न आरएसएस, न एबीवीपी बल्कि आरजेडी-जेडीयू में रहे सम्राट चौधरी कैसे बने बीजेपी की पसंद

सम्राट चौधरी

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं.

बिहार में बीजेपी वैसे तो बहुत पहले ही 'बड़े भाई' की भूमिका में आ गई थी लेकिन औपचारिक रूप से ऐसा 15 अप्रैल को हो जाएगा. सम्राट चौधरी, बिहार बीजेपी के उस पुराने सपने का अक्स है जो पार्टी ने साल 2005 में सत्ता में आने के बाद देखा था.

लेकिन सम्राट का बीजेपी की पहली पसंद बनना कई सवाल उठाता है.

पहला तो ये कि कभी नीतीश कुमार को पद से हटाने के लिए मुरेठा बांधने वाले सम्राट चौधरी, नीतीश की पसंद कैसे बन गए?

दूसरा मध्य प्रदेश ,ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में हार्डलाइनर को सीएम के तौर पर चुनने वाली बीजेपी को आरजेडी की पाठशाला में राजनीति का ककहरा पढ़े सम्राट क्यों पसंद आए? और तीसरा ये कि क्या इस फ़ैसले से पार्टी का कैडर सहज है ?

जैसा कि बीजेपी नेता विजय कुमार सिन्हा ने सम्राट चौधरी के नेता चुने जाने के बाद बीजेपी दफ़्तर में कहा, "गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव दिया है. हमारी त्याग, तपस्या और बलिदान से आज ये पल आया है."

आरएसएस बैकग्राउंड के विजय कुमार सिन्हा के इस बयान में जो दर्द छिपा है उसकी सबसे बड़ी वजह सम्राट का राजनीतिक करियर है. सम्राट जो आरजेडी, जेडीयू और हम में गुजरते हुए बीजेपी में आए हैं.

सम्राट जिनके मुख्यमंत्री बनने पर बीजेपी कार्यालय में मौजूद एक पुराने कार्यकर्ता बुदबुदाते हुए कहते हैं, " ये अच्छा नहीं हुआ. आरएसएस का आदमी सीएम बनना चाहिए."

सम्राट – राजद से बीजेपी की च्वाइस बनने तक

सम्राट चौधरी और अमित शाह

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16 नवंबर 1968 को जन्मे सम्राट चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है. उनके पिता शकुनी चौधरी समता पार्टी के संस्थापकों में से एक थे. शकुनी चौधरी ख़ुद भी सांसद और विधायक रहे. सम्राट चौधरी की मां पार्वती चौधरी भी विधायक रही हैं. तमिलनाडु की कामराज यूनिवर्सिटी से पीएफसी (प्री फाउंडेशन कोर्स) करने वाले सम्राट चौधरी की पत्नी कुमारी ममता पेशे से वकील हैं. इस दंपति के दो बच्चे हैं.

बिहार विधान परिषद की वेबसाइट के मुताबिक, उन्हें 1995 में एक राजनीतिक मामले में 89 दिन के लिए जेल जाना पड़ा था. 1999 में राबड़ी देवी सरकार में वो कृषि मंत्री बने लेकिन उनकी उम्र को लेकर विवाद खड़ा हुआ.

इंडिया टुडे की हिंदी पत्रिका के दिसंबर 1999 अंक में इस विवाद पर रिपोर्ट छपी है जिसमें लिखा है, "सम्राट चौधरी को राज्यपाल ने उस दिन बर्खास्त किया जब मंत्री महोदय अपना जन्मदिन मना रहे थे. राज्यपाल सूरजभान ने मज़ाक में कहा था कि मुझे दुख है कि मैं मंत्री को उनके जन्मदिन बर्खास्त कर रहा हूं. सम्राट चौधरी ने राज्यपाल के फ़ैसले को ग़लत बताते हुए दावा किया कि मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने उन्हें पद से हटने के लिए नहीं कहा है."

