कोयंबटूर का एक शख़्स पंजाब में 15 साल तक बंधक रहने के बाद कैसे बचा

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- Author, जेवियर सेल्वकुमार
- पदनाम, रिपोर्टर बीबीसी तमिल
- Author, हरमनदीप सिंह
- पदनाम, बीबीसी पंजाबी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
(इस कहानी के कुछ ब्योरे आपको विचलित कर सकते हैं)
"मुझे लगा था कि मेरा बड़ा बेटा हमेशा के लिए मर गया होगा. ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब मैं उसे याद करके रोती नहीं थी. 23 साल बाद जब मुझे अचानक पता चला कि मेरा बेटा ज़िंदा है, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इतने सालों बाद जब मैंने उससे फोन पर बात की, तो मैं फूट-फूटकर रोने लगी."
अपने पति को खो चुकी सुंदरी की आंखों में खुशी के आंसू थे जब उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए बताया कि उनका बेटा जो 23 साल पहले लापता हो गया था, वो जिंदा है.
यह मां कौन है? इनका लापता बेटा कहां था और उसे कैसे तलाशा गया?
उस मां का दर्द जो अपने बेटे जो मरा हुआ समझती रही
कोयंबटूर जिला कलेक्टर कार्यालय में सोमवार 13 जुलाई को आयोजित एक जन शिकायत बैठक का आयोजन किया गया. कोयंबटूर के नीलमपुर क्षेत्र की सुंदरी (उम्र 68) ने जिला कलेक्टर को एक याचिका सौंपी.
इस याचिका में उन्होंने जिला प्रशासन से उनके उस बेटे को खोजने का अनुरोध किया जो 23 साल पहले लापता हो गया था.
सुंदरी विरुधुनगर जिले में पूमलाई पट्टी अनैकुलम की रहने वाली हैं. उनके दो बेटे हैं, प्रकाशम और प्रभु. उनका परिवार 30 साल पहले आजीविका के लिए कोयंबटूर आ गया था.
उनके सबसे बड़े बेटे प्रकाशम ने कौंडमपलयम कॉर्पोरेशन स्कूल में तीसरी कक्षा तक और साईबाबा कॉलोनी के एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई की.
इसके बाद वह स्कूल नहीं गया. प्रकाशम 2003 में गुस्से में आकर घर से निकल गया और फिर कभी वापस नहीं लौटा.
बीबीसी तमिल से बात करते हुए सुंदरी ने उस घटना को याद करते हुए कहा, "उसने पढ़ाई नहीं की. वह घर पर ही रहता था. दोनों बेटों की उम्र में काफी अंतर था, इसलिए वे कई बातों पर झगड़ते थे. उस समय हमने घर के कामों के लिए एक दोपहिया वाहन खरीदा था. उसे चलाने को लेकर झगड़ा हुआ. छोटे बेटे ने कहा कि वह उसका है, तो बड़ा बेटा झगड़ा करते हुए घर से निकल गया. उसका कहीं पता नहीं चला."
सुंदरी के मुताबिक, "हमने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. दो महीने बाद उसने हमारे घर के पास की किराने की दुकान पर फोन किया और दुकानदार को बताया कि वह चेन्नई में है. उसने हमसे बात नहीं की. उस समय वह 16 साल का था."
"चूंकि वह इतनी उम्र का था कि सारी बात समझ सकता था, हमने सोचा कि वह खुद ही वापस आ जाएगा, लेकिन वह नहीं आया. हमें नहीं पता था कि वह कहां है. हमने उसे ढूंढने के कई तरीके आजमाए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ."

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कुछ साल बाद सुंदरी का परिवार कौंडमपलयम से नीलमपुर क्षेत्र में चले गए.
सुंदरी के पति राममूर्ति एक इलेक्ट्रिसिटी हेल्पर और चौकीदार के रूप में काम करते थे. 2021 में कैंसर से निधन हो गया.
