झारखंड में जारी आंदोलन से राहुल गांधी क्या बैकफुट पर हैं?

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झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता का मामला किसी ख़ास पार्टी की सरकार का नहीं रहा है.
झारखंड की उम्र लगभग 26 साल होने जा रही है और इनमें 13 साल दो महीने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार रही है. इन 13 सालों में भी झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन यानी जेपीएससी की परीक्षा में भ्रष्टाचार से जुड़े कई गंभीर मामले सामने आए.
2004 में बीजेपी के अर्जुन मुंडा झारखंड के मुख्यमंत्री थे और दिलीप कुमार प्रसाद को जेपीएससी का चेयरमैन नियुक्त किया गया था.
जमशेदपुर पश्चिम से विधायक और बीजेपी के पूर्व नेता सरयू राय की पृष्ठभूमि आरएसएस की रही है. सरयू राय कहते हैं कि दिलीप कुमार प्रसाद आरएसएस के स्वयंसेवक थे और उन्हें जेपीएसी में भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाना पड़ा.
अप्रैल 2010 में शिबू सोरेन की सरकार ने दिलीप प्रसाद को निलंबित कर दिया था. इससे पहले भारत के राष्ट्रपति ने उनके ख़िलाफ़ जांच शुरू करने की मंज़ूरी दी थी. उन पर आरोप था कि उन्होंने सिविल कर्मियों और लेक्चररों की भर्ती में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को फ़ायदा पहुँचाया.
पिछले साल अप्रैल में दिलीप कुमार प्रसाद झारखंड संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा भर्ती घोटाले में 13 अभियुक्तों के साथ सीबीआई की विशेष अदालत में पेश हुए थे.
यह परीक्षा वर्ष 2005 में आयोजित की गई थी. अभियुक्तों में उस समय के जेपीएसी के कुछ अधिकारी, उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करने वाले परीक्षक, इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य और अभ्यर्थी शामिल थे. आरोप है कि इन सभी ने भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताएं करने के लिए साज़िश रची थी.
दिलीप कुमार प्रसाद रांची यूनिवर्सिटी में जूलॉजी के रीडर रह चुके थे. सितंबर 2004 में जेपीएससी के अध्यक्ष बनाए गए थे. 2008 में सिविल सेवा परीक्षा और झारखंड पात्रता परीक्षा के नतीजे जारी होने के बाद भाई-भतीजावाद के आरोप सामने आए.
आरोप था कि आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों को सिविल कर्मी, विश्वविद्यालय शिक्षक और अधिकारी नियुक्त करवाया था.

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कांग्रेस के रुख़ को लेकर सवाल
सरयू राय झारखंड में रघुवर दास की सरकार में मंत्री भी रहे हैं. राय कहते हैं कि झारखंड की हर सरकार में प्रतियोगी परीक्षाओं में भ्रष्टाचार हुए हैं और अब तक कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं बन पाई है.
राय कहते हैं, ''रांची में छात्रों का आंदोलन केवल हेमंत सोरेन को लेकर नहीं है. नाराज़गी भ्रष्ट व्यवस्था को लेकर है. हेमंत तात्कालिक कारण ज़रूर हैं. मुझे नहीं लगता है कि इस मामले में बीजेपी हाई मोरल ग्राउंड ले सकती है.''
रांची में जारी आंदोलन को बीजेपी जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की काट के रूप में पेश कर रही है और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को कटघरे में खड़ी कर रही है.
झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार में कांग्रेस भी शामिल है. 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा को 81 सदस्यों वाली विधानसभा में 34 सीटें मिली थी और कांग्रेस को 16 सीटें. यानी हेमंत सोरेन की सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही है.ऐसे में बीजेपी कांग्रेस को घेर रही है पूछ रही है कि झारखंड के मामले में राहुल गांधी चुप क्यों हैं?
हालांकि राहुल गांधी ने झारखंड की सरकार से कहा है कि वो छात्रों की मांगों को सुने और समाधान निकाले.
राहुल गांधी ने सोमवार को एक्स पर लिखा, ''झारखंड में विरोध-प्रदर्शन कर रहे छात्रों के ख़िलाफ़ बल का इस्तेमाल ग़लत है. छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है और बातचीत से ही समाधान निकल सकता है. झारखंड सरकार को इन छात्रों की बात सुननी चाहिए और हर समस्या का तुरंत समाधान करना चाहिए.''
क्या झारखंड में छात्रों के आंदोलन से राहुल गांधी वाक़ई बैकफुट पर आ गए हैं? रांची यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर कंजीव लोचन को नहीं लगता है कि राहुल बैकफुट पर हैं.
प्रोफ़ेसर लोचन कहते हैं, ''दिल्ली में जंतर मंतर पर भी राहुल नहीं गए थे. राहुल पीएम आवास के बाहर धरने पर बैठ गए थे. जंतर मंतर पर तो पता था कि सीजेपी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है. रांची में तो पता ही नहीं है कि इसका नेता कौन और जो आंदोलन कर रहे हैं, वे किस संगठन से जुड़े हैं. ऐसे में राहुल इस प्रदर्शन में शामिल होने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं.''
प्रोफ़ेसर लोचन कहते हैं, ''राहुल ने छात्रों का समर्थन किया है. उनकी मांगों का समर्थन किया है. मुख्यमंत्री से बल प्रयोग नहीं करने की अपील की है. क्या बीजेपी के नेता जंतर मंतर पर आंदोलन में ऐसा कर रहे थे?''

