हिस्सा था.
राजनीतिक क़ैदियों को मौत की सज़ा के बढ़ते मामले
28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला किया था. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उसके बाद उसने कम से कम 32 राजनीतिक क़ैदियों को दी गई मौत की सज़ा की पुष्टि की है.
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, यह साल-दर-साल मौत की सज़ा में होने वाली बढ़ोतरी को दिखाता है. ईरान में साल 2025 में राजनीतिक मक़सद से लगाए गए आरोपों के आधार पर कुल 45 लोगों को मौत की सज़ा दी गई.
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने चेतावनी दी है कि राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए मौत की सज़ा का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है.
इस साल मारे गए लोगों में से कई पर इसराइल या सीआईए के लिए जासूसी करने का आरोप था, जबकि कुछ पर निर्वासित विपक्षी गुटों से जुड़े होने का आरोप था.
उनमें से 14 लोगों को इस साल जनवरी में हुए विद्रोह के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया था, जिसे भारी हिंसा के साथ कुचल दिया गया था. इसकी वजह से दावा है कि ईरान में हज़ारों लोगों की मौत हुई थी.
एमनेस्टी इंटरनेशनल का क्या कहना है
एमनेस्टी इंटरनेशनल की नसीम पापायानी कहती हैं, "ईरान में अधिकारी फांसी देकर मौत की सज़ा देते हैं. वे इसे सुबह-सुबह अंजाम देते हैं. ईरान में लोग लगभग हर दिन मौत की सज़ा के एलान सुनकर जागते हैं."
"वे मौत की सज़ा को राजनीतिक दमन के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोगों में डर पैदा किया जा सके, और असल में किसी भी तरह के विरोध को कुचला और दबाया जा सके."
हालांकि कुछ मौत की सज़ाओं का एलान सार्वजनिक तौर पर किया जाता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि उन्हें इस बात की चिंता है कि बाक़ी सज़ाएं गुपचुप तरीके से दी जा रही हैं.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक़, पिछले साल ईरान ने 2,159 लोगों को मौत की सज़ा दी थी - जो 1989 के बाद से सबसे बड़ी संख्या है. उसका कहना है कि इनमें से ज़्यादातर मामले नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों या हत्या के थे.
संयुक्त राष्ट्र को डर है कि इस साल यह आंकड़ा और भी ज़्यादा बढ़ सकता है.
कुर्दिस्तान मानवाधिकार नेटवर्क के कावेह करमानशाही के मुताबिक़, "मौत की सज़ा के बढ़ते इस्तेमाल के ज़रिए, यह शासन अपनी सत्ता को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि जनवरी के विद्रोह और युद्ध की वजह से उसकी छवि को नुक़सान पहुंचा था."
वह कहते हैं, "ऐसे समय में जब ईरानी शासन कई अंदरूनी और बाहरी संकटों का सामना कर रहा है, वह सख़्त दमन और मौत की सज़ाओं में बढ़ोतरी के ज़रिए अपनी ताक़त का प्रदर्शन करने और यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि हम अब भी यहां हैं, और हालात अब भी हमारे ही काबू में हैं."
पिछले महीने के आखिर में, सरकारी टेलीविज़न पर सासन आज़ादवार को दी गई मौत की सज़ा पर एक रिपोर्ट दिखाई गई.
सासन मध्य शहर इस्फ़हान के रहने वाले 21 साल के कराटे चैंपियन थे.
ईरान का क्या कहना है
उसे 'मोहारेबेह' या 'ईश्वर के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने' और जनवरी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बलों पर हमला करने के लिए 'दुश्मन के साथ प्रभावी सहयोग' का दोषी ठहराया गया था.
उसे एक पुलिस कार की खिड़की तोड़ने के लिए लाठी का इस्तेमाल करने और उसे आग लगाने के लिए पेट्रोल मांगने की बात कबूल करते हुए दिखाया गया है.
लेकिन उन पर किसी भी ऐसे जानलेवा अपराध का आरोप नहीं था, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मृत्युदंड दिए जाने के लिए कानूनी मापदंड है.
