मॉनसून सत्र में विपक्ष क्या वाकई सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब हुआ?

    • Author, शिवांगी जायसवाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदन गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिए गए. और इसके साथ ही संसद का 25 दिन लंबा मॉनसून सत्र समाप्त हो गया.

इस दौरान कई विवादित विधेयकों को लेकर विपक्ष और सरकार आमने-सामने रहे.

सत्र समाप्त होने के बाद कांग्रेस ने दावा किया कि संयुक्त विपक्ष की एकजुटता के कारण सरकार को परिसीमन, एक देश-एक चुनाव और उच्च शिक्षा सुधार जैसे कुछ अहम विधेयकों पर पीछे हटना पड़ा.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों की राय इस दावे पर एकमत नहीं है. कुछ इसे विपक्ष की सफलता मानते हैं, जबकि कुछ के अनुसार सरकार ने राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए रणनीतिक तौर पर इन विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाया.

कौन से मुद्दे विपक्ष की 'जीत' के तौर पर पेश किए जा रहे हैं?

1. परिसीमन विधेयक आगे नहीं बढ़ा

कांग्रेस का दावा है कि सरकार मॉनसून सत्र में परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक दोबारा लाने की तैयारी कर रही थी. लेकिन विपक्षी दलों, ख़ासकर दक्षिण भारतीय राज्यों के विरोध के कारण सरकार पीछे हट गई.

दक्षिण भारत के कई राज्यों का तर्क है कि परिसीमन के बाद उनकी लोकसभा सीटों का अनुपातिक प्रभाव कम हो सकता है, जिससे केंद्र की राजनीति में उनकी भागीदारी घटेगी. तमिलनाडु विधानसभा ने भी सीटों की मौजूदा संख्या 543 बनाए रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था.

2. एफ़सीआरए संशोधन विधेयक जेपीसी को भेजा गया

सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) क़ानून यानी एफ़सीआरए में संशोधन का विधेयक लेकर आई थी. विपक्ष और कई ईसाई संगठनों ने इसका विरोध किया.

आख़िरकार केंद्र सरकार इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने पर सहमत हो गई. कांग्रेस इसे अपने दबाव का परिणाम बता रही है, जबकि सरकार का कहना है कि विधेयक पर व्यापक विमर्श के लिए यह कदम उठाया गया.

3. उच्च शिक्षा सुधार विधेयक पेश नहीं हुआ

उच्च शिक्षा क्षेत्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक को भी संसद की कार्यसूची में रखा गया था. इस प्रस्ताव के तहत यूजीसी समेत कुछ नियामक संस्थाओं की जगह एक केंद्रीय निकाय बनाने की बात थी. पिछले साल इसे जेसीपी को भेजा गया था, जिसे इस सेशन में दोबारा पेश करना था मगर सरकार ने इसे सदन में पेश नहीं किया.

4. एक देश-एक चुनाव विधेयक नहीं आया

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने गुरुवार को दावा किया कि सर्वदलीय बैठक में सरकार ने संकेत दिया था कि सत्र में एक देश-एक चुनाव संबंधी विधेयक पेश किया जाएगा. हालांकि बाद में इसे पेश नहीं किया गया.

5. स्वतः बर्ख़ास्तगी का बिल पेश नहीं हुआ

सरकार एक संविधान (130वां संशोधन) विधेयक पर विचार कर रही है जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्रियों को अगर किसी मामले में गिरफ्तार किया जाता है और लगातार 30 दिनों तक जमानत नहीं मिलती है, तो 31वें दिन उन्हें पद से स्वतः हटना पड़ेगा. इसे पिछली बार विरोध के बाद सरकार ने जेपीसी को भेजा था.

एफ़सीआरए विधेयक पर नरमी क्यों?

कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके दावा किया कि "एफ़सीआरए संशोधन विधेयक पर सरकार का रुख़ नरम पड़ने के पीछे अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की फ़ोन बातचीत का प्रभाव था."

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता इस दावे को स्वीकार नहीं करते. उनके अनुसार फ़ोन वार्ता में क्या चर्चा हुई, इसकी सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय दबाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

हालांकि वह यह भी कहते हैं कि "यह बिल ईसाई संगठनों को प्रभावित कर रहा था और बीजेपी इन संगठनों को प्रॉब्लेमेटिक मानता रहा है."

