'प्रदर्शनकारी जेन ज़ी एंटी-नेशनल नहीं हैं': युवाओं से क्या-क्या बोले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

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इमेज कैप्शन, मोहन भागवत ने मुंबई में जेन ज़ी और जेन अल्फ़ा युवाओं से बातचीत की है
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत गुरुवार को जेन ज़ी से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल हुए. वहां पर उन्होंने बातचीत के दौरान कहा कि हाल में हुए जेन-ज़ी प्रदर्शन में जो शिकायतें थीं, वो जायज़ हैं.

उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शन कर रहे जेन ज़ी एंटी-नेशनल नहीं हैं और लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी सहमति बनाने का एक माध्यम है.

मुंबई में नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (आईआईएमयूएन) के 15वें स्थापना वर्ष के मौके पर मोहन भागवत ने यह बातचीत की है.

इस दौरान आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विरोध के दौरान अलग-अलग विचार सामने आते हैं और चर्चा के बाद एक सहमति बनती है.

उन्होंने कहा, "यह चर्चा संवाद के ज़रिए हो सकती है. अगर किसी वजह से बात नहीं सुनी जाती है तो आंदोलन किया जा सकता है. लेकिन इसका उद्देश्य सहमति बनाना होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन पैदा करना."

मोहन भागवत ने और क्या-क्या कहा?

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इमेज कैप्शन, आरएसएस प्रमुख ने एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय पर भी बात की है

बीते जून-जुलाई महीने में नीट पेपरलीक मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था.

ये विरोध प्रदर्शन देश के कई हिस्सों में फैल गया था और 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद ये ख़त्म हुआ था.

इन प्रदर्शनों को लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, "जहां तक जेन-ज़ी की बात है, हाल में जो हुआ, उसमें उनकी शिकायतें जायज़ हैं. भारत की शिक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है और वह नहीं हो पा रहा है, इसलिए ये मुद्दे उठ रहे हैं. निश्चित रूप से संवाद होना चाहिए."

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"मैं यह कह रहा हूं कि अगर जेन-ज़ी विरोध-प्रदर्शन कर रहा है, तो वे देश-विरोधी नहीं हैं. वे हमारे अपने हैं. वे हमारी अगली पीढ़ी हैं. बातचीत के साथ-साथ, अपनापन महसूस कराने की भी ज़रूरत है."

भागवत ने कहा कि जेन-ज़ी और जेन-अल्फ़ा की सोच पहले की पीढ़ियों से अलग है.

उन्होंने कहा, "जब हम उनकी उम्र के थे तो बड़ों की बात मान लेना हमारी आदत थी, हम सवाल नहीं करते थे. लेकिन आज जेन-ज़ी और जेन-अल्फ़ा सवाल करते हैं, वे तर्कसंगत जवाब चाहते हैं."

उन्होंने लोकतंत्र में बहस की प्रक्रिया का ज़िक्र करते हुए कहा, "अंग्रेज़ी में इसे डिबेट कहते हैं और हम इसे शास्त्रार्थ कहते हैं. इसमें दो पक्ष होते हैं- पूर्वार्ध और उत्तर. हर पहलू को देखा जाता है और हर व्यक्ति का अपना नज़रिया होता है. इससे किसी भी विषय के नए पहलू सामने आते हैं. कई विचार और प्रतिविचार मिलकर सत्य की पूरी तस्वीर बनाते हैं. यह प्रक्रिया होनी चाहिए."

आरएसएस प्रमुख ने कहा, "मैं यह नहीं कहूंगा कि जेन-ज़ी को विरोध नहीं करना चाहिए, लेकिन लोकतंत्र में विरोध कैसे और किस तरह किया जाए, इसके तरीके तय हैं. संविधान बनाने वालों और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के भाषणों में भी इसके संकेत मिलते हैं. हमें इस पर ध्यान देना चाहिए."

उन्होंने कहा, "हमें यह भी समझना होगा कि जेन ज़ी सिर्फ़ विरोध के लिए आवाज़ नहीं उठा रहा है. वे कुछ समस्याओं के कारण अपनी बात रख रहे हैं और उन समस्याओं का समाधान होना चाहिए. आंदोलन किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार के लिए होना चाहिए."

'जब तक सामाजिक भेदभाव है आरक्षण रहेगा'

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस बातचीत के दौरान आरक्षण पर भी बात की. उन्होंने कहा कि जब तक सामाजिक भेदभाव है तब तक आरक्षण लागू रहेगा.

