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'हम साफ़ पानी मांग रहे थे, हम पर एफ़आईआर हो गई': हरियाणा के इस गांव में डेढ़ महीने से धरने पर हैं लोग
- Author, मृदुलिका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हांसी से लौटकर
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
"कोई इस पानी को देख ले, तो बिदक जाए, लेकिन हमारे छोटे-छोटे बच्चे भी यही पानी पीने को मजबूर हैं. जिस पर बीतती है, वही दर्द समझता है."
हरियाणा के हांसी ज़िले के चनौत गांव की नवीन देवी जब यह कहती हैं, तो उनकी आवाज़ में ग़ुस्सा नहीं, बल्कि लंबे इंतज़ार से उपजी थकान है.
इस गांव के लोग लंबे समय से पीने के पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायत कर रहे हैं. उनका कहना है कि नल का पानी पीने लायक नहीं है.
कई परिवार अब बाज़ार से पानी ख़रीदने या टैंकरों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं. वहीं आर्थिक तौर पर कमज़ोर परिवार वही पानी पी रहे हैं.
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने कई बार स्थानीय प्रशासन और जन प्रतिनिधियों से बात की, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो सका. लगातार शिकायतों के बावजूद जब हालात नहीं बदले, तो 16 मई से गांव के लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया.
उनकी मांग है कि हांसी शहर के लिए बिछाई जा रही 36 इंच की भाखड़ा पाइपलाइन से चनौत गांव को एक 'टी-कनेक्शन' दिया जाए. टी-कनेक्शन यानी मुख्य पाइपलाइन से एक अतिरिक्त जोड़, जिसके ज़रिए उसी लाइन से दूसरे इलाके़ तक पानी पहुंचाया जा सकता है.
केंद्र सरकार की अमृत 2.0 योजना के तहत राजली स्थित भाखड़ा नहर से हांसी शहर तक लगभग 27 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जा रही है. यह चनौत गांव के पास से गुज़रती है.
ग्रामीणों का कहना है कि अगर इसी लाइन से उनके गांव को जोड़ दिया जाए तो उनकी समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है. ग्रामीणों का कहना है कि बड़ी पाइपलाइन होने से उसकी देखरेख बेहतर होगी और रास्ते में अवैध कनेक्शन होने की आशंका भी कम रहेगी.
प्रशासन ग्रामीणों की मांग क्यों नहीं मान रहा?
स्थानीय प्रशासन का कहना है कि यह पाइपलाइन अमृत 2.0 योजना के तहत शहर को पानी उपलब्ध कराने के लिए बनाई जा रही है. ऐसे में इससे सीधे किसी गांव को जोड़ना योजना के नियमों के मुताबिक नहीं है.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में हांसी के एसडीएम डॉ. राजेश खोथ कहते हैं, "अमृत स्कीम के तहत राजली हेड से हांसी शहर तक लगभग 27 किलोमीटर लंबी और 1 मीटर व्यास की पाइपलाइन बिछाई जा रही है. इसका मकसद शहरों में पानी की कमी को दूर करना है. चनौत गांव के लोगों ने इसी लाइन से पानी देने की मांग की है. लेकिन अमृत स्कीम 2.0 में ये कानूनी तौर पर संभव नहीं. अगर ऐसा करने की ज़रूरत ही पड़ जाए तो तय प्रक्रिया से जाना होगा. इसके अलावा इतनी मोटी पाइप को सीधे पंक्चर करना भी सही नहीं."
उनका कहना है कि फिलहाल चनौत गांव को रोज़ाना लगभग पांच लाख लीटर पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है. साथ ही गांव के लिए लगभग चार किलोमीटर लंबी अलग पाइपलाइन पर भी काम शुरू हो चुका है. मौजूदा बंदोबस्त को बेहतर बनाने के लिए लगभग 7.5 करोड़ रुपये के नए प्रोजेक्ट को भी मंज़ूरी मिल चुकी.
हालांकि, दोनों पक्षों के दावों के बीच एक सवाल अब भी बना हुआ है. अगर प्रशासन के मुताबिक गांव को साफ़ पानी मिल रहा है, तो ग्रामीण लगातार इसकी गुणवत्ता और उपलब्धता पर सवाल क्यों उठा रहे हैं?
बीबीसी स्वतंत्र रूप से यह पुष्टि नहीं कर सका कि गांव में पहुंच रहे पानी की क्वालिटी तय मानकों के अनुरूप है या नहीं. इस बारे में हमने पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर संजीव त्यागी से भी फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका.