द हिन्दू के मुताबिक़, केंद्र सरकार के रुख़ में नरमी का पहला संकेत 9 अगस्त को मिला. उस दिन कई ईसाई संगठनों ने यूट्यूब, फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर एक साथ अपीलें जारी कीं.

उन्होंने केंद्र सरकार से कहा कि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को या तो संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाए या फिर उसे पूरी तरह वापस ले लिया जाए.

इन अपीलों को सरकार को सम्मानजनक तरीके से पीछे हटने का अवसर देने की कोशिश के रूप में देखा गया.

बुधवार को गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में विधेयक को जेपीसी के पास भेजने का प्रस्ताव रखा. हंगामे के बीच यह प्रस्ताव मंज़ूर कर लिया गया. इससे संसद को विधेयक के विवादित प्रावधानों पर और विस्तार से विचार करने के लिए ज़्यादा समय मिल गया.

डिलिमिटेशन बिल पर क्यों बदली रणनीति

17 जुलाई को द इंडियन एक्सप्रेस ने बीजेपी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया कि सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने को कई दलों से बातचीत कर रही है ताकि इसे मॉनसून सत्र में लाया जा सके.

20 जुलाई को मॉनसून सत्र शुरू हुआ. इसी दिन कॉकरोच जनता पार्टी की "संसद चलो" रैली के लिए देशभर से बड़ी संख्या में युवा दिल्ली पहुंचे, जिन पर पुलिस ने लाठियां और पैलेट गन का इस्तेमाल किया.

इन कार्रवाइयों पर गृह मंत्री से जवाब देने की मांग को लेकर संसद में लगभग 12 दिनों तक हंगामा चलता रहा. फिर पांच अगस्त को गतिरोध समाप्त करने के लिए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला.

इस दौरान परिसीमन विधेयक को लेकर विशेष सत्र बुलाने की अटकलें भी शुरू हो गईं. हालांकि रिजिजू ने ऐसी रिपोर्टों को ख़ारिज किया. फिर तीन दिन बाद वे दोबारा राहुल गांधी से मिले और सदन चलने को लेकर सहयोग मांगा, सरकार का यह रुख पहले देखने को नहीं मिलता था.

बाद में खबरें आईं कि 13 अगस्त को कैबिनेट बैठक में संशोधन का मसौदा मंजूर कराकर 18 से 20 अगस्त तक विशेष सत्र बुलाया जा सकता है, लेकिन न तो वह कैबिनेट बैठक हुई और न ही विशेष सत्र की घोषणा.

'द हिन्दू' की पूर्व एसोसिएट एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता का कहना है कि सरकार ने परिसीमन विधेयक दोबारा पारित कराने के लिए कई राजनीतिक प्रयास किए.

इसी क्रम में दस साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल की मुलाक़ात भी हुई. फिर अकाली दल ने महिला आरक्षण और परिसीमन पर केंद्र को समर्थन देने का ऐलान किया.

"टीएमसी और फिर शिवसेना (उद्धव) में टूट के बाद भाजपा में शामिल हुए सांसदों और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के अपनी ओर नरम होते रुख़ से केंद्र को एक-तिहाई समर्थन जुटा लेने की उम्मीद मिल रही थी."

वे बोलीं कि सरकार को उम्मीद थी कि कांग्रेस से नाराज़ डीएमके उसका समर्थन कर सकती है, लेकिन तमिलनाडु विधानसभा ने संसद की सीटों की संख्या 543 बनाए रखने के पक्ष में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर दिया. इसमें सत्ताधारी टीवीके, विपक्षी दल डीएमके समेत कई अन्य दलों ने समर्थन दिया.

स्मिता गुप्ता के अनुसार, इस घटनाक्रम ने केंद्र को पीछे हटने पर मजबूर किया क्योंकि वह दूसरी बार विधेयक लाकर उस पर असफल होते नहीं दिखना चाहती थी.

दक्षिण भारतीय राज्यों को आशंका है कि परिसीमन के बाद केंद्र की राजनीति में उनकी हिस्सेदारी कम हो सकती है.

