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सीबीएसई रिज़ल्टः इस बार इतना क्यों गिरा परीक्षा पास करने वाले छात्रों का प्रतिशत
सीबीएसई (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) ने बीते बुधवार को 12वीं कक्षा के नतीजे जारी किए. इस साल 85.20 प्रतिशत छात्र पास हुए, जो पिछले साल के 88.39 प्रतिशत की तुलना में क़रीब तीन प्रतिशत कम है.
कोविड के बाद यह पास प्रतिशत में सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है.
इस बार सीबीएसई ने पहली बार उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली लागू की. इसके तहत लगभग 98.67 लाख कॉपियों को स्कैन कर डिज़िटल रूप से जांचा गया.
बोर्ड का दावा है कि इससे मूल्यांकन प्रक्रिया तेज़, पारदर्शी और त्रुटिरहित हुई, और इसी वजह से परिणाम भी कम समय में घोषित किए जा सके. करीब 70 हज़ार शिक्षकों ने इस प्रक्रिया में हिस्सा लिया.
हालांकि, परिणाम आने के बाद कई छात्र, शिक्षक और स्कूल प्रबंधन ओएसएम प्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं.
छात्रों का आरोप है कि डिज़िटल मूल्यांकन में उनके विस्तृत उत्तरों का सही आकलन नहीं हुआ.
सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर नाराज़गी दिखाई दे रही है और एक ऑनलाइन याचिका पर 24 घंटे के भीतर 10 हज़ार से अधिक हस्ताक्षर किए जा चुके हैं.
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक कृष्णा कुमार का कहना है कि ओएसएम को जल्दबाज़ी में लागू किया गया और स्कैन की गई कॉपियों की गुणवत्ता व मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल हैं.
उनके मुताबिक़, जल्द परिणाम घोषित करने की प्राथमिकता से छात्रों का भविष्य प्रभावित हो सकता है.
कुछ शिक्षकों और स्कूल प्रशासकों का मानना है कि समस्या सिर्फ़ ओएसएम तक सीमित नहीं है.
उनका कहना है कि मूल्यांकनकर्ताओं के चयन, अनुभवहीन शिक्षकों की नियुक्ति, बदलते प्रश्नपत्र पैटर्न और कोचिंग-केंद्रित पढ़ाई जैसी वजहों ने भी परिणामों को प्रभावित किया है.
सीबीएसई ने अब तक ओएसएम से जुड़े आरोपों पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन बोर्ड का कहना है कि रीचेकिंग और जवाबदेही की व्यवस्था मौजूद है.
इसके बावजूद, इस साल के नतीजों ने मूल्यांकन प्रणाली, शिक्षण गुणवत्ता और परीक्षा पैटर्न को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है.
बीबीसी ने सीबीएसई से ओएसएम पर उठ रहे सवालों पर प्रतिक्रिया जाननी चाही लेकिन ये रिपोर्ट लिखे जाने तक जवाब नहीं मिला है.
पिछले कुछ सालों की तुलना में कितना गिरा पास प्रतिशत?
पिछले साल, यानी 2025 में परीक्षा देने वाले कुल छात्रों में से 88.39 प्रतिशत छात्र पास हुए थे.
इस बार यह आंकड़ा गिरकर 85.20 प्रतिशत पर आ गया है. यानी परीक्षा पास करने वालों छात्रों की संख्या में बड़ी गिरावट आई है.
वहीं, साल 2024 में पास छात्रों का प्रतिशत 87.98 था. वहीं, कोविड महामारी के बाद हुई साल 2022 की परीक्षा में कुल 92.71 प्रतिशत छात्र पास हुए थे.
हालांकि, साल 2021 में, जब कोविड महामारी की वजह से बोर्ड परीक्षा आयोजित नहीं की जा सकी थी, तब बोर्ड ने छात्रों को नंबर देने के लिए अलग प्रक्रिया अपनाई थी.
साल छात्रों को यूनिट टेस्ट, प्री बोर्ड और मिड टर्म परीक्षाओं के आधार पर नंबर दिए गए थे.
उस साल 99.37 प्रतिशत छात्र पास हुए थे. ये आंकड़ा साल 2020 के पास प्रतिशत 88.78 से काफ़ी ज़्यादा था.
वहीं साल 2019 में कुल 83.40 प्रतिशत छात्र ही पास हुए थे.
इस बार परीक्षा आकलन में क्या बदला?
सीबीएसई ने इस पार बारहवीं की परीक्षा कॉपियों की ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) के ज़रिए जांच की.
इस प्रक्रिया के तहत छात्रों की कॉपियों को स्कैन किया गया और फिर जांचकर्ताओं ने डिज़िटल तरीक़े से उनका आकलन किया और छात्रों को नंबर दिए.
सीबीएसई ने इस प्रक्रिया को पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा क़दम बताते हुए कहा है, "इससे परीक्षा आधुनिक, त्रुटीहीन और पारदर्शी हुई है."
