ईरान पर ट्रंप और नेतन्याहू की रणनीति क्यों नाकाम होती दिख रही है?

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- Author, जर्मी बोवेन
- पदनाम, इंटरनेशनल एडिटर, बीबीसी न्यूज़
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
डोनाल्ड ट्रंप और बिन्यामिन नेतन्याहू का मानना था कि ईरान पर जीत से पूरा मध्य-पूर्व बदल जाएगा.
यह क्षेत्र बदल रहा है, लेकिन उस तरह नहीं जैसा उन्होंने सोचा था. इस्लामी गणराज्य ईरान पराजित नहीं हुआ है.
अब ख़तरा एक लंबे, थकाऊ स्थायी संकट का है, जो कभी सीधे युद्ध में बदल जाएगा और कभी उससे बाहर निकल आएगा.
ईरानी शासन को पटखनी देना ट्रंप और नेतन्याहू की सोच से कहीं ज़्यादा कठिन साबित हुआ है. उनका आकलन ग़लत था और अब नतीजों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहा है.
ईरान का अमेरिकी अपाचे हेलिकॉप्टर को गिराना इसका ताज़ा उदाहरण है.
यह एक और ऐसी घटना है, जो याद दिलाती है कि ईरान के शासक अब भी अमेरिकियों को चोट पहुँचा सकते हैं और इस युद्ध के विजेता बनकर निकलने के अपने संकल्प से पीछे नहीं हटेंगे.
उनके लिए जीत का मतलब है, उनका अस्तित्व बने रहना और बढ़ी हुई प्रतिरोधक क्षमता - यानी रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक, होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण को मान्यता मिलना.
राष्ट्रपति और उनके जनरल हेलिकॉप्टर के नुक़सान पर अपनी प्रतिक्रिया को इस तरह संतुलित करने की कोशिश करेंगे कि साफ़ तौर पर नज़र ऐसा आए कि उन्हें दबाया नहीं जा सकता, लेकिन साथ ही धीमी और अब तक नाकाम रही कूटनीतिक प्रक्रिया की संभावना भी बची रहे.
अपाचे का क्रू बच गया. अगर वे मारे गए होते तो प्रतिक्रिया कहीं अधिक कठोर होती.
एक पुराना सबक

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ट्रंप ईरान के साथ एक समझौते पर दांव लगा रहे हैं ताकि होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोला जा सके और बड़े मुद्दों पर लंबी अवधि की बातचीत शुरू हो सके- जिसकी शुरुआत ईरान के संवर्धित यूरेनियम के भंडार और उसके व्यापक परमाणु कार्यक्रम से हो.
अमेरिका में इस युद्ध को पसंद नहीं किया जा रहा और ट्रंप चाहते हैं कि कोई ऐसा रास्ता निकले, जिसे वह जीत के रूप में पेश कर सकें. यह एक कठिन चुनौती साबित हो रही है.
ट्रंप और इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू एक पुराना सबक सीख रहे हैं. जब से इंसानों ने युद्ध की कला और अभिशाप खोजा है, नेताओं को पता चला है कि युद्ध शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे साफ़-सुथरी जीत के साथ ख़त्म करना कहीं ज़्यादा कठिन.
जब फ़रवरी के आख़िरी दिन उन्होंने अपने देशों को ईरान के साथ युद्ध में झोंका, तो दोनों ने वीडियो बयान जारी किए. उनके शब्दों से यह झलक रहा था कि कोई ऐतिहासिक बदलाव आने वाला है.
वह शासन, जिसने 1979 में शाह के तख़्तापलट के बाद से ईरान पर राज किया था, अब अंत की ओर बढ़ रहा था.
सुबह के शुरुआती घंटों में, फ़्लोरिडा स्थित अपने रिसॉर्ट मार-ए-लागो में, ट्रंप ने जनवरी में ईरानी शासन के विरोधियों से किए गए वादे को दोहराया कि 'मदद रास्ते में है'.
"आज रात मैं ईरान के महान और स्वाभिमानी लोगों से कह रहा हूँ कि आपकी आज़ादी का समय आ गया है. सुरक्षित रहें. घर से बाहर न निकलें. बाहर बहुत ख़तरा है. हर जगह बम गिरेंगे. जब हम अपना काम ख़त्म कर लेंगे, तो अपनी सरकार पर क़ब्ज़ा कर लीजिए. वह आपकी होगी. यह शायद आपके लिए कई पीढ़ियों में मिलने वाला एकमात्र मौक़ा होगा."
अगली सुबह, तेल अवीव के मध्य में स्थित इसराइल के ऊँचे रक्षा मंत्रालय भवन 'किरिया' की छत पर धूप में खड़े होकर नेतन्याहू ने अपना संबोधन रिकॉर्ड किया. ट्रंप की तरह उन्होंने भी ऐसे बात की जैसे जीत तय हो.
"सेनाओं का यह गठबंधन हमें वह करने की क्षमता देता है, जिसकी मैं 40 साल से कामना कर रहा हूँ: आतंकवादी शासन को जड़ से उखाड़ फेंकना. मैंने यही वादा किया था और हम यही करेंगे."
'ग़लती कहाँ हुई'

