You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अखिलेश के 'पीडीए' की काट: बीजेपी की नई टीम में यूपी के लिए ये संदेश
- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम की घोषणा हो चुकी है. इस टीम में उत्तर प्रदेश से शामिल किए गए चेहरों को लेकर काफ़ी चर्चा है.
उनके बैकग्राउंड से लेकर राज्य की राजनीति में उनके प्रभाव का आकलन और विश्लेषण किया जा रहा है. यह विश्लेषण इसलिए भी अधिक है क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब महज़ छह महीने का वक़्त बचा है और ये भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चुनावी मैदान भी है.
लोकसभा की 80 सीटों के साथ देश की कुल 543 सीटों में अकेले यूपी की हिस्सेदारी क़रीब 15 फ़ीसदी है. 2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ़ लखनऊ की सत्ता का मुकाबला नहीं होगा, इसके नतीजे 2029 की राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी संकेत देने वाले माने जाएंगे.
यही कारण है कि नितिन नबीन की टीम में शामिल किए गए चेहरों के बारे में जानना महत्वपूर्ण हो जाता है.
इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, जो कि मूलत: उत्तर प्रदेश की हैं नहीं, पर उनकी राजनीतिक ज़मीन यही है. उनके अलावा नितिन नबीन की नई टीम में बस्ती से दो बार के सांसद रहे हरीश द्विवेदी, धौरहरा सीट से सांसद रहीं रेखा वर्मा, राज्यसभा सांसद संगीता यादव और अमरपाल मौर्य, बुलंदशहर के सांसद डॉ. भोला सिंह, पूर्व अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कुलपति तारिक़ मंसूर और बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली शामिल हैं.
इन आठ नामों के अलावा महाराष्ट्र के नेता विनोद तावड़े की भी चर्चा है, जिन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है.
वहीं, प्रतापगढ़ के डॉ. स्वदेश सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया है. उन्हें संगठन में युवा प्रतिनिधित्व के तौर पर देखा जा रहा है.
फ़िलहाल प्रमुख आठ नामों पर नज़र डालें तो पार्टी की तरफ़ से इनके ज़रिए महिलाओं से लेकर ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समुदायों तक, अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखती है.
प्रदेश की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार भी इसी ओर इशारा करते हैं और कहते हैं कि यह आगामी चुनाव को देखते हुए किया गया फ़ैसला है.
लेकिन बीजेपी इसे किसी चुनावी या विपक्षी रणनीति के जवाब के तौर पर देखने से इनकार करती है. बीजेपी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि राष्ट्रीय संगठन में यूपी को मिली बड़ी हिस्सेदारी का सीधा संबंध चुनाव से नहीं है.
"बीजेपी की राष्ट्रीय टीम किसी क्षेत्रीय दल के नैरेटिव को काउंटर करने के लिए नहीं बनती है. उत्तर प्रदेश राजनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण राज्य है. सबसे ज्यादा लोकसभा की 80 सीटें यहीं से आती हैं. इस लिहाज से उत्तर प्रदेश की भूमिका बड़ी है और उसी अनुपात में राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश को भागीदारी मिली है."
हालांकि त्रिपाठी यह भी मानते हैं कि चुनाव से पहले नई टीम की घोषणा से कार्यकर्ताओं में उत्साह ज़रूर पैदा होता है और पार्टी को चुनाव में उसका फ़ायदा मिलने की उम्मीद है.
"चुनाव से इसका डायरेक्ट लेना-देना नहीं है. लेकिन निश्चित तौर पर बीजेपी के कार्यकर्ताओं में उत्साह ज़रूर आता है... इस ऊर्जा का लाभ हमें चुनाव में ज़रूर मिलेगा."
इन नियुक्तियों के पीछे क्या है संदेश?
वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय के मुताबिक बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में यूपी से शामिल किए गए प्रमुख संगठनात्मक चेहरों को सिर्फ़ व्यक्तिगत नियुक्तियों के तौर पर नहीं देखना चाहिए. उनके अनुसार इनमें क्षेत्रीय, जातीय और महिला प्रतिनिधित्व का संतुलन साधने की कोशिश छुपी है.
वह बताते हैं कि यूपी को बीजेपी ने संगठनात्मक रूप से छह क्षेत्रों में बांटा है -काशी, गोरखपुर, अवध, कानपुर-बुंदेलखंड, ब्रज और पश्चिम क्षेत्र. नई टीम में शामिल चेहरे इन्हीं अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
स्मृति ईरानी काशी क्षेत्र से, हरीश द्विवेदी पूर्वी यूपी/गोरखपुर क्षेत्र से, जबकि रेखा वर्मा रुहेलखंड क्षेत्र से आती हैं. इस तरह नियुक्तियों में क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान रखा गया है.