सीबीएसई ने यह भी कहा है कि यह प्रक्रिया अपनाने से परीक्षा कॉपियों को जांचने में कम समय लगा है और अन्य शिक्षा बोर्डों के मुक़ाबले कम समय में नतीजे घोषित कर दिए गए हैं.
सीबीएसई के मुताबिक़, जांचकर्ताओं को प्रक्रिया समझने में मदद करने के लिए मॉक इवेलुएशन करने का मौक़ा दिया गया था. सीबीएसई ने फ़रवरी में बड़े पैमाने पर मॉक इवेलुएशन भी करवाया था.
इस साल कुल 18,57,517 स्टूडेंट्स ने परीक्षा के लिए पंजीकरण कराया था.
छात्रों की कॉपिया जांचने के लिए 11वीं और 12वीं की कक्षाएं लेने वाले शिक्षकों को लगाया गया था. ऑन स्क्रीन आकलन के लिए उन्हें लॉग इन और पासवर्ड पहले ही आवंटित कर दिए गए थे.
उम्मीद के मुताबिक़ नहीं रहे नतीजे
हालांकि, अब छात्रों के पास होने की दर में गिरावट होने के बाद कई छात्र, शिक्षक और सीबीएसई स्कूलों के प्रबंधन से जुड़े लोग ओएसएम प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं.
एक्स पर एक पोस्ट करते हुए बिहार के पटना के छात्र तन्मय कश्यप ने कहा, "आज मैं अपने नतीजे देखकर पूरी तरह टूट गया हूं. अंतहीन मेहनत, त्याग और रात-रात भर जागकर तैयारी करने के बाद मेरे नंबर बहुत ख़राब आए हैं."
तन्मय का कहना है कि ओएसएम की वजह से उनके जैसे लाखों छात्र प्रभावित हुए हैं.
तन्मय कहते हैं, "हमने इस सिस्टम पर भरोसा किया लेकिन डिज़िटल आकलन के दौरान हमारे विस्तृत जवाबों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया."
ग़ाज़ियाबाद के रहने वाले एक और छात्र ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "मेरा रिज़ल्ट उम्मीद के मुताबिक़ नहीं रहा, मेरे सभी दोस्तों का यही हाल है. जो वैकल्पिक सवाल सही किए थे, लगता है वह नंबर भी नहीं मिले."
ये छात्र भी ख़राब रिज़ल्ट के लिए ओएसएम प्रक्रिया को ज़िम्मेदार बताते हैं.
वहीं भारत के चर्चित शिक्षाविद और एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक रहे प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार ने भी ओएसएम प्रणाली पर सवाल उठाया है.
वो कहते हैं, "ओएसएम की प्रक्रिया को बहुत ही जल्दबाज़ी में लागू किया गया है, मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल इसकी गुणवत्ता को लेकर है. इसके अलावा जो कॉपियां स्कैन की गईं उनकी गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में है. मुझे लगता है कि छात्रों के ख़राब नतीजों के लिए सीधे तौर पर ओएसएम ही ज़िम्मेदार है."
प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार कहते हैं, "सीबीएसई पिछली व्यवस्था को ही बहुत मुश्किल से चला पा रहा था, ऐसे में जल्दबाज़ी में ये नई व्यवस्था लागू की गई. सीबीएसई का पूरा ध्यान जल्द से जल्द नतीजे जारी करने में था. इस ख़राब रिज़ल्ट का सीधा असर हज़ारों छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है."
सोशल मीडिया पर अभियान
बुधवार को नतीजे घोषित होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर कई लोग ओएसएम पर सवाल उठा रहे हैं.
सोशल मीडिया पर इस प्रक्रिया के ख़िलाफ़ एक ऑनलाइन याचिका भी शुरू की गई है जिस पर पहले चौबीस घंटे में ही 10 हज़ार से अधिक हस्ताक्षर किए जा चुके हैं.
ग़ाज़ियाबाद में एक कोचिंग संस्थान फ़िज़िक्स हेडक्वार्टर्स के संचालक अनुराग त्यागी ने भी ओसएम पर सवाल उठाते हुए बीबीसी से कहा, "कई छात्र नतीजों के बाद दुखी हैं, ऐसा लगता है कि परीक्षा कॉपियों का सही से आकलन नहीं हो पाया."
त्यागी के मुताबिक़, वह इस मुद्दे पर अदालत का रुख़ करने का विचार कर रहे हैं और क़ानूनी सलाह लेकर याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं.
अनुराग त्यागी कहते हैं, "जिन भी छात्रों से मैंने बात की है उन सभी को यह लग रहा है कि ओएसएम की वजह से उन्हें कम नंबर मिले हैं. सीबीएसई के छात्रों के नंबर यदि अन्य बोर्ड के छात्रों के मुक़ाबले कम आएंगे तो उन्हें आगे स्नातक में दाख़िला लेते समय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है."
