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बांग्लादेश ने कहा- ब्रिक्स में भारत ने तारिक़ रहमान को पीएम की हैसियत से नहीं बुलाया
बांग्लादेश उस रक्षा गठबंधन में शामिल होना चाहता है, जिसका उसे न्योता नहीं मिला है. पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने की चाहत बांग्लादेश कई बार सार्वजनिक रूप से प्रकट कर चुका है.
लेकिन पाकिस्तान ने गुरुवार को कहा कि फ़िलहाल इसे विस्तार देने की कोई योजना नहीं है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह बयान साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान दिया.
तारिक़ रहमान इस साल फ़रवरी में जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने थे तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नई दिल्ली आने के लिए न्योता भेजा था. रहमान नहीं आए और पहले विदेशी दौरे के लिए मलेशिया को चुना. मलेशिया के बाद रहमान चीन गए.
12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स समिट होने जा रहा है और तारिक़ रहमान को बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था.
बिम्सटेक बंगाल की खाड़ी के सात देशों का क्षेत्रीय संगठन है.
गुरुवार को बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि भारत में आयोजित ब्रिक्स समिट में न तो प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान जाएंगे और न ही कोई अन्य प्रतिनिधि.
'न्योता बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को नहीं मिला'
हुमायूं कबीर ने फ़ॉरन सर्विस एकेडमी में पत्रकारों से कहा, "जब माहौल अनुकूल होगा और आपसी सम्मान बना रहेगा, तब द्विपक्षीय यात्राएं होंगी. इसमें जल्दबाज़ी करने की कोई ज़रूरत नहीं है. भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स समिट में शामिल होने का न्योता दिया था. इसे द्विपक्षीय निमंत्रण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. पहली यात्रा बहुपक्षीय नहीं हो सकती. हम द्विपक्षीय यात्राओं और बातचीत को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं."
यानी तारिक़ रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद बांग्लादेश ने भारत से मिले दो निमंत्रणों की परवाह नहीं की. लेकिन सवाल उठ रहा है कि बांग्लादेश जिस ब्रिक्स गुट का सदस्य बनना चाहता है, उसके समिट में शामिल क्यों नहीं हो रहा है?
भारत के साथ तनावपूर्ण संबंध और शेख़ हसीना के बाद की विदेश नीति तैयार करने की रहमान सरकार की कोशिशें दोनों देशों के बीच संपर्क में बाधा बन रही हैं. बांग्लादेश ने जून में रूस से ब्रिक्स में अपनी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन करने का अनुरोध किया था.
सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज के रिसर्च फेलो इमरान अहमद ने निक्केई एशिया से कहा, "तारिक़ रहमान की ग़ैर-मौजूदगी ब्रिक्स से बांग्लादेश के दूर होने की बजाय भारत-बांग्लादेश संबंधों में मौजूदा समस्याओं के बारे में ज़्यादा बताती है."
कहा जा रहा है कि रहमान के लिए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल न होने के कुछ नुक़सान भी हो सकते हैं.
अमेरिका में बांग्लादेश के राजदूत रहे और थिंक टैंक बांग्लादेश एंटरप्राइज इंस्टिट्यूट के अध्यक्ष एम. हुमायूं कबीर ने कहा कि प्रधानमंत्री की मौजूदगी से नई सरकार को रूस और ईरान जैसे देशों के नेताओं के सामने अपनी स्थिति और अपना पक्ष रखने का मौका मिलता.
कबीर ने निक्केई एशिया से कहा, "2024 के बाद की स्थिति में नई सरकार वाले बांग्लादेश के लिए वहाँ मौजूदगी अपने पक्ष को रखने या यह बताने में मददगार होती कि बांग्लादेश अब अलग तरीक़े से कैसे सोच रहा है. परिचय और आमने-सामने की बातचीत हमेशा बहुत मददगार होती है."
बांग्लादेश क्या संकेत दे रहा है?
तारिक़ रहमान की सरकार की विदेश नीति यह संकेत देती है कि बांग्लादेश भारत केंद्रित नीति पर बहुत ध्यान नहीं दे रहा है.
सात अगस्त को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का जॉइंट एग्रीमेंट में शामिल होने में बांग्लादेश की दिलचस्पी है.
इस समझौते में सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता है, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा.
बांग्लादेश को इस समझौते में शामिल होने का निमंत्रण नहीं मिला है, लेकिन उसने इसमें दिलचस्पी दिखाई है.
मंत्रियों और अधिकारियों ने कहा है कि वे इसे सकारात्मक रूप में देखते हैं. इस्लामिक देशों के बीच सुरक्षा समझौता असामान्य नहीं है और उनका मानना है कि इससे अन्य साझेदार देशों के साथ संबंध प्रभावित नहीं होंगे.
मक्का समझौते में शामिल होने की चाहत केवल बांग्लादेश की मौजूदा सरकार की ही नहीं है बल्कि मुख्य विपक्षी जमात-ए-इस्लामी की भी है.
