ई20 पेट्रोल का गाड़ियों पर क्या होता है असर? सरकार और एक्सपर्ट्स का ये है कहना

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भारत सरकार का पेट्रोल में बायोफ्यूल (इथेनॉल) ब्लेंड बढ़ाने का फ़ैसला विवाद के केंद्र में है.
सरकार का तर्क है कि पेट्रोल में 20 फ़ीसदी इथेनॉल मिलाने से भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, कार्बन उत्सर्जन कम होगा और किसानों की आय बढ़ेगी.
वहीं, वाहन चालक इससे माइलेज (प्रति किलोमीटर खपत) में कमी आने और इंजन में ख़राबी का दावा कर रहे हैं.
विपक्षी राजनीतिक दल भी सरकार को इथेनॉल के मुद्दे पर घेर रहे हैं.
इस विवाद पर सोशल मीडिया पर भी जमकर बहस हो रही है और कई लोग अपनी गाड़ियों में आ रही ख़राबी का ज़िक्र कर रहे हैं.
पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट्स की बाढ़ आ गई है जिनमें वाहन चालक इंजन में ख़राबी, कम माइलेज और ख़राब परफार्मेंस के दावे कर रहे हैं.

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पिछले सप्ताह ही दिल्ली में कई वाहन चालकों ने इथेनॉल मिश्रण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया.
प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर जल्दबाज़ी में इथेनॉल नीति लागू करने के आरोप लगाए और दावा किया कि उनके पास फ्यूल स्टेशन पर मर्ज़ी का ईंधन डलवाने के कम विकल्प हैं. ये दावा भी किया गया कि इथेनॉल की वजह से इंजन सर्विस पर ख़र्च बढ़ गया है.
बीबीसी ने मुंबई में कई दोपहिया और चार पहिया सर्विस स्टेशन पर काम करने वाले मैकेनिकों से बात की. कुछ का कहना था कि उनके सामने इथेनॉल से जुड़ी समस्याएं नहीं आई हैं जबकि कइयों का कहना था कि इथेनॉल मिश्रण की वजह से इंजन में दिक़्क़तों के मामले सामने आए हैं.
मोटरसाइकिल मैकेनिक मोहम्मद आरिफ़ का कहना है कि पिछले एक वर्ष में उनके पास कई पुरानी बाइकों में कार्ब्युरेटर के भीतर ईंधन के अवशेष (फ्यूल रेजिड्यू) जमा होने के मामले आए, जिनकी वजह वे इथेनॉल की अधिक मात्रा को मानते हैं.
वहीं कार सर्विस सेंटर संचालक बेसिल जैकब का कहना है कि ग्राहक माइलेज घटने की शिकायत कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "ग्राहक प्रति लीटर वही क़ीमत चुका रहे हैं, लेकिन पहले की तुलना में कम किलोमीटर चल पा रहे हैं."
ऑटोकार इंडिया के संपादक होर्मज़्द सोराबजी का कहना है कि ई20 के संभावित प्रभाव तुरंत नहीं, बल्कि लंबे समय में दिखाई दे सकते हैं.
सरकार का जवाब

माइलेज में कमी और गाड़ियों के इंजनों में आ रही ख़राबी के दावों को ख़ारिज करते हुए सरकार ने कहा है कि ई-20 पेट्रोल कार्यक्रम वैज्ञानिक शोध, चरणबद्ध क्रियान्वयन और वाहन निर्माताओं के साथ विमर्श के बाद ही लागू किया गया है.
सरकार की नीति के बचाव में कई वाहन निर्माता कंपनियां भी आ गई हैं.
पिछले सप्ताह छह बड़ी वाहन निर्माता कंपनियां सरकार की प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुईं और दावा किया कि कई साल के सर्विस और परीक्षण डेटा से वाहनों को इथेनॉल मिश्रण की वजह से बड़े पैमाने पर नुक़सान के कोई सबूत नहीं मिले हैं.
वाहन निर्माताओं ने यह तो स्वीकार किया है कि इथेनॉल मिश्रण की वजह से माइलेज में 3-3.5 प्रतिशत तक की गिरावट ज़रूर आई है.