सुंदरी ने अचनकुलम क्षेत्र में कृषि भूमि पट्टे पर ली. अब वो सब्जी उगाकर और गाय पालकर अपना ख़र्चा चलाती हैं
सुंदरी ने कहा, "अगर कोई सड़क पर पड़ा होता था, तो मैं किनारे जाकर देखती कि कहीं वह मेरा बड़ा बेटा तो नहीं है. मैं चाहे जिस भी शहर में जाऊं, मेरी निगाहें उसे कहीं न कहीं ढूंढती रहती थीं."
"पिछले महीने मुथैया नाम का एक पत्रकार हमसे मिलने आया था. उसने बताया कि प्रकाशम पंजाब के एक शेल्टर होम में है और उसे छुड़ाकर वहां रखा गया है. मुझे यकीन नहीं हुआ. जब उसने मुझे मेरे बेटे की तस्वीर दिखाई, तभी मुझे विश्वास हुआ."
बीबीसी से बात करते हुए पत्रकार मुथैया ने बताया कि उन्होंने पंजाब के सुभाष चंद्र की दी गई जानकारी के आधार पर तीन साल तक प्रकाशम के परिवार का पता लगाने के लिए कई प्रयास किए थे.
उन्होंने कहा, "मेरे भाई के मित्र सुभाष चंद्र हरियाणा राज्य विधानसभा में सचिव पद से रिटायर्ड हुए थे. उन्होंने आर्काइव में प्रकाशम की जानकारी देखी और मुझे बताई. उन्होंने उनके परिवार को खोजने में मदद करने का अनुरोध किया."
"अपने भाई से जानकारी मिलने और सुभाष के जरिए प्रकाशम से बात होने के बाद मैंने उनके परिवार की खोज शुरू की."
परिवार को तलाशने में लगे तीन साल

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सुभाष ने 2023 में कौंडमपलयम के एरुकम्पेनी क्षेत्र का दौरा किया और प्रकाशम के बारे में कुछ जानकारी जुटाई. लेकिन मुथैया को उनके बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल पाई.
मुथैया ने कहा, "शुरुआत में प्रकाशम ने सही जानकारी नहीं दी. सुभाष से कई बार मिलने के बाद ही उन्होंने थोड़ा और स्पष्ट रूप से बताया कि उनका पैतृक शहर अरुप्पुकोट्टई के पास पूमलाई पट्टी अनैकुलम से है."
"उसके बाद मैंने तीन साल तक अरुप्पुकोट्टई और नारिकुडी में कई लोगों से बात करके जानकारी जुटाई. कई प्रयासों के बाद पिछले महीने ही मुझे वासुकी का संपर्क नंबर मिला जिसकी पूमलाई पट्टी में एक दुकान है."
जब मुथैया ने सुंदरी की भाभी वासुकी से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि उनकी मौसी और बेटा नीलमपुर के अचनकुलम में हैं. यह सूचना मिलते ही मुथैया तुरंत सुंदरी के घर गए.
अचनकुलम इलाके में गायें चरा रही सुंदरी के पास जाकर उन्होंने प्रकाशम की तस्वीर दिखाई और बताया कि वह पंजाब के एक शेल्टर होम में है.
मुथैया कहते हैं कि तब उन्हें पता चला कि प्रकाशम 23 साल से लापता था.
सुंदरी ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अपने बड़े बेटे के जीवित होने की खबर कैसे मिली.
उन्होंने कहा, "ऐसा कोई दिन नहीं गया जब मैं अपने बड़े बेटे को याद करके नहीं रोयी हूँ. मेरे पति कोरोना काल से पहले ही गुजर गए थे."
"चूंकि कोरोना के दौरान इतने सारे लोग मरे, मुझे लगा कि मेरा बेटा भी मर गया होगा. लेकिन जब मुझे पता चला कि वह जीवित है, तो मैं अपनी खुशी को शब्दों में बयां नहीं कर सकती. जब मैंने उससे बात की तो मुझे लगा जैसे मेरा दिल फट जाएगा."
इसके बाद एक जुलाई को मुथैया और सुंदरी के छोटे बेटे प्रभु अपने पड़ोसी सुंदरलिंगम के साथ ट्रेन से चंडीगढ़ गए.
