एयर इंडिया: प्लेन के अचानक 300 फीट नीचे आने का मामला, जानिए पायलट के नशे में होने की जाँच की प्रक्रिया और अहम जवाब

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एयर इंडिया के एक विमान के पिछले हफ़्ते उड़ान के दौरान अचानक क़रीब 300 फीट नीचे आने के बाद पायलट की जांच चल रही है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विमान के पायलट की दूसरी ड्रग जांच पॉजिटिव आई है. यह फ्लाइट थाईलैंड के फुकेट से दिल्ली आ रही थी.

नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने कहा कि मामले की जांच का काम एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (एएआईबी) कर रहा है और फ़ाइनल रिपोर्ट आने पर ही वो कुछ निश्चित तौर पर कहेंगे.

राम मोहन नायडू ने ये भी कहा कि अगर ये मामला ड्रग्स के इस्तेमाल से जुड़ा है और पाया जाता है कि मौजूदा नियमों से छेड़छाड़ की गई है तो हम कड़े क़दम उठाएंगे.

एएआईबी घटना में सभी प्रासंगिक तकनीकी, परिचालन, मेडिकल और इंसानी वजहों से जुड़े सबूतों की जांच कर रहा है.

वहीं मंगलवार को भारत के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयर इंडिया के निवर्तमान सीईओ कैंपबेल विल्सन को फ़ुकेट-दिल्ली फ्लाइट से जुड़ी घटना के संबंध में तलब किया था.

चार अगस्त को हुई इस घटना में 20 यात्री और चालक दल के चार सदस्य घायल हुए थे.

एयरबस ए320 विमान में 137 यात्री और आठ क्रू मेंबर सवार थे.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ भारत सरकार ने रविवार को बताया था कि एआई 2379 के पायलट-इन-कमांड की दोबारा ड्रग जांच कराई जाएगी. पायलट की पहली जांच में नतीजा नॉन-नेगेटिव आया था. यह एक शुरुआती रैपिड टेस्ट होता है और इसके नतीजे को अंतिम नहीं माना जाता.

ऐसी गंभीर घटनाओं की जांच के दौरान साइकोएक्टिव पदार्थों के इस्तेमाल की जांच करना ज़रूरी प्रक्रिया है.

पहली जांच में नॉन-नेगेटिव नतीजा आने पर पुष्टि के लिए दूसरी जांच की जाती है. अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि दूसरी जांच में पायलट का नतीजा पॉजिटिव आया है.

ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर यह जानकारी दी क्योंकि जांच के नतीजे गोपनीय हैं. एयर इंडिया के प्रवक्ता ने पायलट की ड्रग जांच के नतीजे पर टिप्पणी करने से इनकार किया है. एएआईबी की जांच में फ़्रांस की विमान दुर्घटना जांच एजेंसी और फ़्रांस स्थित एयरबस के तकनीकी विशेषज्ञ भी मदद कर रहे हैं.''

पिछले साल एयर इंडिया के बोइंग 787 ड्रीमलाइनर के भयावह हादसे और सुरक्षा से जुड़ी कई घटनाओं के बाद भारत में तेज़ी से बढ़ते विमानन क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं.

यह घटना टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया के लिए एक और चुनौती है.

31 मार्च को ख़त्म हुए वित्त वर्ष में एयरलाइन को क़रीब 2.3 अरब डॉलर का रिकॉर्ड घाटा हुआ था. यह घटना एयरलाइन के नए सीईओ तेवोल्डे गेब्रेमरियम के सामने मौजूद चुनौतियों को भी रेखांकित करती है.

1. ड्रग टेस्ट पॉजिटिव आने पर क्या होता है?

भारत के विमानन नियामक के नियमों के अनुसार, पहली बार ड्रग टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने वाले कर्मचारी को नशा मुक्ति के लिए भेजा जाता है.

डीजीसीए ड्रग टेस्ट कराने से इनकार करने को भी पॉजिटिव टेस्ट जितना गंभीर मानता है. पहली बार टेस्ट से इनकार करने पर कर्मचारी को ड्यूटी से हटा दिया जाता है और उसे 48 घंटे के भीतर ड्रग टेस्ट क्लियर करना होता है.

ऐसा नहीं करने पर लाइसेंस एक साल के लिए निलंबित कर दिया जाता है और सक्रिय ड्यूटी पर लौटने से पहले नशा मुक्ति कार्यक्रम पूरा करना होता है.

सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील पद पर लौटने के लिए कर्मचारी को दोबारा जांच करानी होती है और उसमें नेगेटिव आना ज़रूरी है. दूसरी बार पॉजिटिव पाए जाने पर लाइसेंस तीन साल के लिए निलंबित किया जाता है, जबकि तीसरी बार पॉजिटिव आने पर लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिया जाता है.

2. नागरिक उड्डयन मंत्री ने क्या कहा?

नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने मंगलवार को कहा कि सरकार एयर इंडिया की फुकेट-दिल्ली उड़ान की घटना पर क़रीबी नज़र रख रही है और आगे की कार्रवाई पर फ़ैसला लेने से पहले एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो की जांच के निष्कर्षों का इंतज़ार करेगी.

नायडू ने पत्रकारों से कहा कि मंत्रालय ने एयर इंडिया के निवर्तमान सीईओ कैंपबेल विल्सन के साथ शुरुआती बैठक की थी, ताकि यह समझा जा सके कि एयरलाइन ने घटना से किस तरह निपटा और सुरक्षा प्रोटोकॉल में कोई कमी तो नहीं रही, ख़ासकर पायलटों के नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़े नियमों में.