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आंदोलन किसके हक़ में?
बीजेपी की मांग है कि कांग्रेस हेमंत सोरेन सरकार से समर्थन वापस ले. रांची यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर रिज़वान अली कहते हैं कि कांग्रेस ऐसा क्यों करेगी? प्रोफ़ेसर रिज़वान अली कहते हैं, ''ये वैसा ही है कि नीट मामले में कांग्रेस चंद्रबाबू नायडू से कहे कि वो समर्थन वापस ले लें. बीजेपी झारखंड में मुख्य विपक्षी पार्टी है और वह आंदोलन का फ़ायदा लेना चाह रही है. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. जो भी पार्टी विपक्ष में होती है, वो सरकार के ख़िलाफ़ नाराज़गी को हवा देती है.''
11 अगस्त यानी मंगलवार को बीजेपी ने झारखंड बंद का आयोजन किया था. प्रोफ़ेसर लोचन कहते हैं कि इस बंद अगर व्यापक असर होता तो कहा जा सकता था कि बीजेपी का जनता का अपार समर्थन मिल रहा है लेकिन ऐसा हुआ नहीं. प्रोफ़ेसर लोचन कहते हैं कि बंद का असर रांची में भी सीमित था.

कांग्रेस को लग रहा है कि झारखंड में जो आंदोलन कर रहे हैं, उनमें बीजेपी भीड़ बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल से लोगों को बुला रही है. 11 अगस्त को कांग्रेस महासचिव ने एक्स पर एक वीडियो पोस्ट किया था और लिखा था, ''बीजेपी को लगता है कि अगर झारखंड के आंदोलन में फ़र्ज़ी भीड़ भेज कर उसे बड़ा दिखाया गया, तो उनके ख़िलाफ़ जो जन आक्रोश पैदा हुआ था वो ख़त्म हो जाएगा.''
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास के राजनीतिक सलाहकार रहे अजय कुमार कहते हैं कि आंदोलन को देखने का नज़रिया सत्ता और विपक्ष का एक जैसा नहीं रहेगा. अजय कुमार कहते हैं, ''झारखंड में छात्रों की परेशानी बहुत ज़्यादा है. हर परीक्षा में कदाचार के मामले सामने आते हैं और यह झारखंड बनने के बाद से ही जारी है.''
प्रोफ़ेसर लोचन भी इस बात से सहमत नहीं हैं कि आंदोलन में आई भीड़ फ़र्ज़ी है. वह कहते हैं, ''जेपीएससी में पेपर लीक नहीं होता है बल्कि सीटें बिक जाती हैं. क्या इसे लेकर छात्रों की नाराज़गी ग़लत है? भीड़ में राजनीतिक पार्टियों के लोग भी हो सकते हैं लेकिन मुद्दा क्या है, इस पर ध्यान होना चाहिए.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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