साल 2000 और 2010 में परबत्ता से सम्राट चौधरी विधायक चुने गए. साल 2013 में राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के उभार से नीतीश कुमार ने नाराज़ होकर बीजेपी से नाता तोड़ लिया था. उस वक़्त सम्राट चौधरी ने भी आरजेडी के 13 विधायकों को तोड़ कर जेडीयू का साथ दिया.

उसके बाद वो हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) में गए, जहां उनके पिता प्रदेश अध्यक्ष बने.

साल 2017 के अंत में उन्होंने बीजेपी ज्वाइन कर ली.

सौम्य नहीं, बीजेपी को आक्रामक नेता चाहिए

नीतीश कुमार के साथ सम्राट चौधरी

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बीजेपी में आने के बाद सम्राट चौधरी ने अशोक जयंती को बड़े स्तर पर आयोजित किया.

उन्होंने अपनी सांगठनिक ताकत का प्रदर्शन किया जिसके नतीजे में उन्हें साल 2023 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी के मुताबिक सम्राट के पोटेंशियल को बीजेपी नेतृत्व ने पहचाना है. यही वजह है कि बीजेपी के अंदर उनके राजनीतिक करियर का ग्राफ़ बहुत तेजी से बढ़ा. आरएसएस या एबीवीपी के बैकग्राउंड से इतर वो बीजेपी की पसंद बन गए.

वो कहते हैं, "बीजेपी के पास राज्य में जो वर्तमान नेता है वो सौम्य है, लेकिन पार्टी में ये समझ मजबूत होती जा रही है कि उसे बिहार में आगे बढ़ने के लिए एक आक्रामक और लड़ाकू लीडर चाहिए. सम्राट उसमें फिट बैठते हैं. आप देखिए सम्राट बीजेपी में 2017 में आते हैं और महज़ 6 साल में प्रदेश अध्यक्ष बन जाते हैं. फिर उपमुख्यमंत्री, वित्त विभाग, गृह विभाग जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां उन्हें दी जाती हैं. बीजेपी के अंदर सम्राट को सीएम बनाने को लेकर कई नेता बहुत सहज नहीं है लेकिन नीतीश कुमार का भी दबाव था कि सम्राट को सीएम बनाया जाए."

वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद कहते हैं, " बीजेपी से किसको सीएम बनाया जाए, इसको लेकर पार्टी बहुत कश्मकश में थी. इसलिए ये मामला लटका हुआ था. बिहार में बीजेपी के साथ मुश्किल ये है कि सुशील कुमार मोदी के बाद उनके पास कोई ऐसा चेहरा नहीं था जो सबको स्वीकार्य हो. सम्राट बिहार में उपमुख्यमंत्री नंबर एक थे, इसलिए उनको प्रोजेक्ट किया जाने लगा. दूसरे राज्यों में बीजेपी किसी भी चेहरे को आगे बढ़ा देती है, लेकिन बिहार में ये स्थिति नहीं है."

दरअसल सम्राट चौधरी की जाति ने भी अहम रोल अदा किया.

जाति ने निभाया अहम रोल

नीतीश कुमार और दूसरे नेताओं के साथ सम्राट चौधरी

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सम्राट कुशवाहा जाति से आते हैं जिनकी आबादी पिछड़ों में यादवों के बाद सबसे ज़्यादा है. जातिगत गणना के मुताबिक बिहार में कुशवाहा जाति की आबादी 4.2 फ़ीसदी है.

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, "सम्राट बीजेपी के लिए ज़रूरी और मजबूरी दोनों बन गए थे. बीजेपी चाहती है कि लव कुश समीकरण के साथ अति पिछड़ा उनके साथ आए. यानी मोटे तौर पर जेडीयू का कोर वोटर. ऐसे में किसी ऐसा नेता को आगे बढ़ाना ज़रूरी था जो इन वोटों को बीजेपी के पाले में लाने में मदद करें. चूंकि सम्राट चौधरी को बीजेपी ने नेता प्रतिपक्ष, अध्यक्ष, डिप्टी सीएम आदि बनाकर बहुत इनवेस्ट किया था इसलिए सम्राट बीजेपी के लिए ज़रूरी थे."