वहां से पटियाला जिले में अपना फर्ज सेवा सोसाइटी के शेल्टर होम पहुंचे. प्रकाशम 2022 से वहीं रह रहा था.
'लोहे की जंजीर और कंबल प्रकाशम की संपत्ति है'

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बीबीसी पंजाबी ने इस बात की पड़ताल की कि प्रकाशम को उस जगह से कैसे बचाया गया जहां उसे बंधक बनाकर रखा गया था.
2022 में पटियाला स्थित 'अपना फ़र्ज़ सेवा सोसाइटी' नामक एक गैर सरकारी संगठन ने पाकिस्तान की सीमा से लगे अमृतसर जिले के अजनाला इलाके के एक गांव से प्रकाशम को बचाया था.
संगठन ने बीबीसी पंजाबी को बताया कि प्रकाशम को लगभग 15 से 20 सालों तक बंधुआ मजदूरी में रखा गया था, जिसके कारण उसे वर्षों तक दुख और बेबसी झेलनी पड़ी.
उनके अनुसार, प्रकाशम से बिना वेतन के काम करवाया जाता था और उसे जंजीरों में बांधकर रखा जाता था.
सुभाष चंद्र ने मुथैया के माध्यम से बीबीसी तमिल के साथ ये तस्वीरें पहले ही साझा कर दी थीं.
वह एक डेयरी फार्म मालिक किसान के घर में काम करता था. उसे पशुओं से संबंधित सभी काम सौंपे गए थे.
उन्होंने बीबीसी पंजाबी को बताया, "उसे सोने के लिए सिर्फ एक लोहे का पलंग और एक कंबल दिया जाता था. पलंग पर गद्दा नहीं था. उसका कमरा हर रात बाहर से बंद कर दिया जाता था. 15 साल से अधिक समय तक बिना वेतन के काम करने के बाद भी उसे उचित भोजन या पर्याप्त कपड़े नहीं दिए गए."
तीन साल पहले प्रकाशम को इस संगठन ने बचाया और एक शेल्टर होम में रखा.
जिसके बाद वह कई महीनों तक बोल नहीं पाया. उन्होंने उससे बात करने के कई प्रयास किए. तभी उसने कुछ शब्द बोलना शुरू किया.
जब उनसे पहली बार उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने 'प्रकाशम' बताया. जब उनसे पूछा गया कि वे कहां से हैं, तो उन्होंने जवाब दिया 'तमिलनाडु'.
लेकिन जब भी उनसे उनके गृहनगर के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने 'मुंबई' बताया. संगठन के लोगों ने बताया कि इसी वजह से उनके परिवार का पता लगाना मुश्किल था.
बाद में सुभाष चंद्र और मुथैया की मदद से वे उनके परिवार का पता लगाने में सफल रहे. संगठन ने यह भी बताया कि वीडियो कॉल के दौरान उनकी मां ने उन्हें तुरंत पहचान लिया.
जब मुथैया, प्रकाशम के छोटे भाई प्रभु और सुंदरलिंगम जुलाई की शुरुआत में शेल्टर होम गए तो सुभाष चंद्र ने संस्था के लोगों से प्रकाशम को उनके साथ भेजने का आग्रह किया. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.
बीबीसी पंजाबी से बात करते हुए संस्था चलाने वालों ने कहा, "उनके आने पर भी हमने परिवार से अतिरिक्त दस्तावेज़ मांगे और स्थानीय सरकारी अधिकारियों से उनका सत्यापन भी करवाया. हम यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि किसी भी छोटी सी गलती के कारण प्रकाशम को फिर से असुरक्षित माहौल में न डाल दिया जाए."
बीबीसी तमिल ने सुभाष चंद्र से बात की, जिन्होंने प्रकाशम के परिवार का पता लगाने में अहम भूमिका निभाई.
उन्होंने कहा, "2022 में रिटायर्ड होने के बाद मैं शेल्टर होम का दौरा करने लगा. उन्हें परामर्श देने और कुछ सहायता प्रदान करने में लगा रहा. उसी दौरान 2023 में मेरी मुलाकात प्रकाशम से हुई. मुझे पता चला कि वह तमिलनाडु से थे. लेकिन उस समय वह खुलकर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे."