हालांकि, सीबीएसई ने इस तरह के आरोपों पर कोई जवाब नहीं दिया है. बीबीसी ने सीबीएसई के परीक्षा नियंत्रक संयम भारद्वाज को इस संबंध में सवाल भेजे हैं लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका है.
सीबीएसई -2026 बोर्ड परीक्षाओं के लिए उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर देशभर के 3,000 से अधिक स्कूलों को मूल्याकंन केंद्र बनाया गया.
यूपी के ऐसे ही एक मूल्यांकन केंद्र (इवेलुएशन सेंटर) के चीफ़ नोडल सुपरवाइजर ने नाम न प्रकाशित करने के अनुरोध के साथ बीबीसी न्यूज हिन्दी से बात की.
उन्होंने बताया, "स्टूडेंट्स के प्रदर्शन में कमी के पीछे एक वजह कॉपी जांचने वाले शिक्षकों (इवेलुएटर्स) की क्षमता व चयन प्रक्रिया में कमी है."
वे कहते हैं, "सीबीएसई से संबद्ध टीचरों की जानकारी डालने वाले ओएसिस सॉफ्टवेयर में उनके शिक्षण अनुभव से जुड़ी जो जानकारी भरी जाती है, उसका फ़िलहाल कोई वेरिफ़िकेशन नहीं हो रहा है."
"बोर्ड परीक्षा की कॉपी जांचने के लिए सीबीएसई ओएसिस के इसी डेटा से मूल्यांकनकर्ता शिक्षकों का चयन करती है. इस तरह कम अनुभव वाले शिक्षकों की पढ़ाई व कॉपी चेकिंग का नुकसान स्टूडेंट्स को हो रहा है."
हालांकि वह यह भी कहते हैं कि सीबीएसई के पास कॉपी रीचेक का सिस्टम है और ग़लत कॉपी पाए जाने पर दंड का भी प्रावधान है, इसलिए अगर कॉपी ग़लत चेक पाई जाए तो जवाबदेही तय होती है लेकिन क्लासरूम में स्टूडेंट्स जिस क्वालिटी की शिक्षा पा रहे हैं, फ़िलहाल उसका कोई विशेष चेक नहीं है क्योंकि हायरिंग का सिस्टम पूरी तरह स्कूल प्रबंधन के हाथ में है.
वह कहते हैं, "सीबीएसई के सिटी कोऑर्डिनेटर्स को इस डेटा की निगरानी करनी चाहिए ताकि अनुभवहीन या तीन साल से कम शिक्षण अनुभव वाले टीचरों के हाथ में स्टूडेंट्स की कॉपी न जाए."
हालांकि वह यह भी कहते हैं कि उनके केंद्र में सीबीएसई के सॉफ़्टवेयर से कॉपी चेक करने में किसी टीचर को कोई समस्या नहीं आई.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित स्कूल की प्रिंसिपल भी ऐसे ही सवाल उठाती हैं.
बीबीसी से बात करते हुए अपना नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर वो कहती हैं, "बोर्ड ने तैयारी तो की थी लेकिन अब नतीजों के बाद लग रहा है कि ओएसएम नतीजों में गिरावट की एक वजह हो सकता है."
परीक्षा में आए प्रश्न पत्रों को भी कम नंबर आने के लिए ज़िम्मेदार बताते हुए वो कहती हैं, "पेपर में भी बदलाव आया है. स्किल आधारित सवाल भी पूछे गए, कई प्रश्नों में केस स्टडी वगैरह के बारे में पूछा गया."
"बच्चे अभी ठीस से इस कान्सेप्ट को अडॉप्ट नहीं कर पा रहे हैं, बच्चों को अभी इस तरह के सवालों को समझने में वक़्त लगेगा, मुझे लगता है कि ये भी एक वजह है कि बहुत से बच्चे अच्छी तरह से जवाब नहीं लिख पाए."
लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि सिर्फ़ ओसीएम को ही नतीजों में इस गिरावट का ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता है.
एक स्कूल के प्रबंधक अपना नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, "पेपर जांचने में बदलाव हुआ ये रिज़ल्ट गिरने का एक कारण हो सकता है. लेकिन हाल के सालों में छात्रों की गुणवत्ता में भी गिरावट आई है, ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में."
"अब परिजन उन बच्चों को भी विज्ञान वर्ग में दाख़िला दिलाने पर ज़ोर देते हैं जिन्हें क़ायदे से ह्यूमेनिटीज़ में दाख़िला लेना चाहिए. कई छात्रों का मक़सद किसी भी तरह नीट में पासिंग मार्क्स लाकर आगे पेड मेडिकल सीट लेना होता है, ऐसे बच्चे भी परीक्षा में ठीक नहीं कर पाते."
ये प्रबंधक तर्क देते हैं, "हाल के सालों में कोचिंग आधारित परीक्षाओं का चलन बढ़ा है, कई बच्चे जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं की तैयारी में ही लगे रहते हैं, कुछ तो साल भर में सौ दिन की क्लास भी नहीं करते. इसका भी असर नतीजों पर पड़ रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.