कितना माइलेज मिलता है?
हालांकि, पेट्रोल में इथेनॉल के मिश्रण को लेकर नीति आयोग ने जून 2021 में प्रकाशित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में ही कहा था कि जो वाहन मूल रूप से ई0 (इथेनॉल रहित) या ई10 (दस प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित तेल) के लिए डिज़ाइन किए गए हैं उनके माइलेज में 6-7 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है.
हालांकि इसी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि जो वाहन ई10 ईंधन के लिए डिज़ाइन किए गए हैं उनके माइलेज में सिर्फ़ 1-2 प्रतिशत की ही गिरावट आएगी.
भारत दो पहिया वाहनों का सबसे बड़ा बाज़ार है और कारों के मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर है. बढ़ती खपत के मद्देनज़र भारत तेल आयात पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की कोशिश कर रहा है.

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शुक्रवार को जारी बयान में पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि कुछ वाहनों का माइलेज 3-5 प्रतिशत तक गिर सकता है.
वहीं राज्यसभा में दिए एक सवाल के जवाब में सरकार ने इंजन को नुक़सान पहुंचने की चिंताओं को ख़ारिज करते हुए कहा था कि इथेनॉल मिश्रित ईंधन में उच्च ऑकटेन नंबर (आरओएन) होता है जो ईंधन की कार्यक्षमता को बढ़ाता है और कंबशन (दहन) को बेहतर करने में मदद करता है.
सरकार ने संसद में यह जानकारी भी दी थी कि अंतर-मंत्रालय समिति ने ई20 के गाड़ियों पर प्रभाव का व्यापक अध्ययन किया है और फ़ील्ड ट्रायल के दौरान वाहनों के इंजन पर कोई नुक़सानदेह प्रभाव सामने नहीं आए.
भारत में ई20 ईंधन को आधिकारिक तौर पर फ़रवरी 2023 में लॉन्च किया गया था. सरकार ने साल 2030 तक ई20 लक्ष्य हासिल करने की समयसीमा रखी थी. हालांकि बाद में इसे घटाकर 2025-26 कर दिया गया था.

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बढ़ रहा विवाद
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सवालों और आलोचना के बीच शुक्रवार को भारत सरकार ने कहा है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का लक्ष्य तय समय से लगभग पांच साल पहले हासिल कर लिया गया है.
सरकार ने यह भी बताया है कि अब देश में पेट्रोल में औसतन बीस प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित हो रहा है.
सरकार ने बताया है कि साल 2013-14 में भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण 1.5 प्रतिशत से भी कम था, वहीं 2025-26 में यह 20 प्रतिशत तक पहुंच गया है.
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक़, इस दौरान भारत में इथेनॉल की ख़रीद 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 1200 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है.
सरकार ने यह भी कहा है कि पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंड करने के कार्यक्रम को जल्दबाज़ी में लागू नहीं किया गया है बल्कि इसे लेकर पायलट प्रोजेक्ट साल 2001 में ही शुरू हो गया था और साल 2006 में देश के कुछ हिस्सों में 5 प्रतिशत मिश्रण लागू किया गया था.
सरकार ने इथेनॉल को बढ़ावा देने से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होने का दावा भी किया है.
भारत के कच्चे तेल के आयात की मात्रा तो कम नहीं हुई है लेकिन सरकार के दावे का मतलब है कि अगर इथेनॉल न मिलाया गया होता तो भारत को और अधिक कच्चा तेल आयात करना पड़ता.