"उसने मुझे जो जानकारी दी, उसके आधार पर मुझे पता चला कि कोयंबटूर उसका गृहनगर था. फिर मैंने चेन्नई सचिवालय में काम करने वाले बालकिशन से बात की और उनके माध्यम से हमने मुथैया की मदद ली और प्रकाशम के परिवार को खोजने की कोशिश की."
उन्होंने कहा कि प्रकाशम, जो बंधक रहने के दौरान शारीरिक और मानसिक रूप से घायल हो गए थे, पिछले कुछ वर्षों में मिले इलाज से उबर रहे हैं.
सरकारी अधिकारियों ने मां और बेटे को मिलाने में की मदद

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मुथैया ने कहा, "जब हम वहां गए, तो प्रशासकों ने हमें तुरंत प्रकाशम से मिलने नहीं दिया. सुभाष चंद्र ने बात करके हमारी मुलाकात का इंतजाम किया. वहां हमने जो प्रकाशम देखा. 23 साल बाद भी उसने अपने भाई को हूबहू पहचान लिया और दौड़कर उसे गले लगा लिया."
"लेकिन प्रशासकों ने उसे हमारे साथ भेजने से इनकार कर दिया. इसीलिए हमने जिला कलेक्टर से उन दस्तावेजों को तैयार करने की अपील की है जिनकी उन्होंने मांग की थी."
सुंदरी के पास 2003 का पारिवारिक कार्ड है, जिस पर प्रकाशम का नाम लिखा है. इसके अलावा उनके पास फिलहाल कोई अन्य दस्तावेज नहीं है.
सुंदरी की ओर से अपने बेटे को वापस लाने के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने हेतु जिला कलेक्टर से याचिका दायर की.
जिला कलेक्टर के निजी सहायक के नेतृत्व में स्कूल शिक्षा विभाग और श्रम विभाग सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी, सुंदरी के परिवार की मदद के लिए उन स्कूलों में दस्तावेजों की तलाश की जहां प्रकाशम ने पढ़ाई की थी और निगम कार्यालयों में भी खोजबीन की.
बीबीसी को इस बारे में जानकारी देते हुए कोयंबटूर के जिला कलेक्टर पवन कुमार किरियाप्पनार ने कहा, "मैंने उनकी याचिका के संबंध में पटियाला के जिला कलेक्टर से बात की है. हम यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या विरुधुनगर जिले में भी उनके परिवार के बारे में कोई जानकारी है. हम विभिन्न विभागों के अधिकारियों से दस्तावेजों की छानबीन कर रहे हैं. हम उनके बेटे को यहां लाने के लिए अन्य व्यवस्थाएं भी कर रहे हैं."
जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें मांगे गए दस्तावेज़ नहीं मिलते हैं तो क्या उन्हें वापस लाने में कोई समस्या होगी, तो जिला कलेक्टर ने कहा, "ऐसा होने की कोई संभावना नहीं है. मौजूदा दस्तावेजों के आधार पर यह पुष्टि करने की व्यवस्था की जाएगी कि वह उनकी मां हैं और जिला प्रशासन से उचित सिफारिश पत्र भी उपलब्ध कराया जाएगा. एक सप्ताह के भीतर सुंदरी को यहां से पंजाब भेजा जाएगा और उनके बेटे को वापस लाने के लिए उचित व्यवस्था और सहायता की जाएगी."
प्रकाशम को सौंपे जाने के संबंध में बीबीसी पंजाबी से बात करते हुए 'अपना फ़र्ज़ सेवा सोसाइटी' के प्रतिनिधियों ने कहा, "हमने इस मामले में कोई कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं की है. हमारा मानना है कि यह निर्णय सर्वाइवर और उसके परिवार पर निर्भर करता है. उन्हें यह तय करना चाहिए कि प्रकाशम को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए या उसे वर्षों से झेलनी पड़ी पीड़ा के लिए मुआवज़ा मांगा जाए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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