उन्होंने कहा, "मैं आपको सीधा जवाब नहीं दूंगा. मैं आप से कहूंगा कि आप वो पढ़ें जो बाबा साहेब आंबेडकर ने आरक्षण के बारे में लिखा था. अगर हम ईमानदारी से उनकी सलाह मानेंगे तो कोई समस्या नहीं."

"सामाजिक कारणों से आरक्षण है. जब तक सामाजिक भेदभाव है, आरक्षण चलेगा. जिनको मिल गया और जिनका ठीक हो गया, उन्हें बड़ा दिल दिखाकर दे देना चाहिए. और अगर ठीक से होता है तो वहां ऐसे स्वर भी उठ रहे हैं, ऐसे थोड़े कम स्वर हैं लेकिन उठ रहे हैं कि अब हमारा हो गया तो दूसरे को दे दो."

"वर्गीकरण की मांग कुछ प्रांतों में हो गई है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है. जिन्हें रिज़र्वेशन मिलता है, उनमें एक सोच यह है कि यह हमारी बेहतरी के लिए है, कोई परमानेंट तरीका नहीं है, और हमें इसका फ़ायदा उठाना है, खुद को बेहतर बनाना है और इसे उन लोगों के लिए काम का बनाना है जिन्हें यह अभी तक नहीं मिला है."

"इसे बढ़ावा देना चाहिए. इस पर पॉलिटिक्स नहीं होनी चाहिए. अगर सभी तरीकों को ठीक से लागू किया जाए, तो जल्द ही इसकी ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी. तब इस पर सोचा जाएगा. लेकिन इस पर पॉलिटिक्स हुई जिससे मनमुटाव होता है. असल में, यह तरीका समाज की एकता के लिए लाया गया था. यह तरीका अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन तलवार चलाने वाले जानबूझकर इसे गलत तरीके से कर रहे हैं. जब तक इसका इलाज नहीं होता, मुझे कुछ नहीं दिखता."

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इमेज कैप्शन, मोहन भागवत ने कहा, "हमें पहले समाज को तैयार करना होगा, क्योंकि कानून समाज को नहीं चलाते, समाज कानूनों को दिशा देता है."

एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय पर क्या कहा

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बुधवार को कहा था कि एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय समाज का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन फिलहाल विवाह की मौजूदा संस्था में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे "अनचाहे दुष्प्रभाव" हो सकते हैं.

हालांकि, उन्होंने समान लिंग वाले जोड़ों के लिए अलग कानूनी व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया.

गुरुवार को हुए कार्यक्रम में लगभग 2,000 जेन-ज़ी और जेन-अल्फ़ा प्रतिभागियों ने भाग लिया, इसमें मोहन भागवत ने एक सवाल के जवाब में एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय पर बात की.

भागवत ने कहा कि आरएसएस लगातार यह मानता रहा है कि "एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के लोग उसी समाज का हिस्सा हैं, जिससे हम जुड़े हैं. हमारे समाज में उन्हें साथ लेकर चलने की परंपरा रही है."

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो लोगों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह परिवार बनाने की संस्था है, और परिवार ही समाज की मूल इकाई है जहां अगली पीढ़ी का निर्माण होता है.

उन्होंने कहा, "हमारी पारंपरिक 'विवाह' व्यवस्था केवल दो लोगों के साथ रहने की सुविधा नहीं है. यह एक ऐसी संस्था है जिसके माध्यम से परिवार बनता है, और परिवार समाज की वह इकाई है जहां अगली पीढ़ी का निर्माण होता है."

भागवत ने कहा, "हमें पहले समाज को तैयार करना होगा, क्योंकि कानून समाज को नहीं चलाते, समाज कानूनों को दिशा देता है. इस समय अगर हम मौजूदा व्यवस्था से छेड़छाड़ करेंगे, तो इसके अनचाहे दुष्प्रभाव हो सकते हैं."

हालांकि उन्होंने सुझाव दिया कि समान लिंग वाले जोड़ों के लिए अलग क़ानूनी व्यवस्था बनाई जा सकती है.

उन्होंने कहा, "इसे समलैंगिक विवाह मत कहिए. हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे समान लिंग वाले साथी साथ रह सकें. इसके लिए क़ानून बनाया जा सकता है और समाज उसे स्वीकार कर सकता है."

भागवत ने कहा कि समाज को ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जिसमें एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के लोगों को भी जगह मिले और साथ ही मौजूदा सामाजिक संस्थाओं की संरचना भी बनी रहे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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