अर्दोआन पाकिस्तान के साथ जो लंबे समय से करना चाहते हैं वो भारत और तुर्की के बीच पहले से है

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तुर्की और पाकिस्तान की ख़्वाहिश है कि द्विपक्षीय व्यापार को कम से कम पाँच अरब डॉलर तक लाया जाए.
अभी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार किसी तरह से एक अरब डॉलर पार हो पाया है. इसमें भी पाकिस्तान आयात ज़्यादा करता है.
शुक्रवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ जब इस्तांबुल में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन से मिले तो संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार पाँच अरब डॉलर तक ले जाना चाहते हैं.
अर्दोआन ने भी यही बात कही. लेकिन ये बात लंबे समय से कही जा रही है.
तुर्की और पाकिस्तान का द्विपक्षीय व्यापार ख़राब इस अर्थ में नहीं है कि वह गिर रहा है, बल्कि यह छोटा, सीमित और अस्थिर है.
भाईचारे के रिश्तों और रणनीतिक साझेदारी जैसी राजनीतिक बयानबाज़ी की तुलना में काफ़ी कम है.
तुर्की की तरफ़ से कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान को राजनीतिक समर्थन मिला, लेकिन इससे व्यापार नहीं बढ़ा.
हाल के वर्षों में कश्मीर और बहुपक्षीय मंचों पर पाकिस्तान के समर्थन में तुर्की के रुख़ ने भारत के साथ तनाव पैदा किया. इसके बावजूद भारत तुर्की के लिए कहीं बड़ा संभावित आर्थिक साझेदार है.
पिछले महीने नौ जून को तुर्की में भारत के तत्कालीन राजदूत मुकेश परदेशी ने कहा था कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार फ़िलहाल सालाना लगभग 10 अरब डॉलर है, जो 2023 में 13.8 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुँचा था.
उन्होंने कहा था कि दोनों पक्ष कुल व्यापार को 20 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखते हैं.
भारत ने तुर्की को अपने शीर्ष 25 निर्यात बाज़ारों में शामिल किया है, जबकि तुर्की ने भारत को अपनी टारगेटेड डिस्टेंट कंट्रीज़ स्ट्रैटिजी के तहत 18 प्रमुख देशों में जगह दी है.
हालांकि दो देशों में व्यापार का वॉल्युम बहुत ज़्यादा है, इसका मतलब ये नहीं होता कि संबंधों में भरोसा भी ज़्यादा हो. चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 150 अरब डॉलर पार कर चुका है लेकिन रिश्तों में भरोसा दोस्त की तरह नहीं है.
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2000 में भारत और तुर्की का द्विपक्षीय व्यापार 50.5 करोड़ डॉलर का था जो 2018 में 8.7 अरब डॉलर हो गया. पूर्वी एशिया में चीन के बाद भारत तुर्की का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन गया.
2017 में अर्दोआन राष्ट्रपति के रूप में भारत आए. अर्दोआन के साथ 100 सदस्यों वाला एक बिज़नेस प्रतिनिधिमंडल था. लेकिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद तुर्की का एक भी दौरा नहीं किया है.
तुर्की का पाकिस्तान परस्त रुख़ रहा है. कहा जाता है कि इसकी शुरुआत 1950 के शुरुआती दशक या फिर शीत युद्ध के दौर में होती है.
इसी दौर में भारत-पाकिस्तान के बीच दो जंग भी हुई थी. तुर्की और भारत के बीच राजनयिक संबंध 1948 में स्थापित हुआ था. तब भारत के आज़ाद हुए मुश्किल से एक साल ही हुआ था.
इन दशकों में भारत और तुर्की के बीच क़रीबी साझेदारी विकसित नहीं हो पाई. कहा जाता है कि तुर्की और भारत के बीच तनाव दो वजहों से रहा है. पहला कश्मीर के मामले में तुर्की का पाकिस्तान परस्त रुख़ और दूसरा शीत युद्ध में तुर्की अमेरिकी खेमे में था जबकि भारत गुटनिरपेक्षता की वकालत कर रहा था.
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1949 में बना था. तुर्की इसका सदस्य था. नेटो को सोवियत यूनियन विरोधी संगठन के रूप में देखा जाता था.
