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चीन और पाकिस्तान के बीच हुआ नया सीमा समझौता भारत ने क्यों ख़ारिज किया?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
दशकों से भारत हिमालय के एक विवादित हिस्से में पाकिस्तान-चीन सीमा को मान्यता देने से इनकार करता रहा है.
लेकिन पिछले हफ्ते, पाकिस्तान और चीन ने पर्वतीय क्षेत्र के एक दूरदराज़ हिस्से में एक सीमा को औपचारिक रूप दिया.
इस पर भारत की ओर से तीखी प्रतिक्रिया दी गई.
दोनों देशों ने पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग पर हस्ताक्षर किए हैं. इसे पाकिस्तान ने एक "अहम मील का पत्थर" बताया है, जो भारत के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के बीच सीमा प्रबंधन, व्यापार और संपर्क पर सहयोग को गहरा करेगा.
भारत ने इस क़दम को क़ानूनी तौर पर आधारहीन बताते हुए ख़ारिज कर दिया. भारत ने कहा है कि वह उस क्षेत्र में स्थित किसी भी पाकिस्तान-चीन सीमा को मान्यता नहीं देता.
यह घोषणा एक बेहद संवेदनशील समय पर आई है.
वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर वर्षों से चले आ रहे सैन्य तनाव के बाद भारत और चीन अपने संबंधों को स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं.
एलएसी हिमालयी सीमा के अधिकांश हिस्से पर दोनों देशों की सेनाओं को अलग करने वाली विवादित रेखा है.
वहीं दूसरी ओर, चीन और पाकिस्तान सीमा के उस पड़ोसी हिस्से पर भी सहयोग बढ़ा रहे हैं जिस पर भारत अपना दावा करता है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीमा नहीं है. हम तथाकथित संयुक्त आयोग को ख़ारिज करते हैं, जिसका कोई क़ानूनी आधार नहीं है."
किस तरह का है ये आयोग
यह आयोग पाकिस्तान-चीन सीमा से संबंधित है, जिसमें शक्सगाम घाटी भी शामिल है. यह क़रीब 5,180 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है. इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने 1963 में चीन को सौंप दिया था. हालांकि, भारत इसे लद्दाख में अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है.
भारत का कहना है कि यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर की पूर्व रियासत का हिस्सा था और चीन को सौंपे जाने से पहले पाकिस्तान ने इस पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा कर लिया था. भारत सरकार ने इस समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और इसे अवैध और अमान्य मानती है.
यही इतिहास बुधवार की घोषणा से जुड़ी खास संवेदनशीलता को दिखाता है.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, "पाकिस्तान को भारत के उस क्षेत्र के संबंध में किसी भी तरह की व्यवस्था करने का कोई अधिकार नहीं है, जिस पर उसने अवैध और जबरन कब्ज़ा कर रखा है."
पाकिस्तान का कहना है कि जम्मू-कश्मीर अब भी विवादित क्षेत्र है और इसलिए भारत को चीन के साथ पाकिस्तान के 1963 के सीमा समझौते को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है. पाकिस्तान इस समझौते को वैध मानता है.
दिल्ली की शिव नादर यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय संबंध और शासन अध्ययन विभाग के प्रोफेसर जबिन टी. जैकब ने कहा कि यह नया घटनाक्रम पूरी तरह नई व्यवस्था के बजाय एक पुरानी व्यवस्था को फिर से सक्रिय करने का संकेत है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "1963 के चीन-पाकिस्तान समझौते में संयुक्त सीमा आयोग का प्रावधान है. इस समय एकमात्र मुद्दा इसके संचालन में लाए जाने का है."
उन्होंने कहा कि इसकी टाइमिंग के पीछे कई वजहें हो सकती हैं.
उन्होंने कहा कि इनमें चीन की अपनी सरहदों का सीमांकन करने की व्यापक कोशिश और सीमा पर आपसी संपर्क और आवाजाही को संस्थागत रूप देने की इच्छा शामिल हो सकती है, जब पाकिस्तान की दूसरी सीमाओं पर संघर्ष और अस्थिरता का दौर जारी है.
क्या है 1963 की संधि
जैकब ने कहा कि भारत को इस घटनाक्रम को लेकर "चिंतित" होना चाहिए. उन्होंने कहा कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह क़दम 1963 की संधि के ही एक प्रावधान की अनदेखी करता हुआ नज़र आता है.
जैकब के मुताबिक़, समझौते के अनुच्छेद 6 में प्रावधान था कि कश्मीर विवाद का समाधान होने के बाद उस देश के साथ समझौते पर फिर से बातचीत की जाएगी, जो आख़िरकार इस क्षेत्र को नियंत्रित करेगा.
जैकब ने कहा कि भारत के लिए समस्या अंतरराष्ट्रीय सूचना के माहौल की वजह से और बढ़ जाती है.
उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सूचना के क्षेत्र में चीन की अपेक्षाकृत मज़बूत स्थिति है. सीजीटीएन, सीआरआई और सोशल मीडिया पर उसकी मौजूदगी के मुकाबले भारत की स्थिति सीमित है. इससे चीन दुनियाभर में अपना पक्ष और नक्शे पेश कर पाता है, जबकि भारत की प्रतिक्रिया सिर्फ़ नाराज़गी जताने तक सीमित रह जाती है, जिसे दुनिया के बाक़ी देश शायद नज़रअंदाज़ कर देंगी."
यह चिंता सीमा के व्यावहारिक प्रबंधन से अलग है. पाकिस्तान और चीन के पास पहले से ही इस क्षेत्र में व्यापक बुनियादी ढांचा और संपर्क व्यवस्था है.
इसमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) और काराकोरम हाइवे शामिल हैं.
हुसैन हक्कानी अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हैं. अब हक़्क़ानी अनवर गरगाश डिप्लोमैटिक अकादमी और हडसन इंस्टीट्यूट में एक वरिष्ठ फेलो हैं.
उनका कहना है कि नया आयोग व्यावहारिक और राजनीतिक दोनों है.
हक्कानी ने बीबीसी को बताया, "यह सीमा और सीमा सहयोग को बढ़ाने, अवैध घुसपैठ को रोकने और सीपीईसी से जुड़े रणनीतिक बुनियादी ढांचे की रक्षा करने का एक तंत्र है."
उन्होंने कहा कि इससे भारत को यह संकेत भी मिला कि बीजिंग कश्मीर को पाकिस्तानी नज़रिए से ही देखता है.
हक़्क़ानी कहते हैं, "चीन ने कश्मीर पर भारत के रुख़ को कभी स्वीकार नहीं किया है और चीन गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तानी नज़रिए से देखता है, न कि भारतीय नज़रिए से."
हक्कानी ने कहा कि भारत प्रशासित कश्मीर में हुए घटनाक्रमों के जवाब में इस्लामाबाद के रुख में बदलाव आया है.
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान अब भी यही कहता है कि जम्मू और कश्मीर की अंतिम स्थिति अभी तय नहीं हुई है. लेकिन भारत ने कश्मीर के अपने हिस्से में आंतरिक बदलाव किए हैं. मिसाल के तौर पर अनुच्छेद 370 को निरस्त किया है. इसलिए पाकिस्तान को 1963 से चीन के साथ जो वास्तविक स्थिति रही है, उसे संस्थागत रूप देने में कोई समस्या नहीं दिखती."
चीन ने क्यों लिया ऐसा फ़ैसला
चीन के लिए, यह व्यवस्था पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों का उपयोग करके भारत के प्रति अपनी स्थिति को प्रबंधित करने और संकेत देने के व्यापक पैटर्न में भी फिट बैठती है.
हक्कानी ने कहा कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को आश्वासन देना चीन के लिए रणनीतिक और भूराजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.
हक़्क़ानी कहते हैं, "रणनीतिक मोर्चे पर यह पाकिस्तान के साथ संबंधों को और गहरा करता है और भू-रणनीतिक मोर्चे पर यह भारत के लिए चीन और पाकिस्तान से दोहरे मोर्चे के ख़तरे के डर को मज़बूत करता है. ये पाकिस्तान को खुश करता है और चीन को फ़ायदा पहुंचाता है."
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बयान का समय भी महत्वपूर्ण है.
हक़्क़ानी कहते हैं, "चीन हमेशा अपने फ़ैसलों की योजना महीनों, बल्कि सालों पहले ही बना लेता है, इसलिए संयुक्त सीमा आयोग को चालू करने का फ़ैसला कुछ समय पहले ही लिया गया होगा."
"इस जानकारी को राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया ब्रिक्स शिखर सम्मेलन यात्रा के बाद जारी किया गया ताकि पाकिस्तान को रणनीतिक साझेदारी में आश्वासन का संदेश दिया जा सके और भारत को यह याद दिलाया जा सके कि दक्षिण एशिया के प्रति चीन के दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं लाता है."
लेकिन जैकब ने चेतावनी दी कि घटनाक्रम के हर पहलू को भारत के ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "फ़िलहाल एलएसी पर कोई तत्काल या स्पष्ट प्रभाव नहीं दिख रहा है."
इससे यह पता चलता है कि पिछले हफ़्ते की घोषणा का महत्व विवादित हिमालयी सीमा में तत्काल बदलाव की तुलना में उन व्यवस्थाओं के संस्थागतकरण में निहित हो सकता है जिन्हें भारत लगातार नामंज़ूर करता रहा है.
रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत का रुख "स्पष्ट और सुसंगत" बना हुआ है, "दिल्ली द्वारा भारतीय इलाक़े पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैध ठहराने का कोई भी प्रयास अस्वीकार्य है और इसका भारत की संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता है."
लेकिन हक्कानी का मानना है कि यह विवाद सीमाओं की कानूनी सीमाओं से परे है.
उन्होंने कहा, "सीमा को लेकर भारत और चीन के बीच मुख्य मतभेद भू-रणनीतिक है, न कि मानचित्र संबंधी."
उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान अब भी "भारत के खिलाफ चीन का दूसरा डेटेरेंट" बना हुआ है. उन्होंने कहा कि चीन का पाकिस्तान के साथ जुड़ाव दिल्ली को यही संदेश देता रहेगा.
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
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