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सरकार के इन दावों के बीच, इथेनॉल को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है.
ये विवाद और तेज़ तब हो गया जब मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि ई20 कार्यक्रम 'एक चल रहा प्रयोग' है और इसके प्रभाव अगले कुछ सालों में साफ़ होंगे.
मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि ई20 कार्यक्रम 'एक चल रहा एक्सपेरीमेंट' है.
हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद सरकार और क़ानून मंत्रालय ने इस पर भी स्पष्टीकरण जारी किया है.
सरकार ने कहा है कि अदालत में ई20 कार्यक्रम के किसी भी चरण को 'एक्सपेरीमेंट' नहीं बताया गया है.
विपक्ष के सवाल

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विपक्ष सरकार की ई20 नीति पर सवाल उठा रहा है और आरोप लगा रहा है कि जल्दबाज़ी में लागू की गई इस नीति से कार मालिकों को नुक़सान उठाना पड़ रहा है.
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, "हरदीप पुरी ने साफ़-साफ़ कहा है कि लोगों को कोई विकल्प नहीं दिया जाएगा. लोग पेट्रल पंप पर शुद्ध पेट्रोल ई10 और ई20 विकल्पों की मांग कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हमारा जो मन होगा हम वह तेल ख़रीद लेंगे. लेकिन मंत्री कह रहे हैं कि कोई विकल्प नहीं दिया जाएगा."
केजरीवाल ने कहा, "लोग यह मांग भी कर रहे हैं कि ई20 पेट्रोल सामान्य पेट्रोल से सस्ता मिलना चाहिए, सरकार कह रही है कि कोई सस्ता नहीं दिया जाएगा. लोग कह रहे हैं कि माइलेज कम हो रही है, गाड़ियां ख़राब हो रही हैं, सरकार कह रही है कि कोई माइलेज कम नहीं हो रहा है."
अरविंद केजरीवाल ने कहा, "इतना अहंकार ठीक नहीं है, ये तानाशाही है, जब करोड़ों लोग मांग कर रहे हैं तो उनकी आवाज़ को सुनना सरकार की ज़िम्मेदारी है."
भारत में इथेनॉल के मिश्रण के बिना भी पेट्रोल उपलब्ध है लेकिन उसकी क़ीमत, अलग-अलग राज्यों में, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से 40-50 फ़ीसदी तक अधिक है. कई वाहन चालकों को ये जानकारी भी नहीं है कि वो शुद्ध पेट्रोल मांग सकते हैं.
कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने भी इसी विवाद को लेकर सरकार को घेरा. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "यह 3.6 करोड़ भारतीयों पर किया गया एक प्रयोग है."
उन्होंने आरोप लगाया कि अगर सरकार ख़ुद कह रही है कि इस नीति के परिणाम अगले कुछ सालों तक सामने आएंगे, तो इतने बड़े पैमाने पर इसे लागू करने से पहले पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण, सार्वजनिक परामर्श और सहमति होनी चाहिए थी.
एक और टिप्पणी में खड़गे ने कहा कि सरकार "नागरिकों से नुक़सान साबित करने की चुनौती नहीं दे सकती, जबकि उसका अपना डेटा अभी लंबित है."

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इससे पहले केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर किसी एक भी व्यक्ति की गाड़ी इथेनॉल की वजह से ख़राब हुई है तो वो सामने आए.
गडकरी ने कहा था, "कोई एक कार का नाम बताइये जिसमें इथेनॉल की वजह से गड़बड़ी आई हो."
इथेनॉल से लोगों को हो रही परेशानी से जुड़े सवाल पर गडकरी ने कहा था, "अगर कोई शिकायत है तो उसे डीलर को भेजिए, मेरे पास भेजिए."
इथेनॉल का बचाव करते हुए पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि इसके इस्तेमाल में कोई परेशानी नहीं है, रेसिंग कार में भी इथेनॉल का इस्तेमाल किया जाता है, इससे एक्सेलेरेशन बढ़ जाता है.
हालांकि उन्होंने कहा था कि जहां तक माइलेज का सवाल है, यह थोड़ा गिर सकता है.
हरदीप पुरी ने कहा था, कोई विवाद नहीं है, सिर्फ़ भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं.
नितिन गडकरी सड़क परिवहन मंत्री हैं लेकिन इथेनॉल को लेकर उन पर टिप्पणियां की जाती रही हैं.
गडकरी का परिवार इथेनॉल के उत्पादन से जुड़ा है. हालांकि जब उनसे इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, "इथेनॉल नीति से मेरा कोई फ़ायदा नहीं है. इथेनॉल के उत्पादन में मेरी हिस्सेदारी सिर्फ़ 0.07 प्रतिशत है."
क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