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीक़ुर रहमान ने 27 अगस्त को एक बयान में कहा था, ''मक्का समझौते में शामिल होना पूरी तरह से बांग्लादेश का संप्रभु और आंतरिक मामला है. अगर बांग्लादेश देश और उसके लोगों की ज़रूरतों और हितों को ध्यान में रखते हुए कोई फ़ैसला लेता है, तो किसी और के लिए इससे परेशान या चिंतित होने की कोई वजह नहीं है.''
यानी भारत के मामले में बांग्लादेश के विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की सोच एक जैसी दिख रही है. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वहाँ के आम लोग भारत को लेकर क्या सोचते हैं.
इससे पहले बांग्लादेश में ऐसी स्थिति नहीं थी क्योंकि शेख़ हसीना की अवामी लीग एक ऐसी ताक़त थी जो भारत के साथ अच्छे संबंधों की वकालत करती थी.
मक्का समझौते में शामिल होना क्या बांग्लादेश के हक़ में है?
कहा जा रहा है कि बांग्लादेश की यह भाषा महत्वपूर्ण है क्योंकि ढाका ने परंपरागत रूप से प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच अपने लिए कूटनीतिक गुंजाइश बनाए रखने की कोशिश की है.
हाल के घटनाक्रमों को मिलाकर देखा जाए तो यह संकेत मिल सकता है कि अपने कूटनीतिक रिश्तों की दिशा तय करते समय बांग्लादेश भारत को पहले की तुलना में कम महत्व दे रहा है.
इमरान अहमद ने निक्केई एशिया से कहा, "मेरे विचार में सबसे स्पष्ट व्यापक संकेत यह नहीं है कि बांग्लादेश भारत से हटकर चीन, पाकिस्तान या पर्सियन गल्फ़ को एक नए भू-राजनीतिक गुट के रूप में अपना रहा है, बल्कि यह है कि जिस तरह ढाका अपने बाहरी संबंधों को आकार दे रहा है, उसमें भारत की केंद्रीय भूमिका कम होती जा रही है."
उन्होंने कहा, "बांग्लादेश अपने लिए उपलब्ध साझेदारों की संख्या बढ़ाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है. इस अर्थ में 'बांग्लादेश फ़र्स्ट' एक ज़्यादा विविध विदेश नीति का रूप ले रहा है. मक्का समझौते वाले देशों के साथ क़रीबी संबंध ढाका को किसी एक खेमे का चुनाव किए बिना अपने विकल्प बढ़ाने का मौक़ा दे सकते हैं, लेकिन औपचारिक रूप से समझौते में शामिल होना अलग बात होगी. यह उदार साझेदारियों से आगे बढ़कर एक औपचारिक सुरक्षा व्यवस्था की ओर जाने जैसा होगा."
कई विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बांग्लादेश मक्का समझौते में शामिल होता है तो भारत को चिंता ज़रूर होगी.
बांग्लादेश के पूर्व विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने पिछले महीने 21 अगस्त को न्यूज़ 18 के साथ बातचीत में कहा था, ''काग़ज़ पर मक्का समझौता मुस्लिम बहुल देशों के बीच बहुपक्षीय सहयोग की एक निश्चित तस्वीर पेश कर सकता है. लेकिन अगर हम ज़मीनी हक़ीक़त देखें, तो बांग्लादेश को इससे वास्तविक और ठोस लाभ क्या मिलेगा?''
मोमेन ने कहा था, ''भारत के साथ मज़बूत, स्थिर और सहयोगपूर्ण संबंध महत्व रखते हैं. ऐसा कोई भी क़दम जो इस संतुलन को प्रभावित करता हो या हमें विदेशी सैन्य गुटों में उलझाता हो, बांग्लादेश के मूल राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं है. बांग्लादेश ने ऐतिहासिक रूप से'सबसे दोस्ती, किसी से दुश्मनी नहीं' की नीति के तहत लाभ हासिल किया है. ऐसे सैन्य गठबंधनों या रक्षा समझौतों की ओर बढ़ना, जो क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं, उल्टा असर डाल सकता है.''
आरएसएस का मुखपत्र माने जाने वाली अंग्रेज़ी पत्रिका ऑर्गेनाइज़र के संपादक रहे शेषाद्री चारी ने तारिक़ रहमान के ब्रिक्स समिट में शामिल नहीं होने पर पिछले महीने लिखा था, ''कोई भी व्यावहारिक नेता इस अवसर का लाभ उठाता और अपने देश के हित में भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने की पूरी कोशिश करता.''
''यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री नई दिल्ली आने के भारत के निमंत्रण का सकारात्मक जवाब देने में हिचक रहे हैं. संभवतः उनके सलाहकार उन्हें ऐसा करने से रोक रहे हैं, जिनकी घरेलू और विदेश नीतियां भारत विरोधी नैरेटिव तैयार करने पर आधारित हैं.''
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