ऑपरेशन सिंदूर के 15 महीने बाद तत्कालीन सीडीएस जनरल चौहान ने 'सफ़ाई' क्यों दी?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
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भारत के पूर्व चीफ़ ऑफ डिफेंस स्टाफ़ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस्तेमाल की गई एक लोइटरिंग म्यूनिशन पाकिस्तान के सरगोधा के पास स्थित किराना हिल्स इलाक़े में गिरी होगी, जहाँ परमाणु हथियार से जुड़ी उसकी सुविधाएं मौजूद हैं.
लॉइटरिंग म्यूनिशन वन-वे विस्फोटक ड्रोन होता है, जो किसी लक्ष्य के ऊपर या उसके पास उड़ सकता है, उसकी तलाश कर सकता है या उसके मिलने का इंतज़ार कर सकता है.
इसके बाद जानबूझकर उससे टकराकर विस्फोट कर देता है. इसे आम तौर पर सुसाइड ड्रोन भी कहा जाता है.
आरएसएस से जुड़े थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में मंगलवार को ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद के घटनाक्रम पर आयोजित 'विमर्श' कार्यक्रम में बोलते हुए जनरल चौहान ने कहा था कि हमलों से पहले भारत ने रडार की तलाश के लिए सरगोधा के आसपास कई सुसाइड ड्रोन भेजे थे.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मीडिया ब्रीफिंग में तत्कालीन एयर ऑपरेशंस के महानिदेशक एयर मार्शल ए.के.
भारती ने पिछले साल 12 मई को कहा था कि भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान के किराना हिल्स में स्थित परमाणु प्रतिष्ठान को निशाना नहीं बनाया था.

उस समय प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल के जवाब में एयर मार्शल भारती ने कहा था, "हमें यह बताने के लिए धन्यवाद कि किराना हिल्स में कोई परमाणु प्रतिष्ठान है. हमें इसके बारे में जानकारी नहीं थी. हमने किराना हिल्स पर हमला नहीं किया है, वहाँ जो भी मौजूद है, उस पर भी नहीं."
उन्होंने बताया था कि किराना हिल्स सरगोधा से क़रीब 10 किलोमीटर उत्तर में है.
जनरल चौहान ने समझाया कि इन सुसाइड ड्रोन की उड़ान क्षमता क़रीब दो घंटे की थी. अगर इस अवधि के भीतर उन्हें कोई लक्ष्य नहीं मिलता, तो वे अंततः नीचे गिर जाते हैं और कहीं न कहीं जाकर टकरा जाते हैं.
जनरल चौहान ने किराना हिल्स में लोइटरिंग म्यूनिशन के गिरने की आशंका का ज़िक्र करते हुए कहा, "वह आकर उन पहाड़ियों में से किसी एक से टकराया होगा."
उन्होंने पाकिस्तानी मीडिया में दिखाई गई उन तस्वीरों का भी ज़िक्र किया, जिनमें इलाक़े से धुआं उठता हुआ दिखाया गया था.
पिछले साल पाकिस्तानी सेना के पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट ने दावा किया था कि भारत ने पाकिस्तान में इसराइली ड्रोन भेजे थे और सेना ने ऐसे 77 ड्रोन मार गिराए थे.
पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा था कि इन ड्रोन को अलग-अलग तरीक़ों से मार गिराया गया. बताया गया कि ये कथित तौर पर इसराइल में बने हारोप ड्रोन थे.
वहीं, भारत ने दावा किया था कि इन ड्रोन हमलों से पाकिस्तान के कई डिफेंस रडार सिस्टम निष्क्रिय हो गए थे, जिनमें लाहौर का एक रडार भी शामिल था. हालांकि, पाकिस्तान ने इस दावे को ख़ारिज किया था.