दरअसल, बीते कई सालों से बीजेपी राजद के कोर वोटर 'एमवाई' में से 'वाई' को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है. वाई यानी यादव जो कुल आबादी का 14 फ़ीसदी हैं.

अरविंद शर्मा कहते हैं, "बीजेपी समझ चुकी है कि यादव उसे वोट नहीं करेंगे. पार्टी ने इसके लिए भूपेंद्र यादव, नित्यानंद राय, रामकृपाल यादव जैसे नेताओं को आगे लाकर ये करने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक वो सफल नहीं हुई है. ऐसे में पार्टी दूसरी जातियों पर इनवेस्ट कर रही है. चूंकि अति पिछड़ों में बीजेपी के कोई नेता सम्राट चौधरी के कद का तैयार नहीं हो पाया है, इसलिए पार्टी के पास सम्राट चौधरी ही ऑप्शन के तौर पर बचते थे."

1990 से 2005 तक लालू राबड़ी शासन जिसका सम्राट चौधरी कभी ख़ुद भी हिस्सा रहे, उसने भी बीजेपी को ये फ़ैसला लेने के लिए प्रेरित किया.

फैजान अहमद कहते हैं कि लालू सरकार में यादव डॉमिनेंटिंग थे. लेकिन नीतीश ने गैर यादव के साथ अति पिछड़ों को जोड़ा. बीजेपी इसी कास्ट कॉम्बिनेशन को अपने साथ लाना चाहती है. इसलिए सम्राट को सीएम बनाया गया.

सम्राट और नीतीश – कभी पास तो कभी दूर

पीएम मोदी, नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी

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साल 2013 में सम्राट आरजेडी से विधायक थे. इसी साल नीतीश कुमार की नरेंद्र मोदी के उभार को लेकर असहजता बढ़ रही थी.

साल 2010 में एनडीए गठबंधन को बंपर जीत मिली थी. इस गठबंधन ने 206 सीटें जीती थी जिसमें अकेले जेडीयू ने 115 सीटें जीती थी. नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया. उस वक़्त जेडीयू को कांग्रेस के चार, सीपीआई के एक और चार निर्दलीय विधायकों का साथ मिला था. तब सम्राट चौधरी आरजेडी के 13 विधायकों को तोड़कर उन्हें जेडीयू के पाले में ले आए थे.

आरजेडी की इस टूट के बाद सम्राट चौधरी नीतीश के करीब आए. लेकिन बाद में बीजेपी ज्वाइन करने के बाद सम्राट चौधरी ने नीतीश को कुर्सी से हटाने के लिए मुरेठा बांधने वाला बयान दिया.

बाद के दिनों में जब सम्राट चौधरी एनडीए सरकार में उप मुख्यमंत्री बने तो वो नीतीश की परछाई सरीखे हो गए.

आलम ये था कि विधानसभा में जब सम्राट चौधरी ने वित्त मंत्री रहते हुए बजट भाषण पढ़ा तो ख़ुद सीएम ने खड़े होकर उनके कंधे दबाकर शाबाशी दी.

अरविंद शर्मा कहते हैं, "लव कुश समीकरण के प्रति नीतीश कुमार का प्रेम किसी से छिपा हुआ नहीं है. उन्होनें उपेन्द्र कुशवाहा को भी आगे बढ़ाने की कोशिश की तो उमेश कुशवाहा जो विधायक भी नहीं थे, उनको पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया. ये सिर्फ़ इसलिए हुआ क्योंकि उनके नाम के पीछे कुशवाहा था. नीतीश चाहते थे इसी समीकरण से कोई नेता सीएम बने."