प्रशासनिक अधिकारी ज़ोर देते हैं कि गांव में पानी की बिल्कुल भी कमी नहीं है, हालांकि गांव की सीमा पर पहुंचते ही अलग तस्वीर दिखाई देती है. धरना स्थल पर पुरुष और महिलाएं टेंट के नीचे बैठे थे. पास ही कुछ बोतलों में पानी रखा था, जिसकी तली में तलछट साफ़ दिखाई दे रही थी. इसी को लेकर चनौत के लोग पिछले डेढ़ महीने से भी ज़्यादा समय से धरने पर बैठे हैं.
बरसों पुरानी है पानी की समस्या
बीबीसी जब प्रदर्शन स्थल पर पहुंचा तो तेज़ धूप के बावजूद सैकड़ों लोग मौजूद थे.
वहां बैठीं नवीन देवी कहती हैं, "एक तो यहां कई-कई दिनों तक पानी नहीं आता, और जब आता भी है तो उसका रंग काला होता है. उसका इस्तेमाल हम कपड़े धोने और सफाई जैसे कामों में करते हैं. पीने या खाना बनाने के लिए नहीं करते. लेकिन कई बार मजबूरी में हमें अपने बच्चों को भी यही पानी पिलाना पड़ जाता है."
वह कहती हैं, "गांव में पीने के पानी के लिए टैंकर मंगवाना पड़ता है. पांच-सात परिवार मिलकर टैंकर बुलाते हैं. कुछ लोग पास के खरखड़ी गांव की नहर से पानी लेकर आते हैं. जिनके पास पैसे होते हैं, वे बाज़ार से पानी की बोतल ख़रीद लेते हैं. सुबह-सुबह गांव के बच्चे और बड़े सिर्फ़ पीने का पानी जुटाने में लगे रहते हैं. इसमें कई घंटे खप जाते हैं. यह स्थिति कई सालों से बनी हुई है."
नवीन देवी कहती हैं, "जब टी-कनेक्शन लगा था तो पूरे गांव में ख़ुशी थी. लोगों को लगा कि अब पीने के पानी के लिए रोज़ की भागदौड़ ख़त्म हो जाएगी. लेकिन अगले ही दिन उसे हटा दिया गया."
ग्रामीणों के मुताबिक़, क़रीब सात हज़ार की आबादी वाले चनौत गांव में फ़िलहाल जो पीने का पानी पहुंच रहा है, वह तीन गांवों में साझा होता है. उनका कहना है कि पानी खरखड़ी गांव के पास बालसमंद नहर से चनौत तक पहुंचता है और गांव में हर पांच दिन में एक बार पानी की सप्लाई होती है.
गांव के पूर्व सरपंच सत्यवान कहते हैं, "सरकार कह रही है कि हमें अलग पाइपलाइन दे देगी. लेकिन हमारी दिक्कत यही है कि अलग लाइन में फिर वही पुरानी दिक्कतें होंगी. रास्ते में अवैध कनेक्शन हो जाते हैं, पानी की चोरी होती है और दबाव कम हो जाता है. अगर हमें मेन पाइपलाइन से जोड़ दिया जाए तो यह मुश्किल नहीं रहेगी."
आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं दूसरे गांव
इस आंदोलन को अब आसपास के गांवों का भी समर्थन मिलने लगा है.
सर्वजातीय रोघी खाप के प्रधान सुमेर सिंह जागलान कहते हैं, "पानी की समस्या सिर्फ चनौत गांव की नहीं है. हमारे साथ रोघी खाप के 24 गांव खड़े हैं. हम इसे राजनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि साफ़ पीने के पानी का सवाल मानते हैं."
उनका कहना है कि सरकार अलग पाइपलाइन की बात कर रही है, लेकिन उनका मानना है कि मुख्य पाइपलाइन से टी-कनेक्शन ही गांव की समस्या का स्थायी समाधान है.
इसी बीच प्रदर्शन तेज़ होता गया. जून के दूसरे पखवाड़े तक धरना एक महीने से ज़्यादा लंबा हो चुका था और गांव के कुछ लोग आमरण अनशन पर बैठ गए.
प्रदर्शन में शामिल विशाखा चौधरी का दावा है कि इसी दौरान एक व्यक्ति गांव पहुंचा, जिसने ख़ुद को सरकार की ओर से बातचीत के लिए आया कथित प्रतिनिधि बताया. विशाखा के मुताबिक, उसने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया कि मुख्य पाइपलाइन पर टी-कनेक्शन लगाने का काम शुरू कर दिया जाएगा, जबकि बाकी कानूनी प्रक्रिया बाद में पूरी की जाएगी.
विशाखा कहती हैं, "गांव के लोगों ने उसकी बात पर भरोसा किया. इसके कुछ ही वक्त बाद टी-कनेक्शन लगाने का काम शुरू हो गया. करीब 10 घंटे तक काम चला. इसके बाद लोगों ने अनशन खत्म कर दिया."