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क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट्स
थिंक टैंक कार्नेगी एन्डॉमेंट फोर इंटरनेशनल पीस में न्यूक्लियर पॉलिसी प्रोग्राम के सीनियर फेलो अंकित पांडा कहते हैं कि भारत के पूर्व चीफ़ ऑफ डिफेंस स्टाफ़ जनरल अनिल चौहान की हालिया टिप्पणियां मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संकट के एक अहम अनसुलझे घटनाक्रम पर कुछ स्पष्टता देती हैं.
पांडा सबस्टैक.कॉम पर उन्होंने लिखा है कि भारत की एक लोइटरिंग म्यूनिशन संभवतः पाकिस्तान के किराना हिल्स के पास जा गिरी थी, जिस इलाक़े को पाकिस्तान के परमाणु ढांचे से जोड़ा जाता है.
पांडा का तर्क है कि अगर ऐसा हुआ था, तो यह संभवतः अनजाने में हुआ हमला था, लेकिन यह परमाणु संघर्ष की दिशा में अनजाने में बढ़ने के गंभीर जोखिम को दिखाता है.
अंकित पांडा ने लिखा है, ''मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच क़रीब 88 घंटे तक सैन्य संघर्ष चला, जिसमें फाइटर जेट, ड्रोन और अन्य आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ. एक बड़ा विवाद यह था कि क्या भारत ने जानबूझकर सरगोधा के पास स्थित किराना हिल्स को निशाना बनाया था. यहाँ पाकिस्तानी वायुसेना का मुशाफ एयरबेस है और माना जाता है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमताओं से जुड़ी सुविधाएं भी आसपास मौजूद हैं.''
पहले की रिपोर्टिंग और ओपन-सोर्स सामग्री में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला था कि भारत ने जानबूझकर किसी परमाणु ठिकाने को निशाना बनाया था. भारत ने भी किराना हिल्स पर हमला करने से इनकार किया था.
अंकित पांडा एक अहम अस्पष्टता की ओर ध्यान दिलाते हैं. चौहान ने कथित तौर पर एक तरफ़ कहा कि किराना हिल्स को निशाना नहीं बनाया गया, लेकिन दूसरी तरफ यह भी कहा कि भारत ने "सरगोधा और किराना हिल्स पर कई लोइटरिंग म्यूनिशन भेजे थे."

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इसके क्या मायने निकाले जाएंगे?
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर लिखा है, ''मई 2025 में भारत का ऑपरेशन सिंदूर साढ़े तीन दिन में समाप्त होने के कुछ ही समय बाद, सैटेलाइट तस्वीरें सामने आई थीं, जिनमें किराना हिल्स पर धुआं और असर के निशान दिखाई दिए थे. इस इलाक़े को व्यापक रूप से पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से जुड़े ढांचे और जखीरे के रूप में देखा जाता है.''
''भारत के तत्कालीन चीफ़ ऑफ डिफेंस स्टाफ़ जनरल अनिल चौहान ने स्पष्ट किया कि किराना हिल्स पर हुआ कोई भी असर पूरी तरह अनजाने में था. उन्होंने कहा कि पास के सरगोधा एयरबेस, जो क़रीब 10 किलोमीटर दूर है, वहाँ रडार प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए लोइटरिंग म्यूनिशन दो घंटे की बैटरी क्षमता ख़त्म होने के बाद ख़ुद ही नीचे आकर टकरा गए होंगे.''
''किराना हिल्स पर हुए असर को जानबूझकर किए गए हमले के बजाय ड्रोन की तकनीकी कार्यप्रणाली से जोड़कर चौहान ने भारत के इस रुख़ को मज़बूत किया कि ऑपरेशन सिंदूर का निशाना केवल आतंकवादी ढांचा और पारंपरिक सैन्य ठिकाने थे, पाकिस्तान की परमाणु सुविधाएं नहीं. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ऑपरेशन के 15 महीने से अधिक समय बाद जनरल चौहान ने यह स्पष्टीकरण क्यों दिया.''
अमेरिका की अल्बनी यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफर क्लैरी ने भी एक्स पर लिखा है कि 15 महीने बाद आख़िर इस पर स्पष्टीकरण की ज़रूरत क्यों पड़ी?
अंकित पांडा मानते हैं, ''भारत के लिए इस तरह की कहानी गढ़ने का कोई स्पष्ट फ़ायदा नहीं है, क्योंकि इससे भारत ज़्यादा जोखिम लेने वाला, कम सटीक और संभावित रूप से लापरवाह दिखाई देता है. साथ ही इससे पाकिस्तान का यह दावा मज़बूत होता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच पारंपरिक सैन्य संघर्ष बहुत तेज़ी से परमाणु जोखिम में बदल सकता है. पाकिस्तानी वायुसेना का मुशाफ एयरबेस किराना हिल्स से क़रीब 10 किलोमीटर दूर है. इसलिए यह सवाल उठता है कि एयरबेस के आसपास रडार को दबाने के लिए भेजी गई हारोप किसी संवेदनशील इलाक़े में कैसे पहुँच गई.''

रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी से हमने जानना चाहा कि जनरल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर के 15 महीने बाद ये स्पष्टीकरण क्यों दिया?
राहुल बेदी ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''मेरे मन में भी कल से यही सवाल चल रहा है. मुझे नहीं लगता है कि इससे भारत की छवि मज़बूत होगी. यह बात जनरल चौहान ने आरएसएस से जुड़े थिंक टैंक में कही है. ज़ाहिर है कि यह डोमस्टिक कंजंप्शन के लिए है. उनके बयान को मैं गहराई से समझने की कोशिश करता हूँ तो यही लगता है कि सेना का राजनीतिकरण हो रहा है.''
राहुल बेदी कहते हैं, ''मेरी स्टडी के अनुसार भारत ने लोइटरिंग म्यूनिशन के रूप में इसराइल में बना हारोप ड्रोन भेजा था. हारोप को जब 'ए' लक्ष्य पर ब्लास्ट के लिए भेजते हैं तो वो 'ए' पर ही करेगा न कि बीच में आप 'बी' कर सकते हैं.''
''मतलब जनरल चौहान कह रहे हैं कि भारत ने लोइटरिंग म्यूनिशन सरगोधा पर भेजा था तो वहीं ब्लास्ट होता न कि 10 किलोमीटर दूर किराना हिल्स पर. जहाँ तक मेरी समझ है तो उसके आधार पर कह सकता हूँ कि हारोप को बीच में रीनेटवर्क नहीं कर सकते हैं.''
राहुल बेदी कहते हैं, ''दरअसल, जनरल चौहान आम लोगों के बीच ये संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि हम पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों तक पहुँच रखते हैं लेकिन जानबूझकर उसे छोड़ दिया.''
दिल्ली स्थिति जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्पेशल सेंटर फोर नेशनल सिक्यॉरिटी स्टडीज़ में असोसिएट प्रोफ़ेसर लक्ष्मण कुमार भी कहते हैं कि 15 महीने बाद इस तरह की बात करना मेरे लिए भी समझ से परे है.
लक्ष्मण कुमार ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''जनरल चौहान रिटायर हो चुके हैं लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के वक़्त सीडीएस वही थे. रिटायरमेंट के बाद ऐसी बातें होती हैं लेकिन जनरल चौहान तत्कालीन सीडीएस थे, इसलिए थोड़ी हैरानी भी होती है. मुझे लगता है कि यह एक संदेश देने के लिए है कि भारत ज़िम्मेदार देश है और उसने अपनी पहुँच के बावजूद पाकिस्तान परमाणु ठिकानों को निशाना नहीं बनाया.''

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जनरल चौहान ने और क्या कहा?
जनरल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की ऑपरेशनल सफलता हालात को ठीक से समझने से हासिल हुई. जनरल चौहान ने कहा कि सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर नेटवर्किंग थी.
उन्होंने कहा, "हम बेहतर फ़ैसले लेने में सक्षम थे." उन्होंने इसका श्रेय स्पष्ट राजनीतिक दिशा को भी दिया, जिसने सशस्त्र बलों को अभियान की योजना बनाने की पूरी स्वतंत्रता दी.
पाकिस्तान की ओर से सैटेलाइट तस्वीरों के इस्तेमाल पर पूर्व सीडीएस ने कहा कि चीनी कंपनियों की कॉमर्शियल सैटेलाइट तस्वीरें सभी के लिए उपलब्ध थीं. उन्होंने कहा कि संभवतः पाकिस्तान ने अपने हमलों के परिणामों का आकलन करने के लिए ऐसी तस्वीरों का इस्तेमाल करने की कोशिश की.
उन्होंने पाकिस्तान की ख़ुफ़िया जानकारी की सटीकता पर भी सवाल उठाया, ख़ासकर समुद्री ऑपरेशन के मामले में. कथित तौर पर पाकिस्तानी ब्रीफिंग में कहा गया था कि भारतीय कैरियर बैटल ग्रुप अरब सागर में कुछ विशेष स्थानों पर मौजूद था. लेकिन वेस्टर्न नेवल कमांड से जांच करने पर पता चला कि वह वास्तव में 100 से 300 नॉटिकल मील दूर था.
जनरल चौहान ने इसे विदेशी सोर्स पर पाकिस्तान की निर्भरता से जोड़ा. उन्होंने कहा कि उस अवधि में पाकिस्तान की लंबी दूरी की समुद्री निगरानी वाले विमान भी उड़ान नहीं भर रहे थे.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में मध्यस्थता करने के दावों पर जनरल चौहान ने कहा कि यह फ़ैसला सीधे दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस के बीच हुआ था.
उन्होंने कहा, "युद्धविराम का फ़ैसला दोनों डीजीएमओ के बीच हुआ था और बस इतना ही. मुझे किसी और की भूमिका नज़र नहीं आती."
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि युद्धविराम की घोषणा से पहले इसकी जानकारी अमेरिकी पक्ष तक कैसे पहुंच गई, जबकि भारत इसकी घोषणा करने वाला था. उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि यह जानकारी भारतीय पक्ष से लीक नहीं हुई थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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