पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बंपर जीत में क्या एसआईआर का रोल है, आंकड़ों से समझिए

    • Author, अभिक देब
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट
नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल में मिली जीत का जश्न मनाने दिल्ली के बीजेपी हेडक्वार्टर पहुंचे पीएम नरेंद्र मोदी कार्यकर्ताओं का अभिवादन स्वीकार करते हुए (तस्वीर- 4 मई, 2026)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 294 में से 206 सीटें जीतकर सरकार बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 15 साल के शासन के बाद घटकर 80 सीटों पर सिमट गई है.

एक सीट पर सोमवार तक मतगणना पूरी नहीं हो सकी थी (चुनाव आयोग के अनुसार इस सीट पर टीएमसी बढ़त बनाए हुए हैं), जबकि एक अन्य सीट फ़ाल्टा पर 21 मई को दोबारा मतदान कराया जाएगा.

चुनाव से पहले, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का मुद्दा राज्य में लगातार चर्चा में रहा है. राज्य की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए.

इस संख्या में मृत, स्थानांतरित, ग़ैरहाज़िर, डुप्लीकेट, 2002 की मतदाता सूची में दर्ज न किए गए मतदाता और जिनके नाम दर्ज करने में 'तार्किक विसंगतियां' थीं, वे सभी शामिल हैं.

टीएमसी ने बार-बार आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने का काम मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाकर किया गया था. मुस्लिम मतदाताओं को टीएमसी का बेस वोटर माना जाता है.

इस दावे का समर्थन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने भी किया.

क्या एसआईआर प्रक्रिया निर्णायक साबित हुई?

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वीडियो कैप्शन, ममता बनर्जी भवानीपुर सीट हारीं, शुभेंदु अधिकारी ने हराया

लेकिन सवाल है कि एसआईआर का असल में कितना प्रभाव पड़ा?

पश्चिम बंगाल में 112 ऐसी सीटें थीं जहां 25 हज़ार या उससे ज़्यादा नेट डिलीशन्स हुईं.

नेट डिलीशन्स में उन सभी मतदाताओं को शामिल किया गया है जिनके नाम सूची से हटाए गए हैं, लेकिन इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं जिन्हें मृतक के रूप में चिह्नित किया गया है.

बीबीसी इस पैमाने को इसलिए देख रहा है, क्योंकि मृत घोषित किए गए मतदाताओं को छोड़कर एसआईआर के तहत जिन भी लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, वे अपील कर सकते हैं. इन लोगों के पास फिर से सूची में शामिल होने का मौका है.

चुनावी आंकड़े
इमेज कैप्शन, जिन 112 सीटों पर 25 हज़ार या इससे ज़्यादा मतदाताओं के नाम हटाए गए, उनमें से 72 सीटें बीजेपी ने और 39 सीटें टीएमसी ने जीती हैं. जबकि 2021 में स्थिति इसके उलट (टीएमसी 86, बीजेपी 26) थी.

25,000 से ज्यादा मतों की कटौती वाली इन 112 सीटों में से टीएमसी ने 2021 के विधानसभा चुनावों में 86 पर जीत दर्ज की थी. वहीं बीजेपी को 26 सीटों पर जीत मिली थी.

लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह बदल गई है. अब इनमें से 72 सीटें बीजेपी ने जीतीं, जिनमें भवानीपुर भी शामिल है, जहां निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हार गईं.

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को इनमें से सिर्फ़ 39 सीटों पर ही जीत मिली, जबकि कांग्रेस को एक सीट मिली.

एसआईआर के तहत मतदाता सूची संशोधनों का विश्लेषण कर रहे सबर इंस्टीट्यूट के मुख्य शोधकर्ता साबिर अहमद ने कहा, "एसआईआर के तहत नामों को हटाना निश्चित रूप से इन नतीजों के पीछे की एक प्रमुख वजह है."

वो कहते हैं, "एसआईआर के तहत नामों को हटाने के साथ-साथ ज़मीनी स्तर पर वोटों में दो से तीन फ़ीसदी का स्विंग भी अंतर को पाटने के लिए पर्याप्त है."

चुनावी आंकड़े

बारीक़ी से देखने पर एसआईआर का असर साफ़ तौर पर नज़र आता है.

अगर हम उन 10 सीटों को देखें जहां एसआईआर के तहत मृतकों को छोड़कर सबसे ज़्यादा वोटर्स हटाए गए तो उन सभी सीटों पर 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी.

टीएमसी और उसके सहयोगियों ने 2011 में सत्ता में आने के बाद से हुए दो विधानसभा चुनावों में इन 10 में से नौ सीटें जीती थीं. विश्लेषण से पता चलता है कि ये सीटें तृणमूल कांग्रेस का गढ़ मानी जाती हैं.

हालांकि, इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को इन 10 सीटों में से जोरासांको और उत्तर हावड़ा की दो सीटें गंवानी पड़ीं.

अन्य सभी सीटों पर भी टीएमसी की जीत का अंतर कम हो गया है.

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने बताया कि 'तार्किक विसंगतियों' के कारण हटाए गए 27 लाख मतदाता राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 5% थे.