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अपने पूरे राजनीतिक जीवन में नेतन्याहू ने यही कहा है कि इसराइल के लिए असली ख़तरा ईरान से है, न कि फ़लिस्तीनियों से या अपने अरब पड़ोसियों से.
उन्होंने दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपतियों को ईरान पर हमला करने के लिए साथ लाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे. ट्रंप अलग थे.
हमास के सात अक्टूबर 2023 को इसराइल पर हमला करने, यानी दो साल से अधिक समय से नेतन्याहू इसराइलियों से कहते रहे कि अमेरिका की मदद से उनकी सेना की ताक़त दुश्मनों को परास्त कर देगी और एक अधिक समृद्ध और सुरक्षित भविष्य लेकर आएगी. उनके अनुसार जवाब था ताक़त, न कि कूटनीति.
नेतन्याहू का अंदाज़ ऐसा था, जैसे उनका समय आ गया हो. इसके विपरीत, जब सोमवार को ट्रंप ने उन्हें बेरूत पर हमला करने की योजना रद्द करने को कहा और वह कैमरों के सामने आए, तो इसराइल के प्रमुख अख़बार के स्तंभकार बेन कास्पित ने लिखा कि वे एक फुस्स हो चुके गुब्बारे जैसे दिख रहे थे.
कास्पित प्रधानमंत्री के सबसे मुखर आलोचकों में से हैं. लेकिन यह साफ़ है कि क्षेत्र को अपनी इच्छा के अनुसार झुकाने के लिए बल प्रयोग की नेतन्याहू की रणनीति असफल हो चुकी है.
ट्रंप को जल्द जीत की उम्मीद थी. उन्होंने ख़ुश होकर देखा था कि अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया, उन्हें न्यूयॉर्क की जेल में डाल दिया और कराकस में एक अपने अनुकूल उत्तराधिकारी को स्थापित कर दिया.
उनके हिसाब से यह किताबों में दर्ज करने जैसा शासन परिवर्तन था - इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में उनके पूर्ववर्तियों की ओर से लड़े गए अंतहीन युद्धों से कहीं बेहतर. ईरान सूची में अगला था.
दोनों सोच रहे होंगे कि ग़लती कहाँ हुई. अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताक़तवर सेना है. इसराइल मध्य-पूर्व की महाशक्ति है.
खाड़ी देशों का नुक़सान

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ट्रंप और नेतन्याहू ने देखा कि ईरान का शासन प्रतिबंधों, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार से पैदा हुए आर्थिक संकट से जूझ रहा था.
इसराइल ने उसके सहयोगियों - ग़ज़ा में हमास और लेबनान में हिज़्बुल्लाह - को भारी नुक़सान पहुँचाया था. उसका दूसरा अहम सहयोगी, बशर अल असद, सीरिया के राष्ट्रपति पद से हटाया जा चुका था और वह मॉस्को भाग गए थे.
जनवरी में ईरानी शासन ने अपने ख़िलाफ़ हुए बड़े प्रदर्शनों को हज़ारों ईरानी नागरिकों को मारकर कुचल दिया था.
उन्होंने इस्लामी शासन की दृढ़ता, निर्दयता और चालाकी को कम आँका. उनको यक़ीन था कि इसके सर्वोच्च नेता और उनके सबसे क़रीबी सहयोगियों को मारने से शासन भीतर से ढह जाएगा.
उन्होंने उस शासन के ख़िलाफ़ सैन्य ताक़त के प्रभाव को ज़्यादा आँका जो लगभग 50 साल से बार-बार ख़तरों का सामना करता रहा है.
जिसने ख़ुद को हमले झेलने के क़ाबिल बनाया है और राष्ट्रीय सुरक्षा की ऐसी सोच गढ़ी है, जिसे उसके धार्मिक और वैचारिक विश्वास मज़बूती देते हैं.
अमेरिका के सहयोगी खाड़ी के तेल उत्पादक देश यूएई, बहरीन भारी नुक़सान झेल रहे हैं.
यह केवल पेट्रोकेमिकल्स और उनके उप-उत्पादों जैसे उर्वरक, से होने वाली आय का नुक़सान नहीं है. उन्होंने अपना भविष्य खाड़ी में स्थिरता और अरबों डॉलर के कारोबार पर टिका रखा था. संभावित निवेशक और पर्यटक देख रहे हैं कि युद्ध उस दृष्टि को मृगतृष्णा में बदल रहा है.
ईरानी शासन का मानना है कि अपने अस्तित्व की रक्षा कर और जिस आसानी से उसने होर्मुज़ स्ट्रेट बंद करके और खाड़ी के अपने अरब पड़ोसियों पर हमला करके विश्व अर्थव्यवस्था पर गला दबा दिया है, उसे अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ लंबी अवधि की प्रतिरोधक क्षमता में बदला जा सकता है.
असाधारण कूटनीतिक सफलता की ज़रूरत