इसके अलावा 1955 में तुर्की, इराक़, ब्रिटेन, पाकिस्तान और ईरान ने मिलकर 'बग़दाद पैक्ट' किया था. बग़दाद पैक्ट को तब डिफ़ेंसिव ऑर्गेनाइज़ेशन कहा गया था.
इसमें पाँचों देशों ने अपनी साझी राजनीति, सेना और आर्थिक मक़सद हासिल करने की बात कही थी. यह नेटो की तर्ज़ पर ही था.
1959 में बग़दाद पैक्ट से इराक़ बाहर हो गया था. इराक़ के बाहर होने के बाद इसका नाम सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन कर दिया गया था. बग़दाद पैक्ट को भी सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ देखा गया. दूसरी तरफ़ भारत गुटनिरपेक्षता की बात करते हुए भी सोवियत यूनियन के क़रीब लगता था.

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जब शीत युद्ध कमज़ोर पड़ने लगा था तब तुर्की के 'पश्चिम परस्त' और 'उदार' राष्ट्रपति माने जाने वाले तुरगुत ओज़ाल ने भारत से संबंध पटरी पर लाने की कोशिश की थी.
1986 में ओज़ाल ने भारत का दौरा किया था. इस दौरे में ओज़ाल ने दोनों देशों के दूतावासों में सेना के प्रतिनिधियों के ऑफिस बनाने का प्रस्ताव रखा था. इसके बाद 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तुर्की का दौरा किया था. राजीव गांधी के दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्ते कई मोर्चे पर सुधरे थे.
लेकिन इसके बावजूद कश्मीर के मामले में तुर्की का रुख़ पाकिस्तान के पक्ष में ही रहा इसलिए रिश्ते में नज़दीकी नहीं आई.
1991 में इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी और इस बैठक में तुर्की के विदेश मंत्री ने कश्मीर को लेकर भारत की आलोचना की थी.
2003 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तुर्की का दौरा किया था. इस दौरे में दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच संपर्क बनाए रखने को लेकर सहमति बनी थी.
द मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के अनुसार, ''बुलांत एजेवेत एकमात्र टर्किश प्रधानमंत्री थे जिन्हें 'भारत-समर्थक' प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के तख़्तापलट को मंज़ूरी नहीं दी थी. एजेवेत ने अप्रैल 2000 में भारत का दौरा किया था. पिछले 14 सालों में किसी टर्किश राष्ट्रपति का यह पहला दौरा था. एजेवेत ने पाकिस्तान के दौरे का निमंत्रण अस्वीकार कर दिया था.''
''सबसे अहम यह है कि एजेवेत ने कश्मीर पर तुर्की के पारंपरिक रुख़ को संशोधित किया था. तुर्की का कश्मीर पर रुख़ रहा है कि इसका समाधान संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में होना चाहिए. लेकिन एजेवेत ने इसका द्विपक्षीय समाधान तलाशने की वकालत की थी. तुर्की के इस रुख़ के कारण भारत से संबंधों को बल मिला था.''
शहबाज़ शरीफ़ ने तुर्की की तारीफ़ में क्या कहा

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ईरान के सर्वोच्च नेता रहे आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को श्रद्धांजलि देने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ तुर्की पहुँचे थे.
पाकिस्तान के पीएम ईरान के पड़ोसी देश तुर्की के सबसे अहम शहर इंस्ताबुल पहुंचे और राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.
नेटो के सदस्य और ईरान के पड़ोसी देश तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने ईरान और अमेरिका के बीच समझौते में पाकिस्तान की भूमिका की तारीफ़ है.
वहीं शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में आत्मनिर्णय के मुद्दे को समर्थन देने के लिए वो पाकिस्तान की ओर से अर्दोआन की सराहना करते हैं. हालांकि अर्दोआन ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर बोलने से परहेज किया.
ईरान और अमेरिका के बीच हाल में हुए अंतरिम समझौते में पाकिस्तान और क़तर की अहम भूमिका रही है.
पाकिस्तान मध्य पूर्व में अपने असर का विस्तार करना चाहता है. वहीं तुर्की भी इस समझौते से अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा रहा है और खुद को मध्यपूर्व के एक अहम खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.