इस पूरे विवाद के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इथेनॉल नीति पर बहस केवल इंजन या माइलेज तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे वैज्ञानिक अध्ययन, उपभोक्ता अनुभव और सभी पक्षों के बीच संवाद के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा विश्लेषक हरी शेषाशयी कहते हैं, "इथेनॉल की पॉलिसी बनाना आसान नहीं है, बहुत मुश्किल है और बहुत टाइम लगता है. हमें दूसरे देशों से सीखना चाहिए कि हमारे लिए क्या अच्छा होगा, कौन से चैलेंजेस हैं और उन्हें पहले से समझना चाहिए."
उन्होंने कहा, "हमें ब्राजील के साथ समन्वय करना चाहिए कि कैसे इतने बड़े देश में लोगों को इथेनॉल की फ्लेक्सिबिलिटी मिली है."
उनका सुझाव है कि भारत में एक ऐसी साझा समिति बनाई जाए, जिसमें किसान, ऑयल कंपनियां, वाहन निर्माता, बीमा कंपनियां और अन्य सभी हितधारक शामिल हों, ताकि नीति से जुड़े विवादों का समाधान सामूहिक रूप से निकाला जा सके.
वहीं ऑटोमोटिव कंटेंट क्रिएटर ईशान भारद्वाज का कहना है कि प्रयोगशाला में होने वाले परीक्षण और आम लोगों के वास्तविक ड्राइविंग अनुभव में अंतर होता है.
उनके मुताबिक, "एआरएआई एक लैब है, जहाँ पर लैब के हिसाब से टेस्टिंग की जाती है, उसका आम आदमी के वास्तविक ड्राइविंग अनुभव से सीधा कोई संबंध नहीं है."
वो कहते हैं कि "नई तकनीकों और ई20, ई25 या उससे अधिक इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों पर काम होना चाहिए, लेकिन उपभोक्ताओं के पास अपनी गाड़ी के अनुकूल ईंधन चुनने का विकल्प भी होना चाहिए."
वो कहते हैं, "आप ई20 रखो, ई25 लेकर आओ, ई85 लेकर आओ, 100% इथेनॉल लेकर आओ... लेकिन जो हमारी चॉइस है, जिस चीज़ के लिए हमारी गाड़ी बनी है, आप उस चीज़ की तो आपूर्ति करो."
वहीं वरिष्ठ ऑटोमोटिव विश्लेषक आईवी राव इथेनॉल के पर्यावरणीय लाभों पर ज़ोर देते हैं.
उनका कहना है, "अगर आप इथेनॉल को एक ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पारंपरिक गैसोलीन वाहनों की तुलना में इसका कार्बन फुटप्रिंट बहुत कम होता है. बायोफ्यूल का उपयोग करने का यह सबसे बड़ा फ़ायदा है."
हालांकि वो यह भी कहते हैं कि किसी भी वैकल्पिक ईंधन का मूल्यांकन केवल वाहन चलने के दौरान होने वाले उत्सर्जन से नहीं, बल्कि लाइफ़ साइकिल एनालिसिस के आधार पर होना चाहिए.
यानी ईंधन के उत्पादन से लेकर उसके अंतिम उपयोग तक पूरे जीवनचक्र में होने वाले कार्बन उत्सर्जन की तुलना करके ही उसके वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.





















