नॉर्वे भारत को लोकतंत्र क्यों मानता है? इस सवाल पर क्या बोले वहां के प्रधानमंत्री

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नॉर्वे की पत्रकार हेला लेंग ने 'भारत में लोकतंत्र' और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'प्रेस कॉन्फ़्रेंस ना करने' के बारे में नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्टोरे से भी बात की.
उन्होंने इस संक्षिप्त बातचीत को एक्स पर पोस्ट किया.
हेला लेंग वही पत्रकार हैं जिन्होंने पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे पर उनसे सवाल पूछा था, "प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?"
लेकिन पीएम बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए थे. हेला लेंग इसी के बाद चर्चा में आ गईं और भारत में भी उनके बारे में सोशल मीडिया पर काफ़ी डिबेट चली. जिसमें लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आईं. उन्हें तारीफ़ भी मिली और आलोचना भी.
हेला लेंग ने इस घटनाक्रम के बाद मंगलवार को नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्टोरे से पूछा, "नॉर्वे भारत को लोकतंत्र क्यों मानता है जबकि भारतीय पीएम पिछले 12 साल से घरेलू स्तर पर कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर रहे. क्या फ़्री प्रेस अब लोकतंत्र के लिए ज़रूरी नहीं रह गया?"
इसके जवाब में नॉर्वे के पीएम ने कहा, "भारत नियमित रूप से राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर चुनाव कराता है. पीएम मोदी लोगों से जुड़ते हैं. 'मन की बात' और नियमित रैलियों के ज़रिए वो सीधे एक अरब 40 करोड़ की आबादी से जुड़ते हैं. यही सच्चा लोकतांत्रिक संवाद है."
पीएम मोदी के संवाद के तरीक़े पर क्या बोले नॉर्वे के पीएम

हालांकि इस बातचीत में योनास गार स्टोरे ने नॉर्डिक देशों (नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड) और भारत के बीच सांस्कृतिक अंतर को स्वीकार किया और कहा कि भारत इन देशों की तुलना में बहुत बड़ा है और वहां जनता से जुड़ने के लिए अलग तरीक़ों का इस्तेमाल किया जाता है."
जहां स्टोरे ने दोनों देशों (भारत और नॉर्वे) के प्रेस कल्चर में फ़र्क की बात मानी, वहीं उन्होंने पीएम मोदी के जनता के जुड़ने के तरीक़ों के प्रति सम्मान भी जताया.
इससे पहले नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने 'द हिंदू' की पत्रकार सुहासिनी हैदर से बातचीत के दौरान भारत की रूस से नज़दीकी और उससे तेल ख़रीद का ज़िक्र करते हुए कहा था कि 'उनका देश भारत की ऊर्जा ज़रूरतों को समझता है लेकिन साथ ही उम्मीद करता है कि रूस से क़रीबी का फ़ायदा उठाकर भारत यूक्रेन वॉर को रुकवाने और सीज़फ़ायर क़ायम करने में मदद करेगा.'

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़िलहाल इटली में हैं. इससे पहले वो नॉर्वे में थे जहां 19 मई (मंगलवार) को ओस्लो में हुए नॉर्डिक–इंडिया समिट के दौरान उन्होंने नॉर्डिक देशों के कई नेताओं से मुलाकात की.
इनमें प्रमुख रूप से शामिल थे, नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्टोरे, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ़्रेड्रिक्सन, स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ़ क्रिस्टर्सन, फ़िनलैंड के प्रधानमंत्री पेट्री ओर्पो और आइसलैंड की प्रधानमंत्री क्रिस्ट्रून फ़्रॉस्टुडॉटेर.
इस समिट में व्यापार, जलवायु सहयोग और तकनीकी साझेदारी जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई.
सुर्ख़ियों में रहा दौरा

पीएम मोदी का नॉर्वे दौरा विवादों की वजह से सुर्ख़ियों में रहा. नॉर्वे की एक पत्रकार हेला लेंग ने उनसे सवाल पूछा, "प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?"
लेकिन पीएम बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए. इसकी भारत में काफ़ी चर्चा हुई और हेला लेंग के समर्थन के साथ-साथ उनके विरोध की आवाज़ें भी सुनाई दीं.
साथ ही नॉर्वे के एक अहम अख़बार 'आफ़्टेनपोस्टेन' में पीएम मोदी पर एक कार्टून छपा जिसमें उन्हें सँपेरे के रूप में और पेट्रोल पंप के पाइप को सांप की तरह दिखाया गया था.
कई यूज़र्स और टिप्पणीकारों ने इसे 'नस्लवादी' बताया और कहा कि यह उस औपनिवेशिक काल की याद दिलाता है जहां पश्चिमी मीडिया लंबे समय से भारत को पिछड़ा दिखाने की कोशिश करता रहा है.
हालांकि जिस ओपिनियन लेख के साथ ये कार्टून छपा उसमें पीएम मोदी की आलोचना के साथ-साथ तारीफ़ भी लिखी है.
लेख में लिखा है कि जैसे डोनाल्ड ट्रंप 'अमेरिका फ़र्स्ट' की बात करते हैं उसी तरह से नरेंद्र मोदी 'इंडिया फ़र्स्ट' की बातें करते हैं.
इसके लेखक फ्रैंक रोज़ेविक ने मोदी को एक व्यावहारिक नेता बताया और कहा कि उनकी विदेश नीति व्यावहारिकता पर आधारित है जिसका आधार विचारधारा नहीं है बल्कि ये है कि कौन सा देश भारत के कितने काम का है. फ़्रैंक रोज़ेविक ने लिखा है कि इसी नीति के तहत मोदी उन देशों के साथ भी संबंध साधने की कोशिश करते हैं जो आपस में ही एक-दूसरे से सहमत नहीं होते.
उन्होंने लिखा कि भारत अलग-अलग देशों की शासन प्रणालियों की परवाह नहीं करता और युद्ध चल रहे हों तो भी भारत इस बात को अहमियत देता है कि उसे किस देश से संबंध रखने में क्या फ़ायदा मिलता है.
हेला लेंग ने बीबीसी से क्या कहा था?

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पत्रकार हेला लेंग ने पीएम मोदी से सवाल करने की घटना के बारे में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा है कि पत्रकार होने के नाते सवाल पूछना उनका काम है और जब कोई ताक़तवर देश उनके छोटे से देश में आता है और उनसे संबंध मज़बूत करना चाहता है, तो सवाल पूछना उनकी ज़िम्मेदारी है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के संपादक नितिन श्रीवास्तव से बात करते हुए हेला ने कहा, "मैं पिछले पांच साल से ज़्यादा समय से पत्रकार के तौर पर काम कर रही हूं. मैंने नॉर्वे के राष्ट्रीय अख़बारों के साथ काम किया है. अपने पिछले अख़बार के लिए मुझे अमेरिका चुनाव कवर करने के लिए भी भेजा गया था. और अब मैं वापस नॉर्वे में हूं, जहां राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को कवर करती हूं. लेकिन अब एक कमेंटेटर की भूमिका में हूं."
हेला ने बताया कि भारतीय मीडिया नॉर्वे के प्रधानमंत्री से सवाल पूछ रहा था लेकिन भारत के प्रधानमंत्री से नहीं और ये देखने पर भी वो हैरान नहीं हुईं.
उन्होंने कहा, "ये चौंकाने वाली बात नहीं है. बल्कि ये चिंताजनक है. मुझे चिंता इस बात की है कि भारत में आप लोग किस तरह चर्चा को आगे बढ़ाते हैं, अगर आप अपने नेता और उनकी नीतियों से सीधे सवाल नहीं पूछ सकते."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित






















