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अमित शाह ने इतने दिनों बाद चुप्पी क्यों तोड़ी और कांग्रेस ने अपनी रणनीति क्यों बदली?
संसद के मॉनसून सत्र के ख़त्म होने से एक दिन पहले बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि वह नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों पर विस्तार से चर्चा के लिए तैयार हैं.
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तय समय को बढ़ाने के लिए भी तैयार है.
शाह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर विपक्ष के साथ विचार-विमर्श के बाद इस मुद्दे पर चर्चा कराने का अनुरोध भी किया.
लोकसभा के बाहर शाह ने बुधवार को कहा, "हम आज दोपहर तीन बजे से गुरुवार दोपहर तीन बजे तक सभी पहलुओं पर चर्चा के लिए तैयार हैं. मैं सदन में बैठूंगा, सबकी बात सुनूंगा और हर मुद्दे का जवाब दूंगा. सरकार को कुछ भी छिपाना नहीं है."
20 जुलाई को हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद पहली बार शाह ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बयान दिया. उन्होंने कहा कि वह नियमित रूप से संसद आते हैं और विपक्ष पर सदनों की कार्यवाही नहीं चलने देने का आरोप लगाया.
संसद का माॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था और सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) के नेतृत्व में युवाओं ने 20 जुलाई को जंतर मंतर से संसद मार्च शुरू किया था. इसी दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे थे. तब कांग्रेस मांग कर रही थी कि गृह मंत्री संसद में बयान दें और इस पर बहस हो. लेकिन सरकार ने तब विपक्षी दलों की बात नहीं मानी.
अमित शाह भी चुप रहे. लेकिन मॉनसून सत्र जब ख़त्म होने जा रहा है तो अमित शाह ने कहा कि वह संसद में हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं. लेकिन तब तक कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदल ली. कांग्रेस अब इस बात पर राज़ी नहीं है. अब कांग्रेस अमित शाह के इस्तीफ़े की मांग कर रही है.
अमित शाह इतने दिनों बाद क्यों बोले?
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई मानते हैं कि अमित शाह ने संसद में जवाब देने की पेशकश करने में देर कर दी. सरदेसाई ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, ''संसद का मॉनसून सत्र ख़त्म होने से ठीक एक दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने आख़िरकार अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा कि वह विपक्ष के हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं.''
''यह बहुत देर से उठाया गया क़दम लगता है, क्योंकि विपक्ष अब अपनी मांग बदल चुका है. पहले वह सदन में गृह मंत्री के बयान की मांग कर रहा था, लेकिन अब वह उनके इस्तीफ़े की मांग कर रहा है.''
''साफ सवाल, जो नहीं पूछा गया: क्या संसद में तीन हफ़्ते से चल रहे गतिरोध को ख़त्म करने के लिए गृह मंत्री तीन हफ़्ते पहले ही सदन में बोलने की पेशकश नहीं कर सकते थे?''
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश को लगता है कि अमित शाह ने मॉनसून सत्र के आख़िर में पेशकश इसलिए रखी क्योंकि कथित मज़बूत सरकार की छवि कमज़ोर पड़ रही थी.
उर्मिलेश कहते हैं, ''जंतर मंतर पर चले 37 दिनों के आंदोलन में सबसे ज़्यादा हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हुआ है. अमित शाह निशाने पर नहीं थे. मीम्स और दीवारों पर लिखे नारों में नरेंद्र मोदी ही निशाने पर थे. अमित शाह निशाने पर 20 जुलाई के बाद आए, जब पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर सख़्ती दिखाई.''
''इसके बावजूद पूरे आंदोलन ने पीएम मोदी की छवि को ज़्यादा नुक़सान पहुँचाया है. संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ लेकिन गृह मंत्री एक दिन भी सदन में नहीं आए. यहाँ तक कि जब परीक्षाओं में कदाचार रोकने के लिए बिल पास हुआ, तब भी अमित शाह नहीं आए. मुझे लगता है कि अमित शाह ने अपना चेहरा बचाने के लिए मॉनसून सत्र के आख़िर में आकर कहा कि हम तैयार हैं.''
उर्मिलेश कहते हैं कि कांग्रेस की रणनीति बहुत बदली नहीं है क्योंकि कांग्रेस शुरू से ही बयान की मांग कर रही थी.
वह कहते हैं, ''कांग्रेस चाहती थी कि अमित शाह संसद में बयान दें और फिर वह कहे कि बयान से संतुष्ट नहीं है, उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए. कांग्रेस इसी मुद्दे को लेकर फिर पब्लिक के बीच जाती. अमित शाह अगर ये बयान भी नहीं देते तो कांग्रेस कहती कि पूरे सत्र में वह चुप रहे और संसद से ग़ायब रहे. ऐसे में लोगों के बीच भी इसका अच्छा संदेश नहीं जाता.''