बीबीसी के पास टी-कनेक्शन लगाए जाने का एक वीडियो है, हालांकि, बीबीसी उसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता.
टी कनेक्शन किसकी पहल पर लगा, इस बारे में स्थानीय अधिकारियों को भी टटोला गया, लेकिन उन्होंने इस पर जांच की बात ही दोहराई.
टी-कनेक्शन के बाद क्या हुआ?
अगले ही दिन घटनाक्रम बदल गया. पाइपलाइन पर लगाए गए जोड़ को अवैध बताते हुए स्थानीय प्रशासन ने अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर कर दी.
साथ ही टी हटाने का फैसला लिया गया. ग्रामीणों के मुताबिक, प्रशासन के इस फ़ैसले के विरोध में वे जब मौके पर पहुंचे, तो पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज भी किया.
पुलिस कार्रवाई पर दोनों पक्ष क्या कहते हैं?
विशाखा चौधरी का आरोप है, "जब टी-कनेक्शन लगाया जा रहा था, तब किसी अधिकारी ने उसे नहीं रोका, जबकि ये काम घंटों चला. अगर कुछ गलत है, तो उसी समय दख़ल दिया जाना चाहिए था लेकिन तब काम होने दिया गया. अगले ही दिन उसे अवैध बताकर एफआईआर दर्ज कर दी गई. रात में पुलिस टी-कनेक्शन हटाने पहुंची. हम शांतिपूर्ण तरीके से वहां विरोध में बैठे थे, लेकिन आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठीचार्ज हुआ और हमारे ख़िलाफ़ कई धाराओं में मुक़दमे दर्ज कर दिए गए."
हालांकि, पुलिस इन आरोपों को ग़लत बता रही है. पुलिस का कहना है कि आंदोलन के दौरान क़ानून-व्यवस्था से जुड़े कई मामले सामने आए, जिनमें सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस पर पथराव के आरोप भी शामिल हैं.
बीबीसी से बातचीत में हांसी के एसपी विनोद कुमार कहते हैं, "शुरुआत तो पानी को लेकर ही हुई थी. 16 मई को लोग बस स्टैंड पर इकट्ठा हुए थे कि पानी की समस्या सुलझाई जाए. उसके बाद घटनाक्रम आगे बढ़ता गया."
"जून में रोड जाम किया गया था और बिजली के पोल भी तोड़े गए थे. उसमें लगभग 90 लाख रुपये का नुकसान हुआ था. उस समय ड्यूटी मजिस्ट्रेट की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया गया. उसके बाद एक और घटनाक्रम हुआ. कुछ लोगों ने टी लगा दी. उस मामले में भी अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज हुआ."
"इसके बाद 23 जून को सरकार ने आदेश दिया कि अवैध टी हटाई जाए. उस दौरान सिविल प्रशासन की मदद के लिए पुलिस भी मौके पर गई थी. तभी कुछ लोगों ने हम पर पत्थर मारे. हमारे एक जवान के सिर पर गंभीर चोट आई. उस मामले में भी छह नामजद और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ बीएनएस की अलग-अलग धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था."
एसपी के मुताबिक, तीन अलग-अलग एफआईआर में बीएनएस की कई धाराएं लगाई गई हैं. जो धाराएं लगी हैं, उनमें 109 भी शामिल है, यानी हत्या का प्रयास.
पानी के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों पर ऐसी गंभीर धारा क्यों लगाई गईं? इस सवाल पर एसपी कहते हैं कि "पानी की मांग तो पीछे रह गई. लोग सरकारी काम में बाधा पहुंचाने में लग गए. जो भी लोग मौके पर थे, उनके खिलाफ हमारे पास वीडियो हैं. उन्हीं के आधार पर एफ़आईआर दर्ज की गई है. जो मौके पर होगा, उसी पर कार्रवाई होगी. जो नहीं होगा, उस पर नहीं होगी. जांच चल रही है."
फिलहाल, चनौत गांव में सवाल सिर्फ पानी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि उसका हल किस रास्ते से निकलेगा. प्रशासन अलग पाइपलाइन देने की बात कर रहा है, जबकि ग्रामीण मुख्य पाइपलाइन से जुड़ने की मांग छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
एसडीएम के मुताबिक, स्थानीय अधिकारियों से लेकर जन प्रतिनिधियों तक अब तक 8 से 10 राउंड की बातचीत हो चुकी. इसके बावजूद दोनों पक्ष किसी साझा समाधान पर नहीं पहुंच सके हैं. 16 मई से शुरू हुआ आंदोलन अब भी जारी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.