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वे लोग, जिन्होंने इसराइल और अमेरिका की ओर से मारे गए ईरानी नेताओं की पुरानी पीढ़ी की जगह ली है, वैचारिक रूप से अपने पूर्ववर्तियों जैसे ही हैं, लेकिन उस संघर्ष में- जिसे वे अस्तित्व का सवाल मानते हैं- उनकी जोखिम उठाने की इच्छा कहीं ज़्यादा है.
उनका मानना है कि भविष्य में अमेरिका या इसराइल से होने वाले और हमलों को केवल शब्द नहीं रोक सकते. इसके बजाय वे दिखाना चाहते हैं कि ईरान पर और हमले ख़तरनाक नतीजे लेकर आएंगे.
उसकी रणनीति का एक अहम हिस्सा है, लेबनान के युद्ध को खाड़ी के युद्ध से जोड़ना. ईरानी शासन का ट्रंप को संदेश है कि अगर इसराइल लेबनान पर बमबारी जारी रखता है और हिज़्बुल्लाह को नष्ट करने की कोशिश करता है, तो वह किसी भी तरह के समझौते की उम्मीद नहीं कर सकते.
हिज़्बुल्लाह मिलिशिया और राजनीतिक आंदोलन है, जिसे ईरान ने 1980 के दशक से इसराइल के ख़िलाफ़ अग्रिम रक्षा पंक्ति के रूप में तैयार किया है.
बेरूत पर हमला करने की इसराइल की योजना को रोककर, इस आधार पर कि एक समझौता जल्दी ही हो सकता है (एक दावा जो उन्होंने पहले भी ग़लत किया है), ट्रंप ने अप्रत्यक्ष रूप से दिखा दिया है कि वह मानते हैं कि लेबनान में जो होता है और खाड़ी में जो होता है, दोनों जुड़े हुए हैं.
सोमवार को नेतन्याहू ने कहा कि वह इस अंतरसंबंध को स्वीकार नहीं करेंगे. उनके शब्दों में यह 'असहनीय और पूरी तरह अस्वीकार्य' था.
उनकी समस्या यह है कि ट्रंप अपने हितों और युद्ध ख़त्म करने की इच्छा को नेतन्याहू के उस संकल्प से ऊपर रखेंगे, जिसमें वह युद्ध को तब तक जारी रखना चाहते हैं जब तक यह घोषित न कर सकें कि तेहरान का इस्लामी शासन पंगु हो चुका है.
नेतन्याहू ने बेरूत पर नियोजित हमले को रद्द कर दिया, लेकिन तब से इसराइल की सेना, आईडीएफ़, दक्षिणी लेबनान पर लगातार भारी हमले कर रही है.
मार्च में जब होर्मुज़ स्ट्रेट बंद हुआ, तो चेतावनी दी गई थी कि अगर जून तक यह बंद रहा तो वैश्विक आर्थिक परिणाम बेहद गंभीर होंगे.
अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमला करने से पहले खुला रहा वह अहम जलमार्ग अब भी बंद है. असाधारण कूटनीतिक सफलता के बिना, निकट भविष्य में इसके फिर से खुलने की संभावना मुश्किल दिखती है.
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