फैजान अहमद कहते हैं, "यहां नीतीश की भूमिका बहुत अहम है क्योंकि जब बहुत सारे नाम मीडिया में तैरने लगे थे तो नीतीश ने अपनी नाराजगी बीजेपी के सामने जाहिर कर दी थी. नीतीश समृद्धि यात्रा में भी सम्राट चौधरी को सीएम बनाने की इच्छा जाहिर कर चुके थे."

नरेंद्र मोदी और अमित शाह क्या चाहते थे?

नितिन नबीन के साथ सम्राट चौधरी

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बिहार की राजनीति को क़रीब से देखने वालों में से एक बड़ा तबका मानता है कि नीतीश की इच्छा से ही सम्राट चौधरी को सीएम बनाया गया. लेकिन सम्राट के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की कितनी सहमति थी.

बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक, सम्राट चौधरी के नाम पर मुहर लगवाने में अहम भूमिका जेडीयू नेता और केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ़ ललन सिंह ने निभाई. वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले और उन्हें ये समझाया कि बीजेपी ने एक कुशवाहा नेता पर बीते कुछ सालों में सबसे ज्यादा निवेश किया है. ऐसे में अगर सम्राट चौधरी को सीएम नहीं बनाया गया तो लव – कुश (कुर्मी- कोइरी/कुशवाहा) में गलत मैसेज जाएगा.

फैजान अहमद नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रजामंदी पर कहते हैं, " सम्राट चौधरी प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की सहमति से ही बने हैं. बिना उनकी मर्ज़ी के सम्राट सीएम नहीं बन सकते थे. इन दोनों नेताओं की चाहत नहीं होती तो नीतीश के कहने पर भी सम्राट को सीएम नहीं बनाया जाता. चूंकि सम्राट दोनों शीर्ष नेताओं की सहमति से सीएम बन रहे हैं तो उन्हें बहुत दिन तक बीजेपी के अंदर चल रही अंदरूनी खींचतान को नहीं झेलना होगा. वो धीरे-धीरे सेटल हो जाएगी."

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेन्द्र नीतीश कुमार के सम्राट को मुख्यमंत्री बनाने की चाहत को ख़ारिज करते हैं.

वो कहते हैं, "नीतीश कुमार चाहते थे ये मिथ है. सम्राट गृह मंत्री थे और साथ में चल रहे थे. सम्राट तो नीतीश कुमार को बहुत अपमानित कर चुके हैं. बीजेपी को कोई परवाह नहीं होगा कि नीतीश कुमार किसको चाहते है. सम्राट को सीएम बनाने बीजेपी का अपना फ़ैसला है."

वो आगे कहते हैं, " अभी बीजेपी को फिलहाल असम की तरह बिहार में पॉलिटिक्स नहीं करनी है. वो सत्ता का स्मूथ हस्तांतरण चाहती थी क्योंकि अभी वो अपने बलबूते सरकार नहीं बना सकती. बीजेपी ने दिखा दिया है कि बिना आरएसएस बैकग्रांउड वाले नेता हिमंत बिस्वा सरमा को भी मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. बिहार में भी उन्होनें यही किया है."

साल 2005 से बिहार में सीएम पोस्ट पर काबिज़ रही पार्टी जेडीयू का भविष्य क्या होगा?

इस सवाल पर फैजान अहमद कहते हैं, " जेडीयू तभी टूटेगी, जब बीजेपी चाहेगी. ये काम बीजेपी कर सकती है कोई दूसरा दल ये काम नहीं कर सकता है."

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश युग का अंत हो गया है.

सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने चयन के बाद कहा, "वो नीतीश जैसा ही काम करेंगे."

जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी बार-बार दोहरा रहे हैं कि नीतीश कुमार सिर्फ़ संसद सत्र के दौरान ही दिल्ली में रहेंगें और बाकी का वक़्त बिहार में सरकार का मार्गदर्शन करेंगे.

भविष्य में बिहार की राजनीति में देखना दिलचस्प होगा कि समाजवादी नीतीश, बीजेपी की वैचारिक ज़मीन और सरकार के कामकाज में अपना कितना दखल रख पाते हैं?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.