मंत्री ने कहा कि सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और एयरलाइनों, नियामकों या किसी भी अन्य संबंधित पक्ष की ओर से इसमें कोई समझौता नहीं किया जा सकता.

उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने पायलटों के नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़े डीजीसीए के नियमों पर भी अपडेट मांगा है और अगर मौजूदा नियम नाकाफ़ी पाए जाते हैं तो उनमें बदलाव पर विचार किया जाएगा.

3. नियम क्या हैं?

डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन की विमानन कर्मियों में नशीले पदार्थों के सेवन की जांच से जुड़ी गाइडलाइन सिविल एविएशन रिक्रूटमेंट (सीएआर) सितंबर 2021 में जारी की गई थी और 31 जनवरी 2022 से लागू हुई.

इन नियमों का मुख्य फोकस पायलटों और एयर ट्रैफिक कंट्रोलरों पर है, लेकिन ये सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील काम करने वाले अन्य विमानन कर्मियों पर भी लागू होते हैं. इनमें एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर और सर्टिफाइंग स्टाफ, ट्रेनी पायलट और ट्रेनर शामिल हैं.

फ्लाइट क्रू और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर ही ऐसे कर्मचारी हैं, जिनकी सालाना 10% रैंडम ड्रग जांच अनिवार्य है.

अन्य कैटिगरी के कर्मचारियों की जांच नियुक्ति के समय या कुछ विशेष घटनाओं के बाद की जाती है. नियमित रैंडम जांच के अलावा, सुरक्षा से जुड़ी किसी घटना के बाद भी आमतौर पर यह जांच की जाती है, जैसा कि चार अगस्त की एयर इंडिया की फुकेट-दिल्ली उड़ान के मामले में हुआ.

4. जांच कैसे होती है?

डीजीसीए के नियमों के अनुसार, कर्मचारियों के यूरिन सैंपल में छह तरह के साइकोएक्टिव पदार्थों की मौजूदगी की जांच की जाती है. इनमें एम्फेटामाइन जैसे उत्तेजक पदार्थ, ओपिएट्स और उनके मेटाबोलाइट्स, टेट्राहाइड्रोकैनाबिनोल (कैनाबिस), कोकीन, बार्बिट्यूरेट्स और बेंजोडायजेपाइन हैं.

जिस पायलट या अन्य कर्मचारी की जांच की जानी है, उसके यूरिन सैंपल को दो हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग कंटेनरों में सुरक्षित रखा जाता है. जांच की शुरुआत पहले कंटेनर के सैंपल से तत्काल किए जाने वाले स्क्रीनिंग टेस्ट से होती है.

अगर शुरुआती जांच का नतीजा 'नॉन-नेगेटिव' आता है, यानी उसमें साइकोएक्टिव पदार्थों की मौजूदगी के संकेत मिलते हैं, तो पुष्टि के लिए होने वाली जांच का नतीजा आने तक पायलट को तुरंत ड्यूटी से हटा दिया जाता है.

दूसरे कंटेनर में रखे सैंपल को पुष्टि के लिए लैब में भेजा जाता है, जहां अत्याधुनिक जांच उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें गैस क्रोमैटोग्राफी/मास स्पेक्ट्रोमेट्री या लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री के जरिए जांच की जाती है.

सीएआर में कहा गया है, "अगर सैंपल ए नॉन-नेगेटिव आता है, तो सैंपल बी को सैंपल लेने वाले व्यक्ति, कर्मचारी (डोनर) और संबंधित संगठन के मेडिकल स्टाफ के हस्ताक्षर के साथ पुष्टि जांच के लिए लैब भेजा जाएगा."

5. पायलटों को क्या सलाह दी जाती है?

अगर जांच में नतीजा पॉजिटिव आता है, जैसा कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मौजूदा मामले में हुआ है तो संबंधित संगठन के मेडिकल प्रभारी को एक मेडिकल रिव्यू ऑफिसर से सलाह लेनी होती है.

इसका मक़सद यह पता लगाना होता है कि पॉजिटिव नतीजा किसी लीगल मेडिकल ट्रीटमेंट या किसी अन्य जनरल सोर्स की वजह से तो नहीं आया, न कि नशीले पदार्थों के दुरुपयोग के कारण. मिसाल के तौर पर, कोडीन वाली पेन किलर लेने से ओपिएट्स के लिए टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है.

पायलटों के संगठन एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की ओर से जारी एक एडवाइजरी के मुताबिक़, पायलटों को ख़ुद से दवाएं नहीं लेनी चाहिए. भारत में मेडिकल स्टोर पर मिलने वाली सर्दी-जुकाम, खांसी, एलर्जी और नींद की दवाओं में उन छह श्रेणियों में शामिल पदार्थ हो सकते हैं, जिनकी जांच की जाती है.

एएलपीए इंडिया ने पायलटों से यह भी कहा है कि कोई नई दवा शुरू करने से पहले वे अपने संगठन के मेडिकल प्रभारी से सलाह लें, अपनी सभी दवाओं की सही जानकारी दें और प्रिस्क्रिप्शन तथा दवाओं की खरीद की रसीदें संभालकर रखें, ताकि जांच के बाद MRO द्वारा समीक्षा की जरूरत पड़ने पर उन्हें पेश किया जा सके.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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