इंस्ताबुल में संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान तुर्की की तारीफ़ करते हुए शहबाज़ शरीफ़ ने कहा, ''मुश्किल समय में तुर्की हमेशा पाकिस्तान के साथ मज़बूती से खड़ा रहा है.वहीं पाकिस्तान ने भी अपनी क्षमता के मुताबिक़ हर मुश्किल घड़ी में तुर्की का साथ दिया है.''
''दोनों देशों ने एकजुटता और भाईचारा दोनों देशों ने पूरे दिल से निभाया है.जब भी पाकिस्तान किसी संकट में घिरा, चाहे वह युद्ध हो, विनाशकारी भूकंप हो या भीषण बाढ़, तु्र्की के लोगों ने हमेशा मजबूती से पाकिस्तान का साथ दिया."
उन्होंने कहा, ''तुर्की की सफलता, पाकिस्तान की सफलता है. पाकिस्तान की तरक़्क़ी, तुर्की की तरक़्क़ी है. हमारी भाषाएं अलग हैं और हम अलग-अलग देशों में रहते हैं. लेकिन पाकिस्तान और तुर्की के लोगों को राह दिखाने वाली रोशनी एक ही है."
शहबाज़ शरीफ़ ने कहा, ''पाकिस्तान,तुर्की के साथ उत्तरी साइप्रस के तुर्की रिपब्लिक के मुद्दे पर पहले की तरह आगे भी मजबूती से खड़ा रहेगा. मैं एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के लोगों और उनके आत्मनिर्णय के वैध अधिकार के समर्थन में तुर्की के सैद्धांतिक और अटल रुख के लिए पाकिस्तान की ओर से गहरी सराहना व्यक्त करता हूं.''
2020 में पाकिस्तान दौरे पर पहंचे अर्दोआन ने पाकिस्तानी संसद में संबोधन के दौरान अर्दोआन ने कहा था कि कश्मीर जितना अहम पाकिस्तान के लिए है,उतना ही तुर्की के लिए भी है.
तुर्की के राष्ट्रपति ने कश्मीर और अन्य मुद्दों पर पाकिस्तान का समर्थन जारी रखने की बात कही थी. भारत ने उनकी इस टिप्पणी पर नाराजगी जताई थी.
अर्दोआन ने क्या कहा

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अर्दोआन ने ईरान-अमेरिका समझौते में पाकिस्तान की भूमिका की तारीफ़ करते हुए कहा कि 'इस्लामाबाद समझौते' से जो शांति और स्थिरता का माहौल बना है,उससे पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है.
उन्होंने कहा, '' हमने हमेशा ऐसे हर क़दम का समर्थन किया है और आगे भी करते रहेंगे, जो हमारे क्षेत्र में तनाव कम करने और बातचीत के ज़रिये समस्याओं का समाधान निकालने में मदद करे. हम इसराइली सरकार की उन कोशिशों पर कड़ी नज़र रखे हुए हैं, जिनका मकसद इस समझौते को पटरी से उतारना है.
''मौजूदा इसराइली सरकार,जो लगातार युद्ध का रास्ता अपना रही है,उसे हमारे क्षेत्र को एक बार फिर बारूद और खून की गंध में डुबोने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए.''
उन्होंने पाकिस्तान के साथ अपने क़ारोबारी रिश्तों और पुख्ता करने की ख़्वाहिश का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देश आपसी क़ारोबार को पांच अरब डॉलर तक ले जाएंगे.
उन्होंने कहा, ''हम एनर्जी, ट्रांसपोर्ट, क्रिटिकल मिनरल्स और आईटी सेक्टरों में पाकिस्तान के साथ सहयोग और मजबूत करना चाहते हैं.''
अर्दोआन ने दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को ख़ास ज़िक्र किया और कहा कि ये दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को एक मजबूत आधार है. नई परियोजनाओं के ज़रिये और मजबूत हो रहा है. ये परियोजनाएं पाकिस्तान की ताकत बढ़ाने में मददगार साबित होंगी.
पाकिस्तान तुर्की के ड्रोन में काफी दिलचस्पी ले रहा है. वहीं तुर्की की कंपनी बेयकार ने कहा है कि वो भारत को ड्रोन सप्लाई नहीं करेगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.