जिनकी नियुक्ति ख़ास है उनमें वह हरीश द्विवेदी का नाम प्रमुखता से आगे रखते हैं.
आनंद कहते हैं, ''हरीश जी संगठन के आदमी हैं. उनकी राजनीतिक यात्रा विद्यार्थी परिषद से शुरू होकर बीजेपी युवा मोर्चा और फिर राष्ट्रीय संगठन तक पहुंची है. दो बार लोकसभा सांसद रह चुके द्विवेदी 2024 में चुनाव हार गए थे, लेकिन पार्टी ने इसके बावजूद उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी है. इसके पीछे एक बड़ी वजह उनका ब्राह्मण समाज से आना और अपेक्षाकृत युवा चेहरे को आगे बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है.''
बीबीसी ने हरीश द्विवेदी से फ़ोन पर बात की. संगठन में राष्ट्रीय महामंत्री का पद मिलने पर वह कहते हैं, ''भाजपा कैडर आधारित पार्टी है और जो भी दायित्व पार्टी देती है, वह कार्यकर्ताओं की योग्यता और क्षमता को देखते हुए ही दी जाती है. मुझ पर संगठन का लगातार आशीर्वाद रहा है. अभी भी मैं असम का प्रभारी हूं और राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव का भी मैं प्रभारी बनाया गया, तो काम को देखते हुए ही पार्टी ज़िम्मेदारी देती रहती है.''
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव पिछले कुछ वर्षों में कई मौकों पर बीजेपी और योगी आदित्यनाथ सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने के आरोप लगाते रहे हैं. 2020 में विकास दुबे एनकाउंटर के बाद उन्होंने इसे ब्राह्मणों के बीच बढ़ती असुरक्षा और कथित भेदभाव के नैरेटिव से जोड़ा. इसके बाद परशुराम जयंती की छुट्टी खत्म किए जाने और ब्राह्मणों की राजनीतिक हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को भी उन्होंने उठाया.
अब 2026 में अखिलेश ने अपने 'पीडीए' फॉर्मूले में 'पी' को 'पिछड़ा' और 'पीड़ित' के साथ 'पंडित' से जोड़ते हुए कहा है कि यूपी में ब्राह्मण 'पीड़ा' में हैं.
दिलचस्प बात यह है कि इस नैरेटिव को लेकर बीजेपी के भीतर भी चिंता के संकेत दिखे हैं. 2020-21 में पार्टी के नेताओं ने ब्राह्मणों के बीच नाराज़गी की धारणा पर चर्चा की थी, और हाल के महीनों में ब्राह्मण विधायकों की अलग बैठक और समुदाय को लेकर बढ़ती राजनीतिक हलचल ने पार्टी नेतृत्व को सतर्क किया है. हालांकि, बीजेपी के भीतर यह भी तर्क है कि संगठन और सरकार में ब्राह्मणों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है.
और इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए हरीश द्विवेदी कहते हैं, '' दूसरे दलों को लगता है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ ऐसा नैरेटिव तैयार कर वह चुनावी लाभ पा सकते हैं. लेकिन कुल मिलाकर ब्राह्मण समाज हो या कोई दूसरा समाज वर्तमान समय में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सभी बीजेपी के साथ हैं.''
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय इसे बीजेपी की 2027 की तैयारी से जोड़कर देखते हैं.
वह कहते हैं, '' 2024 में पीडीए के ज़रिए सपा को मिली सफलता ने विपक्ष का मनोबल बढ़ाया है. कांग्रेस और सपा 2027 में साथ लड़ने की तैयारी में दिख रहे हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता उन्हें इस गठबंधन को जारी रखने के लिए प्रेरित करती है. ऐसे में बीजेपी की नई टीम को पीडीए के जवाब में अपना सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन मजबूत करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है.''
पसमांदा मुसलमानों को साधने की कोशिश?
उधर तारिक़ मंसूर और कुंवर बासित अली को संगठन में अहम ज़िम्मेदारी देकर बीजेपी ने पसमांदा मुसलमानों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश का संकेत दिया है.
हालांकि, तारिक़ मंसूर के मामले में यह नई नियुक्ति नहीं है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति मंसूर पहले से ही बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे और नई टीम में उन्हें इसी पद पर बरकरार रखा गया है. वहीं, कुंवर बासित अली बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष हैं और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी जिम्मेदारी दी गई है.
वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय कहते हैं, "बीजेपी को उम्मीद है कि उसकी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी वर्ग में शामिल पसमांदा मुसलमानों के बीच पार्टी अपनी जगह बना सकती है. यह कोशिश राष्ट्रीय स्तर पर ही नज़र आती है. राज्य स्तर पर देखें तो राज्य के मुख्यमंत्री केवल हिंदुत्व की राजनीति करने पर ज़ोर देते हैं. ऐसे में संगठन के इस दांव का कुछ ख़ास असर आने की उम्मीद नहीं दिखाई देती.''
चुनावी आंकड़े भी बताते हैं कि इस कोशिश का असर अभी तक सीमित ही रहा है.
स्मृति ईरानी की वापसी का यूपी चुनाव से कनेक्शन?
बात स्मृति ईरानी की करें तो वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं कि राष्ट्रीय संगठन में उनकी वापसी को यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए. वह बीजेपी की प्रमुख महिला नेताओं में हैं और एक अच्छी वक्ता भी लेकिन उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब केंद्र और यूपी नेतृत्व के बीच रिश्तों को लेकर लगातार चर्चा होती रही है. वह मानते हैं कि ईरानी और योगी आदित्यनाथ, दोनों ही प्रभावशाली और आक्रामक नेता हैं, इसलिए यूपी में उनके बीच समन्वय आसान नहीं होगा.
हालांकि वह स्मृति की नियुक्ति को लेकर थोड़ी चिंता भी ज़ाहिर करते हैं.
प्रधान कहते हैं, "योगी भी बहुत डॉमिनेटिंग हैं और स्मृति ईरानी उनसे ज़्यादा डॉमिनेटिंग. मुझे नहीं लगता कि आसानी से तालमेल हो पाएगा."
उनके मुताबिक, यूपी में स्मृति की भूमिका को लेकर यह सवाल बना रहेगा कि वह सिर्फ़ संगठनात्मक ज़िम्मेदारी निभाएंगी या राज्य की राजनीति में भी उनका हस्तक्षेप बढ़ेगा.
वह इसकी एक वजह बीजेपी के केंद्रीय और राज्य नेतृत्व के बीच मौजूद पुराने मतभेदों को भी मानते हैं. प्रधान के मुताबिक, स्मृति को केंद्रीय नेतृत्व के करीबी चेहरे के तौर पर देखा जाता है, जबकि योगी आदित्यनाथ के साथ केंद्र के रिश्तों को लेकर पहले भी कई बार अटकलें लगती रही हैं.
ऐसे में वह मानते हैं कि स्मृति की नियुक्ति के बाद यूपी बीजेपी में उनकी भूमिका को लेकर एक तरह का संदेह भी बना रह सकता है.
हालांकि, वह स्मृति की व्यक्तिगत राजनीतिक ताकत को भी पूरी तरह खारिज नहीं करते. 2019 में अमेठी में राहुल गांधी को हराने के बाद वह बीजेपी का एक बड़ा चेहरा बनीं, लेकिन 2024 में उन्हें उसी सीट पर हार का सामना करना पड़ा.
अब उस हार के बाद उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री की ज़िम्मेदारी मिलना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश है. हालिया रिपोर्टों में भी उनकी वापसी को यूपी चुनाव से पहले पार्टी की महिलाओं और लोकप्रिय मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा गया है.
क्या होगा असर?
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान के मुताबिक़, नई टीम में यूपी से शामिल चेहरों को सिर्फ़ सामाजिक प्रतिनिधित्व के नज़रिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा. उनका कहना है कि किसी समुदाय के नेता को संगठन में जगह देना तभी प्रभावी होगा, जब उस समुदाय में उनकी वास्तविक पकड़ और लोकप्रियता भी हो.
वह कहते हैं, "खाली ये दिखा कर कि ये दलित हो गया, ये बैकवर्ड हो गया, उससे काम नहीं चलेगा. उस आदमी की अपनी कम्युनिटी में कितनी लोकप्रियता है, वो मायने रखती है."
प्रधान इन नियुक्तियों को फ़िलहाल ज्यादा "कॉस्मेटिक" और कम प्रभावी मानते हैं. उनके मुताबिक, कुछ नए चेहरे ऐसे हैं जिनकी अपनी सामाजिक या राजनीतिक पकड़ बहुत सीमित है, इसलिए सिर्फ़ प्रतिनिधित्व के ज़रिए चुनावी असर पैदा करना आसान नहीं होगा. जबकि आनंद राय का मानना है कि बीजेपी ने बहुत सोच समझकर फ़ैसला लिया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.