उर्मिलेश कहते हैं, ''अमित शाह ने कहा कि वह मंगलवार को तीन बजे से अगले दिन शाम तीन बजे तक उपलब्ध हैं और यह बात राहुल गांधी को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी.''
कई बार ऐसा हुआ है कि विपक्ष ने कई मुद्दों पर सरकार को घेरा और संसद में बहस के बाद अचानक से नैरेटिव बदल जाता था. ऐसे में कांग्रेस को पिछली बहसों का भी अंदाज़ा रहा होगा और उसने अपनी रणनीति में उदारता नहीं दिखाई.
राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं कि अमित शाह चाहते थे कि मॉनसून सत्र का अंत पॉजिटिव नोट के साथ ख़त्म हो और वह सरकार के पक्ष में हो, इसलिए आख़िर में आकर पेशकश कर दी.
विनोद शर्मा कहते हैं, ''अमित शाह हर सवाल का जवाब देने के लिए कह रहे हैं और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू कह रहे हैं कि विपक्ष का ध्यान से सुनना होगा. अमित शाह कह रहे हैं कि तीन से तीन बजे तक ही उपलब्ध रहेंगे.''
''संसद सरकार अपनी शर्तों पर नहीं चला सकती है. अगर अमित शाह सारे सवालों का जवाब देना चाहते थे तो शुरू में ही ये बात कह देते. जहां तक कांग्रेस की बात है तो कोई भी पार्टी बदलते राजनीतिक हालात के हिसाब से रणनीति बदलती है और इसी को समझदारी कहते हैं. कांग्रेस ने इस बार बीजेपी चाल पहले समझ ली थी.''
'हमें भाषण नहीं चाहिए'
हालांकि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चर्चा के इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि युवा यह जानना चाहते हैं कि प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी और पुलिस की कार्रवाई का आदेश किसने दिया था. उन्हें अमित शाह का "भाषण नहीं चाहिए".
गुरुवार को समाप्त होने वाले संसद के मॉनसून सत्र में अब तक बहुत कम कामकाज़ हुआ है. प्रश्नकाल नहीं हो सका और हंगामे के बीच कई बिल पारित किए गए. विपक्ष 20 जुलाई को नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कथित पुलिस ज़्यादती के मामले में अमित शाह के जवाब की मांग करता रहा है.
राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष गृह मंत्री की "मनगढ़ंत बातों" या "भाषण" और चर्चा में दिलचस्पी नहीं रखता. उन्होंने कहा कि सरकार को प्रदर्शनकारी छात्रों के ख़िलाफ़ कथित बल प्रयोग पर उठाए गए ख़ास सवालों का जवाब देना चाहिए.
उन्होंने पूछा, "किसने एक छात्र को अंधा किया और दूसरे छात्र के कान में गोली मारी? छात्रों को कील लगी लाठियों से पीटने का आदेश किसने दिया? क्या अमित शाह ने हमारे बच्चों पर गोली चलाने का आदेश दिया था? अगर दिया था तो उन्हें दोषी होने के कारण इस्तीफ़ा देना चाहिए. और अगर उन्होंने आदेश नहीं दिया था, तो उन्हें अक्षम होने के कारण इस्तीफ़ा देना चाहिए."
राहुल गांधी ने कहा कि शाह पिछले 20 दिनों से "ग़ायब" हैं. उन्होंने कहा, "वह पहले यहाँ (संसद परिसर में) आते थे. उनकी गाड़ियां आती-जाती थीं. उनके आसपास 30 गाड़ियां रहती थीं. छात्रों को यह पता होना चाहिए. अगर आप उनके घर के बाहर जाते, तो वहां हज़ारों पुलिसकर्मी होते, ताकि छात्र वहां तक न पहुँच सकें."
अमित शाह ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर सदन में विपक्ष की बयान देने की मांग को उन्होंने ख़ारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि संसदीय प्रक्रिया के तहत पहले चर्चा होनी चाहिए और उसके बाद वह जवाब देंगे. शाह ने कहा, "मैं यह भी जवाब दूंगा कि विपक्ष ने चर्चा क्यों नहीं होने दी."
नीट प्रदर्शन पर चर्चा को लेकर उन्होंने कहा, "संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू पहले ही साफ कर चुके हैं कि सरकार नीट प्रदर्शन पर पूरी चर्चा के लिए तैयार है. सरकार ने चर्चा के लिए समय तय करने और विपक्ष से तैयार रहने को कहा था और विपक्ष की शुरुआती मांग को भी मान लिया था."
अमित शाह ने कहा, "मैंने भी कहा है कि मैं संसद में किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हूं, लेकिन वे चर्चा ही नहीं चाहते."
उन्होंने कहा कि अब जनता तय करे कि "कौन भाग रहा है."
विपक्षी नेताओं ने सरकार की आख़िरी समय में की गई इस पेशकश को छात्र प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कथित "पुलिस की बर्बरता" के लिए जवाबदेही से बचने की कोशिश बताया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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