गौरतलब है कि अप्रैल में बजट सत्र के बाद बुलाए गए विशेष सत्र में सरकार ने लोकसभा से परिसीमन विधेयक पारित किया था, इसे महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के साथ जोड़कर लाया गया था, लेकिन संविधान संशोधन होने के कारण आवश्यक विशेष एक-तिहाई बहुमत नहीं जुटा सकी और विधेयक गिर गया था.

मानसून सत्र के दौरान 7 अगस्त को कई महिला समूहों ने 'नेशनल कुलिज़न ऑफ़ विमेन्स रिज़र्वेशन' के बैनर तले दिल्ली में प्रदर्शन किया. उन्होंने मांग की कि महिला आरक्षण बिल को इसी सेशन के दौरान बिना शर्त लागू किया जाए.

इस मामले में स्मिता गुप्ता कहती हैं कि "जब महिलाएं निकलकर आ गईं कि बिल तो पहले ही पास हो चुका है, आप इसे डिलिमिटेशन से मत जोड़िए और तुरंत लागू कीजिए तो इससे वो (केंद्र) एक्सपोज़ हो गए."

वे आगे कहती हैं कि फिर इसी दौरान राजनीतिक समीकरण बदले जब बिहार की बंकीपुर उपचुनाव में बीजेपी की हार हुई, इससे इन्हें झटका लगा.

वे समझाती हैं कि भले ये विधानसभा सीट से जुड़ा मामला था, मगर बिहार की सबसे सुरक्षित सीट से प्रशांत किशोर के जीतने से सरकार को संकेत मिला कि पारंपरिक राजनीति को चुनौती मिल रही है.

उनके अनुसार इन्हीं कारणों से सत्र के अंत तक आते-आते केंद्र ने परिसीमन बिल पर अपना रुख़ बदल लिया.

युवा आंदोलन या विपक्ष की रणनीति बनी दबाव की वजह

सरकार के कई विवादित बिलों को सत्र में पेश करने के संकेत देने और ऐन मौके पर उन्हें पेश न करने को वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता बीजेपी की रणनीति का हिस्सा मानते हैं.

चार दशक से राजनीति और गर्वनेंस पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं कि सरकार इसलिए बिल पास नहीं करा पाई क्योंकि वो इन बिलों को पास कराने पर आमादा नहीं थी. बीजेपी समय-समय पर पत्थर फेंककर गहराई नापती आई है और इस बार भी वो यही कर रही थी.

हालांकि वे यह भी कहते हैं कि युवा आंदोलन ने मोदी सरकार के इक़बाल को नुक़सान पहुंचाया, जिससे वो बैकफ़ुट पर दिखी.

वे कहते हैं कि शिक्षा और रोजगार का मुद्दा ऐसा है जिसने सभी विपक्षी दलों को एकजुट बनाए रखा, उनके पास विपक्ष में अपनी मांगों को लेकर हंगामा करने के बजाए कोई और चारा नहीं था, इसलिए वे इसी रणनीति पर चले.

वे कहते हैं, जिस तरह विपक्ष किसी भी मामले पर चर्चा करने से पहले चाहता था कि गृह मंत्री सदन में आकर दिल्ली पुलिस की युवा प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई पर जवाब दें, उसी तरह सरकार चाहती थी कि ये सेशन ऐसे ही हंगामे में गुज़र जाए और वह युवाओं पर पैलेट गन चलने और राम मंदिर चढ़ावा चोरी जैसे मुद्दों पर कुछ भी कहने से बच जाए.

वे कहते हैं कि इस बीच भी सरकार ने कई बिल बिना चर्चा के ही सही मगर पास करा लिए.

लंबे समय तक संसद कवर कर चुके वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार विजय त्रिवेदी ने बीबीसी के कार्यक्रम दिनभर में कहा कि पूरा सत्र हंगामे में गुज़र जाने से सरकार ने खुद को राम मंदिर विवाद में किसी तरह का जवाब देने से बचा लिया.

उन्होंने यह भी कहा कि बीते 12 साल में यह पहला मौका था जब मोदी सरकार संसद में इतनी कमजोर दिखी और यह युवा आंदोलन का असर था.