उन्होंने कहा कि बीजेपी का वोट शेयर भी टीएमसी से लगभग इतने ही प्रतिशत (5%) ज़्यादा रहा.

यादव ने कहा, "यह संयोग हो सकता है, लेकिन इससे साफ़ है कि एसआईआर एक अहम कारक था."

चुनाव के आंकड़े

और कौन से कारण ज़िम्मेदार?

लेकिन क्या एसआईआर ही इकलौता कारण था जिसने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली शक्तिशाली सरकार को गिरा दिया?

जैसा कि नीचे की टेबल में दिख रहा है कि इन 10 सीटों में से 4 पर इस बार के चुनाव में साल 2021 से ज़्यादा वोट पड़े हैं. वहीं बाकी की 6 सीटों पर पोलिंग थोड़ी कम ज़रूर हुई है लेकिन यह कमी उन वोटर्स की संख्या के मुकाबले बहुत छोटी थी, जिन्हें सूची से हटाया गया.

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विश्लेषकों का कहना है कि इसके पीछे एक कारण यह था कि अन्य राज्यों में प्रवासी मज़दूर के रूप में काम करने वाले मतदाता बड़ी संख्या में चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल लौट आए थे.

वरिष्ठ पत्रकार मोनिदीपा बनर्जी ने बीबीसी को बताया कि चुनाव से पहले, कई विश्लेषकों ने अनुमान लगाया था कि इन मतदाताओं ने एसआईआर के ख़िलाफ़ और इस प्रक्रिया के कारण मताधिकार से वंचित होने की आशंका के कारण अपने गु़स्से को ज़ाहिर करने के लिए मतदान किया था.

उन्होंने कहा, "लेकिन परिणाम बताते हैं कि इन मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने वास्तव में टीएमसी के ख़िलाफ़ वोट दिया."

बनर्जी ने कहा, "एसआईआर ने निश्चित रूप से लाखों मतदाताओं को परेशान किया है, जिनमें से कई ने बिना किसी कारण के अपने मतदान अधिकार खो दिए."

उन्होंने कहा, "लेकिन इसके बावजूद, एसआईआर और इसके आस- पास की बहस टीएमसी के लिए ध्यान भटकाने का काम कर गई. इसने ममता बनर्जी को एसआईआर के ख़िलाफ़ उग्र बना दिया और टीएमसी का ध्यान व्यापक सत्ता-विरोधी लहर से निपटने से हट गया."

राजनीतिक विश्लेषक स्निग्धेन्दु भट्टाचार्य ने भी कहा कि पश्चिम बंगाल के नतीजों के लिए केवल एसआईआर को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

उन्होंने कहा, "एसआईआर ने निश्चित रूप से तृणमूल के वोट शेयर को कुछ हद तक कम किया. लेकिन इसने तृणमूल विरोधी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को भी उत्साहित किया. इन मतदाताओं ने इसे सरकार को गिराने का सबसे अच्छा मौका समझा."

बनर्जी और भट्टाचार्य दोनों ने कहा कि रोज़गार की कमी और तृणमूल के ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की मनमानी जैसे कारणों से मतदाताओं में भारी सत्ता-विरोधी लहर थी.

दोनों ने ही माना कि एसआईआर और राज्य में केंद्रीय बलों की भारी तैनाती ने मतदाताओं में यह विश्वास पैदा किया कि सरकार को वास्तव में गिराया जा सकता है.

कोलकाता में बीजेपी कार्यकर्ता जीत का जश्न मनाते हुए

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परिणामों से पहले, विश्लेषकों ने मुस्लिम वोटों के और अधिक एकजुट होने की भविष्यवाणी भी की थी, जिससे टीएमसी को फ़ायदा हो सकता था.

पश्चिम बंगाल में 27 फ़ीसद मुस्लिम मतदाता हैं, विश्लेषकों के मुताबिक जिनमें से अधिकांश 2011 से ममता बनर्जी की पार्टी का समर्थन करते रहे हैं.

लेकिन इस बार मुस्लिम वोटों में विभाजन दिखाई दे रहा है.

साबिर अहमद बताते हैं कि मुस्लिम मतदाताओं में कुछ हद तक निराशा है, जिसका कारण उन्होंने 'कम्पेटिटिव कम्युनल पॉलिटिक्स' बताया.

अहमद ने कहा, "नतीजतन, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे ज़िलों में बेहतर प्रदर्शन के कारण कांग्रेस के वोट शेयर में वृद्धि हुई है. ये तृणमूल के गढ़ रहे हैं."

"ऐसा लगता है कि अगर एसआईआर नहीं हुआ होता तो कांग्रेस को और भी ज़्यादा फ़ायदा होता."

मोनिदीपा बनर्जी ने भी कहा कि मुस्लिम वोटों में विभाजन दिखाई दे रहा है.

उन्होंने कहा, "पश्चिम बंगाल में लगभग 90 से 100 सीटें ऐसी हैं जिनका फ़ैसला मुस्लिम वोटों से होता है."

उन्होंने बताया कि तृणमूल की कुल सीटों की संख्या इससे कम होना यह दिखाता है कि मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग पार्टी से दूर हो गया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.