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बेनज़ीर भुट्टो की सरकार को बर्ख़ास्त करने में पाकिस्तानी आर्मी की क्या भूमिका थी?
- Author, वक़ार मुस्तफ़ा
- पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
यह जुलाई 1990 का तीसरा हफ़्ता था. पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो इस्लामाबाद से रावलपिंडी की ओर जा रही थीं.
सूचना मंत्री जावेद जब्बार उनके साथ पीछे की सीट पर बैठे थे. जब्बार ने पीएम भुट्टो को बताया कि राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान जल्द ही उनकी सरकार को बर्ख़ास्त करने वाले हैं.
बेनज़ीर भुट्टो दिसंबर 1988 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की चुनावों में जीत के बाद प्रधानमंत्री बनी थीं.
अपनी आत्मकथा 'बट, प्राइम मिनिस्टर' में जावेद जब्बार ने लिखा है कि बर्ख़ास्तगी की ऐसी अफ़वाहें पहले भी फैल रही थीं.
लेकिन उस दिन उन्हें इसके बारे में जानकारी एक आर्मी ऑफ़िसर से मिली थी.
जावेद जब्बार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "मुझे लगा कि या तो यह पीपीपी सरकार को समय से पहले इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर करने की साज़िश थी, या फिर बेनज़ीर भुट्टो को राष्ट्रपति और सेना प्रमुख के सामने झुकने के लिए मनाने की कोशिश थी."
जावेद जब्बार लिखते हैं कि बेनज़ीर भुट्टो ने चुपचाप उनकी बात सुनी, फिर हल्की-सी मुस्कान और आत्मविश्वास भरे अंदाज़ में कहा, "ये अफ़वाहें हमें निराश करने के लिए फैलाई जा रही हैं. ऐसा नहीं होगा, जावेद."
उन्होंने कहा कि उन्हें यह जानकारी विश्वसनीय नहीं लगती है.
इस शुरुआती जानकारी के लगभग दो सप्ताह बाद, 6 अगस्त, 1990 की सुबह पाकिस्तान के अंग्रेज़ी दैनिक 'द नेशन' के पहले पन्ने की मुख्य ख़बर ने उन्हें चेतावनी दी कि उनकी सरकार को बर्ख़ास्त किया जाने वाला है.
तब भी बेनज़ीर ने इस पर विश्वास नहीं किया.
क्रिस्टीना लैम्ब अपनी पुस्तक 'वेटिंग फ़ॉर अल्लाह' में लिखती हैं कि प्रधानमंत्री सचिवालय की सैन्य घेराबंदी के बाद भी बेनज़ीर यह मानने को तैयार नहीं थीं कि उन्हें सत्ता से हटाया जा सकता है.
'द नेशन' के संपादक आरिफ़ निज़ामी ने उसी साल सितंबर में लाहौर में क्रिस्टीना लैम्ब को बताया कि उन्हें प्रधानमंत्री आवास से एक फ़ोन आया था.
लैम्ब अपनी किताब में लिखती हैं, "संसदीय कार्य मंत्री तारिक रहीम फ़ोन पर थे. उन्होंने ख़बर के स्रोत पूछे और आरोप लगाया कि अख़बार सैन्य ख़ुफ़िया विभाग की दी गई जानकारी प्रकाशित कर रहा है."
इसी बीच बेनज़ीर भुट्टो ने अपनी करीबी सहयोगी हैप्पी मनवाला को अमेरिकी राजदूत और राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान से मिलने के लिए भेजा.
राष्ट्रपति ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह कोई 'असाधारण' क़दम नहीं उठाने वाले हैं.
बेनज़ीर इससे संतुष्ट हो गईं.
हालांकि बेनज़ीर के मंत्री तारिक रहीम संतुष्ट नहीं थे.
क्रिस्टीना लैम्ब ने रहीम के हवाले से अपनी किताब में लिखा, "उन्होंने राष्ट्रपति कार्यालय को 8 अगस्त को संसद सत्र बुलाने के लिए एक निवेदन भेजा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. आख़िर में उन्हें बताया गया कि फाइल वापस नहीं की जाएगी."
लैम्ब के मुताबिक तारिक रहीम ने गुस्से से कहा, "तुम जो भी कर रहे हो, इतिहास तुम्हें माफ नहीं करेगा."
शाम 4 बजे तक सचिवालय के आसपास सैन्य वाहन दिखाई देने लगे.
क्रिस्टीना लैम्ब के अनुसार, अगर बेनज़ीर भुट्टो को वास्तविक स्थिति का पहले ही एहसास हो जाता, तो वह खुद विधानसभाओं को भंग कर सकती थीं और नए चुनावों की घोषणा कर सकती थीं.
इससे उन्हें सत्ता में बने रहने और चुनावी प्रक्रिया पर अधिक नियंत्रण रखने का लाभ मिलता.
सेना के ख़िलाफ़ आरोप और खंडन
बेनज़ीर भुट्टो ने न्यूयॉर्क टाइम्स की संवाददाता बारबरा क्रॉसेट से बातचीत में अपनी सरकार की बर्खास्तगी को "सैन्य हस्तक्षेप" बताया.
उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन की योजना काफी समय से बनाई जा रही थी. बेनज़ीर भुट्टो ने कहा कि उनके, उनके परिवार, उनके सहयोगियों और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के खिलाफ पूरा केस सेना ने तैयार किया था.
उनका कहना था कि सरकार को बर्खास्त करने और नेशनल असेंबली को भंग करने का आदेश भी सेना ने तैयार किया था.
क्या बेनज़ीर को हटाए जाने में सेना की भूमिका थी?