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने गुरुवार को मॉनसून सत्र के समापन पर कहा कि इसमें कुल 12 विधेयक पारित हुए. उन्होंने इसे कामकाज के हिसाब से सफल बताया और कहा कि बहस और चर्चा के नज़रिए से यह उतना सफल नहीं रहा.

रिजिजू के मुताबिक़, लोकसभा में निर्धारित कुल समय की तुलना में उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत रही. वहीं, राज्यसभा में उत्पादकता 39 प्रतिशत दर्ज की गई.

इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "मुझे सबसे ज़्यादा अचंभा इस बात पर हुआ कि विपक्ष ने एक भी दिन प्रश्नकाल नहीं चलने दिया जो मोटे तौर पर विपक्ष के सबसे फ़ायदे की चीज़ होती है. हमें ये याद रखना चाहिए कि जब संसद न चले तो इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा सरकार को ही होता है. सरकार ने इस सेशन में भी 12 बिल तो पास करवा ही लिए."

साथ ही वे कहते हैं, "सरकार ने वो बिल नहीं पास करवाए, जिसे पास करवाना वो नहीं चाहती थी, या उसे लगा कि अभी ये सही समय नहीं है."

बता दें कि संसद में कार्यवाही का पहला घंटा प्रश्नकाल कहलाता है, इसमें सांसद देश और जनता से जुड़े मुद्दों पर मंत्रियों से सवाल पूछते हैं और सरकार की जवाबदेही तय करते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राशिद किदवई का कहना है कि इस पूरे मामले में सरकार के सामने विपक्ष का संकट नहीं था.

राशिद कहते हैं, "सरकार और ख़ासकर गृह मंत्री अमित शाह हमेशा ही विपक्ष की रणनीति ने निपटते रहे हैं. मगर इस बार उनका सामना ऐसे ज़ेन-ज़ी से था, जो संसद में गृह मंत्री के लाठी चार्ज़ के ऊपर दिए जाने वाले किसी भी संभावित बयान से और उखड़ सकते थे. इस मामले में उन बच्चों के परिवार की संवेदनाएं भी शामिल थीं. ऐसे में सरकार अंतिम समय तक भी ऐसा नहीं चाहती थी कि उसे कोई बयान देना पड़े और इसीलिए मॉनसून सत्र ऐसे ही गुज़र गया."

शरद गुप्ता कहते हैं कि सत्र समापन से दो दिन पहले अमित शाह को चर्चा के लिए तैयार होना महज़ एक ऑप्टिक्स थी ताकि जनता को पॉज़िटिव मैसेज जाए कि सरकार राज़ी है, विपक्ष चर्चा नहीं कर रहा.

उधर, पत्रकार स्मिता गुप्ता का मानना है कि अमित शाह का आख़िरी मौके पर चर्चा के लिए तैयार होने का बयान देना कोई रणनीति नहीं बल्कि मजबूरी है. वे कहती हैं कि युवा आंदोलन से बने दबाव के बाद उनकी सब रणनीति बेपटरी हो गई इसलिए उन्हें बाहर आना पड़ा.

विजय त्रिवेदी का मानना है कि अमित शाह के देरी से आए चर्चा के बुलावे पर भी विपक्ष को राज़ी हो जाना चाहिए था. इस तरह कम से कम युवा प्रदर्शनकारियों पर चली लाठियों, पैलेट गन, शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर उनकी ओर से कुछ तो कहा जाता. चर्चा होती तो झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन का मुद्दा भी उठता, उससे विपक्ष को भी नहीं भागना चाहिए. ये मानते हैं कि ये ऐसा मौका है जिसमें न सरकार की जीत हुई और न विपक्ष की.

मिनटों में कैसे पास हुए बिल

  • 11 में से 9 विधेयकों पर लोकसभा में 15 मिनट से भी कम चर्चा हुई.
  • 7 विधेयकों पर लोकसभा में चर्चा 10 मिनट से कम रही.
  • सबसे अधिक चर्चा पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक पर हुई, जिस पर कुल 17 घंटे 34 मिनट बहस हुई.
  • जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में मिलाकर सिर्फ 54 मिनट चर्चा हुई.
  • अधिकांश मामलों में वास्तविक बहस राज्यसभा में हुई, जबकि लोकसभा में विधेयक कुछ मिनटों में पारित हो गए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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