मौत की सज़ा के बढ़ते इस्तेमाल पर बीबीसी ने ईरानी अधिकारियों से उनकी टिप्पणी के लिए आग्रह किया, लेकिन उनकी तरफ से फ़ौरन कोई जवाब नहीं मिला. इनमें आज़ादवार को दी गई सज़ा और यातना दिए जाने के आरोप भी शामिल हैं.
लेकिन 30 अप्रैल को, ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख, गुलाम हुसैन मोहसेनी एजेई ने मौत की सज़ाओं पर हो रही अंतरराष्ट्रीय आलोचना को खारिज कर दिया.
उन्होंने कहा कि उनकी अदालतें इस आलोचना से प्रभावित नहीं होंगी.
मौत की सज़ा पाए हर व्यक्ति की अपनी एक कहानी है. लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता कुछ परेशान करने वाले पैटर्न की ओर इशारा करते हैं.
मौत की सज़ा का इस्तेमाल देश के अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों के ख़िलाफ़ बहुत ज़्यादा किया जा रहा है.
एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स कर रहे 29 साल के छात्र इरफ़ान शकूरज़ादेह को 11 मई को फाँसी दे दी गई.
ईरान की न्यायपालिका ने कहा कि उन्हें इसराइली और अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ गोपनीय जानकारी साझा करने का दोषी पाया गया था.
'कई लोगों की जान ख़तरे में'
लेकिन नॉर्वे स्थित मानवाधिकार संगठन 'हेंगाव' ने एक नोट प्रकाशित किया, जिसके बारे में उनका कहना है कि इरफ़ान ने अपनी मौत से पहले यह नोट लिखा था.
उन्होंने लिखा, "मुझे जासूसी के मनगढ़ंत आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था और साढ़े आठ महीने की यातना और एकांत कारावास के बाद मुझसे ज़बरदस्ती झूठा कबूलनामा करवाया गया. किसी और बेक़सूर की जान को खामोशी से मत जाने देना."
हेंगाव ने कहा कि जिस तेज़ी से मुक़दमे चल रहे हैं, सज़ाएँ सुनाई जा रही हैं और फाँसियाँ दी जा रही हैं, उसे लेकर वे बहुत चिंतित हैं. साथ ही, न्यायिक प्रक्रियाओं में "पूरी तरह से पारदर्शिता की कमी" भी एक बड़ी चिंता का विषय है.
इस समूह के अयवार शेखी ने बीबीसी को बताया, "इस्लामिक गणराज्य अपनी आबादी का व्यवस्थित दमन जारी रखे हुए है. वे असंतुष्टों और आलोचकों पर बिना कोई भरोसेमंद सबूत पेश किए या निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी के मनमाने ढंग से 'इसराइली जासूस' होने का आरोप लगाते हैं."
उन्होंने आगे कहा कि ईरान में "कई लोगों की जान ख़तरे में है."
फाँसी से पहले जेल से भेजे गए अपने एक वॉइस मैसेज में, मेहराब अब्दुल्लाज़ादेह ने मौत की सज़ा का इंतज़ार करते हुए होने वाली मानसिक पीड़ा का ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा, "मौत की सज़ा पाया हुआ व्यक्ति हर रात और दिन यही सोचता रहता है कि किसी भी पल उसे बुलाया जा सकता है और फाँसी देने के लिए ले जाया जा सकता है."
"मौत की सज़ा पाए व्यक्ति को रात में 1 बजे के बाद ही थोड़ी-बहुत शांति मिल पाती है; शायद तब जाकर वह अपने मन में चल रहे तेज़ विचारों को शांत करके दो-तीन घंटे सो पाता है."
कुर्दिस्तान मानवाधिकार नेटवर्क के अनुसार, 29 साल के एक कुर्द दुकानदार को फाँसी दे दी गई.
उनके रिश्तेदारों या वकीलों को भी इसकी कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी, और उनका शव भी उसके परिवार को नहीं सौंपा गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित