धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा मोदी सरकार के लिए झटका है या एक बड़ा मौक़ा?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उनके ख़िलाफ़ एक महीने के ज़्यादा समय से दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी का प्रदर्शन चल रहा था. साथ ही देशभर में युवाओं का आंदोलन शुरू हो गया था.
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा मोदी सरकार के लिए एक बड़े झटके की तरह देखा जा रहा है, क्योंकि यह पहला मौक़ा है जब किसी आंदोलन की वजह से उनके किसी मंत्री को पद छोड़ना पड़ा है.
इससे पहले भी कई मौक़े आए जब विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और इसके मंत्रियों को लेकर अलग-अलग मामलों में दबाव बनाया है, लेकिन उसका ज़्यादा असर देखने को नहीं मिला.
इस मामले में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह के एक बयान की अक्सर चर्चा होती है कि 'मोदी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते.'
दूसरी ओर बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने एक्स पर पोस्ट कर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की तारीफ़ की.
नितिन नबीन ने एक्स पर लिखा, "केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने और ऐतिहासिक राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) को सफलतापूर्वक लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके अलावा भी उन्होंने कई अहम पहलों को आगे बढ़ाया."
तो अब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़ा देने के बाद इसका क्या मतलब है, हम कुछ एक्सपर्ट्स से बातचीत कर इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.
'स्टूडेंट्स के आंदोलन की ऐतिहासिक सफलता'

साल 2014 के बाद से ऐसे कई मौक़े आए जब मोदी सरकार की नीतियों या किसी मुद्दे पर विपक्षी दलों ने सरकार का घेराव किया.
नोटबंदी, जीएसटी, रोज़गार और भर्ती परीक्षाओं, सीएए-एनआरसी और एसआईआर जैसे कई मुद्दों पर विपक्षी दलों से लेकर युवाओं ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर मोर्चा खोला था.
लेकिन ऐसे विरोध या आंदोलनों का सरकार पर बहुत ज़्यादा असर होता नहीं दिखा. पीएम मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी एक के बाद एक कई चुनावों में जीत हासिल करती रही और उनके ख़िलाफ़ हर मुद्दा धराशायी होता रहा.
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर स्टूडेंट्स का प्रदर्शन 20 जून से चल रहा था.

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हालाँकि 17 जुलाई तक इन प्रदर्शनों का बहुत ज़्यादा असर नहीं दिख रहा था. लेकिन 18 जुलाई की सुबह दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर के अनशन स्थल से उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया.
इसी घटना के बाद स्टूडेंट्स की मांगों को बड़ी संख्या में युवाओं का समर्थन मिला. इसके बाद 20 जुलाई को सीजेपी के संसद मार्च पर पुलिस की कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने शेयर किए.
इसके बाद सरकार पर राजनीति, खेल, फ़िल्म, कला और अन्य कई क्षेत्रों से दबाव बढ़ने लगा, जिसका नतीजा 25 जुलाई, शनिवार के दिन देखने को मिला, जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा.

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वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा के मुताबिक़, "यह स्टूडेंट्स की ऐतिहासिक सफलता है. जेपी के आंदोलन को भी तीन साल बाद सफलता मिली थी, जब उन्होंने चुनावों में 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार को हराया था. जबकि यहां तो महज़ 36 दिन में उन्होंने सरकार को अपनी मांगों के आगे झुका दिया."
वह कहते हैं, "मूल रूप से तो यह पिछले 4-5 दिनों के दबाव की सफलता है. स्टूडेंट्स के समर्थन में देशभर में आंदोलन शुरू हो गए. मुंबई, पुणे, लखनऊ, जयपुर हर जगह आंदोलन शुरू हो गए. बिहार में पटना जैसे बड़े शहर की बात छोड़ दीजिए खगौल जैसी छोटी जगह पर भी युवा सड़कों पर उतर गए. दरभंगा, सिवान, छपरा, औरंगाबाद, जहानाबाद, शेखपुरा कई जगह स्टूडेंट्स सड़कों पर थे."
'सरकार के लिए बड़ा झटका, लेकिन मौक़ा भी'

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के मुताबिक़, यह विपक्षी दलों से लेकर स्टूडेंट्स तक हर किसी के लिए 'विन-विन' यानी जीत की स्थिति है.
उनका कहना है, "यह पीएम मोदी और सरकार के लिए बहुत बड़ा झटका है. अगर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा नहीं होता तो यह आंदोलन और बढ़ जाता. युवाओं के आक्रोश को ठंडा करने के लिए उनका इस्तीफ़ा ज़रूरी था."
नीरजा चौधरी का मानना है कि यह आंदोलन बताता है कि लोकतांत्रिक तरीके़ से बदलाव लाया जा सकता है.
हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई इसमें सरकार के लिए झटके के साथ ही एक मौक़ा भी देख रहे हैं.
उनका कहना है, "यह हालात ज़ाहिर तौर पर मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका है. लेकिन इसमें पीएम मोदी के लिए मौक़ा भी है. अगर स्टूडेंट्स और विपक्ष में इसका श्रेय लेने की होड़ मचती है तो सरकार इस दरार को और बढ़ाने में पीछे नहीं हटेगी."
रशीद किदवई आगे कहते हैं, "अगर ऐसा हुआ तो केंद्र सरकार डिलिमिटेशन जैसे कई बिल संसद के इसी सत्र में पास करा लेगी और यह उनके लिए हारी हुई बाज़ी जीतने जैसी स्थिति होगी."

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केंद्र सरकार के लिए शुक्रवार का दिन काफ़ी मुश्किलों से भरा दिखा. एक तरफ़ उसके प्रतिनिधियों और सीजेपी के बीच बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई.
शाम को राहुल गांधी भी पेलेट गन से घायल एक शख़्स को लेकर मीडिया के सामने आ गए. केंद्र पर दबाव का यह सिलसिला शनिवार को भी जारी रहा.
वहीं आरएसएस प्रमुख मोहन भागवन ने दिल्ली में आयोजित 'विश्व मंगल्य सभा' कार्यक्रम में कहा, "हम जब छोटे थे, तब माता-पिता जो कहते थे, उस पर कोई बहस नहीं करते थे. चुप यानी चुप. लेकिन अब ऐसा नहीं है, नई पीढ़ी सवाल पूछती है, उसे तर्क बताना पड़ता है."
उन्होंने कहा, "आज की पीढ़ी को अधिक अपनापन देने की ज़रूरत है. उनके साथ समय बिताना होगा. उनसे बात करनी होगी."
भागवत का यह बयान जंतर-मंतर पर स्टूडेंट्स के प्रदर्शनों के बीच आया.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का क्या हो सकता है असर

लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "मेरा मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के पीछे आरएसएस का दबाव और मोहन भागवत का बयान भी है. यह आंदोलन किसी राजनेता के नेतृत्व में नहीं चल रहा था. यह स्टूडेंट्स का, स्टूडेंट्स के लिए और स्टूडेंट्स द्वारा चलाया जा रहा आंदोलन था, और इस मायने में यह ख़ास था."
लव कुमार मिश्रा के मुताबिक़, अगर धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा नहीं देते तो यह सरकार की साख़ के लिए ख़तरा बन सकता था.
उनका कहना है, "नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में जो हुआ, सरकार को उसका भी डर था. भारत में भी स्टूडेंट्स के सामने बेरोज़गारी समेत कई मुद्दे हैं, जो पेपर लीक के मामले में एक साथ फूट पड़े. सरकार को इस पर ध्यान देना होगा."
वह कहते हैं, "जिस तरह के युवाओं को लेकर कॉकरोच के नाम से टिप्पणी की गई. उसे देखकर लगता है कि इन्हें अब कॉकरोच को भी फिर से परिभाषित करना पड़ेगा."
15 मई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई के समय कहा था कि कुछ युवा ऐसे हैं, जो रोज़गार नहीं मिलने और पेशे में जगह न बना पाने के कारण कॉकरोच की तरह हर जगह फैल जाते हैं.

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हालांकि अपनी टिप्पणी पर सोशल मीडिया में विवाद खड़ा होने के बाद जारी बयान में मुख्य न्यायाधीश ने 16 मई को कहा कि उनकी टिप्पणियां केवल उन लोगों के ख़िलाफ थीं, जिन्होंने फ़र्ज़ी या नकली डिग्रियों के सहारे वकालत जैसे पेशों में प्रवेश किया है, न कि सामान्य रूप से युवाओं के ख़िलाफ़.
लेकिन तब तक बात काफ़ी आगे बढ़ गई और अभिजीत दीपके ने कॉकरोच शब्द के ज़रिए सोशल मीडिया पर मज़ाकिया अंदाज़ में जो पहल शुरू की थी, उसे बढ़ता समर्थन देख कर उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी बना ली.

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नीरजा चौधरी कहती हैं, "यह नौजवानों की बड़ी जीत है. इसने असरदार राजनेता पैदा कर दिए हैं. इससे लोकतंत्र के साथ ही विपक्षी दलों को भी मौक़ा मिलेगा."
हालाँकि रशीद किदवई इस जीत में विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती भी देखते हैं.
उनका कहना है, "अब पीएम मोदी और सरकार फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट वगैरह की बात करेंगे, हालांकि इसका जनता पर ज़्यादा असर नहीं होता है. लेकिन चुनावी राजनीति में अभी उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं. इसमें यूपी का चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण होगा."
"अगर बीजेपी फिर से उत्तर प्रदेश में जीत जाती है और पंजाब में किसकी सरकार बनती है, यह सभी दलों के लिए एक बड़ा मैसेज होगा."
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