"इक़्तिदार की मजबूरियां" जनरल मिर्ज़ा असलम बेग की जीवनी है, जिसे उन्होंने पाकिस्तानी सेना के सेवानिवृत्त कर्नल अशफाक हुसैन के साथ मिलकर लिखा है.
इस किताब के मुताबिक, "शपथ लेने से पहले जनरल बेग ने बेनज़ीर को अपने घर पर बुलाया और तीन अनुरोध किए: यदि सेना के बारे में कोई शिकायत हो, तो मुझे बताएं और मैं उसका समाधान करूंगा, जनरल जिया-उल-हक के परिवार के प्रति नरमी बरतें और जब राष्ट्रपति चुनने का समय आए, तो गुलाम इशाक खान को ध्यान में रखें."
"बेनज़ीर भुट्टो इन सुझावों से सहमत थीं और उन्होंने इन्हें गंभीरता से लिया."
अपनी जीवनी में जनरल असलम बेग ने संकेत दिया है कि बेनज़ीर भुट्टो उन्हें सेना प्रमुख के पद से हटाकर ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का अध्यक्ष बनाने पर विचार कर रही थीं.
"इक़्तिदार की मजबूरियां" में जनरल बेग लिखते हैं, "इस सूचना के आधार पर, मैंने फॉर्मेशन कमांडरों की एक बैठक बुलाई और स्पष्ट कर दिया कि अगर कोई भी अधिकारी ऐसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. जिस कोर कमांडर के नाम पर विचार किया जा रहा था, वह भी बैठक में उपस्थित था और शायद उसने यह बात प्रधानमंत्री को बता दी."
'राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच मतभेद'
हालांकि जनरल बेग की उसी किताब में, 'राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच मतभेद' शीर्षक के अंतर्गत लिखा है कि '1990 की शुरुआत में, राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने मुझे एक अनौपचारिक पत्र के माध्यम से सूचित किया कि कुछ मामलों पर उनके और प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए थे.'
किताब में जनरल बेग लिखते हैं, "मैंने कोर कमांडरों के सम्मेलन में यह मुद्दा उठाया था. सभी कमांडर इस बात पर एकमत थे कि राष्ट्रपति को संयम बरतना चाहिए, प्रधानमंत्री को अपनी गलतियों को सुधारने का मौका देना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनका मार्गदर्शन करना चाहिए."
लेकिन दोनों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित नहीं हो सका, मतभेद बढ़ते गए और आख़िरकार राष्ट्रपति ने 6 अगस्त, 1990 को संविधान के अनुच्छेद 58(2)(बी) के तहत सरकार को बर्खास्त कर दिया और 90 दिनों के भीतर चुनाव की घोषणा कर दी.
पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक इकबाल अखुंद की राय जनरल बेग से अलग है.
अपनी पुस्तक 'ट्रायल एंड एरर: द एडवेंट एंड एक्लिप्स ऑफ़ बेनज़ीर भुट्टो' में अखुंद लिखते हैं कि 'ऐसा लगता है कि जनरल असलम बेग ने सरकार की बर्ख़ास्तगी से लगभग छह महीने पहले बेनज़ीर को सत्ता से हटाने का फ़ैसला कर लिया था.'
अखुंद के अनुसार, इस पूरे अभियान के असली सूत्रधार राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान थे.
कुछ सालों बाद, जब बेनज़ीर सत्ता में वापस आईं, तो उन्होंने अखुंद को बताया कि अमेरिकी उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट गेट्स ने जुलाई 1990 में पाकिस्तान की अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान को उन्हें बर्ख़ास्त करने की मंज़ूरी दी थी.
हालांकि, अखुंद लिखते हैं कि वे स्वयं राष्ट्रपति और रॉबर्ट गेट्स के बीच हुई बैठक में मौजूद थे और बेनज़ीर सरकार के भविष्य पर कोई चर्चा नहीं हुई थी.
पूर्व नौकरशाह रूदैद ख़ान ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि बेनज़ीर भुट्टो अपनी सरकार पर मंडरा रहे संकट से पूरी तरह अनजान थीं और उन्होंने हमेशा की तरह आधिकारिक कामकाज जारी रखा.
रूदैद ख़ान को राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान का प्रशंसक माना जाता है.
रूदैद ख़ान के मुताबिक़, "जब अफ़वाहें फैलीं, तो उन्होंने अपने करीबी सहयोगी हैप्पी मनवाला को राष्ट्रपति से सच्चाई जानने के लिए भेजा. मनवाला यह संदेश लेकर लौटे कि राष्ट्रपति का संविधान के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने का इरादा नहीं है."
लेकिन रूदैद ख़ान यह भी लिखते हैं कि जनरल असलम बेग को पहले ही विश्वास में ले लिया गया था.
सरकार के बर्खास्त होने के बाद राष्ट्रपति के लिए एक अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त करना आवश्यक हो गया था.
गुलाम मुस्तफा जतोई का नाम कई वर्षों से संभावित प्रधानमंत्री के रूप में चर्चा में था, यहां तक कि अखबारों ने उन्हें 'प्रधानमंत्री पद के दावेदार' कहना शुरू कर दिया था, और आखिरकार उनका संक्षिप्त कार्यकाल आ ही गया.
लेकिन अखुंद के अनुसार, गुलाम इशाक खान ने सरकार की प्रक्रियाओं में बदलाव किया ताकि सभी आधिकारिक फाइलें सीधे राष्ट्रपति को भेजी जा सकें.
न्यायालय का निर्णय
6 अगस्त, 1990 को राष्ट्रपति गुलाम इशाक ख़ान ने देश में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने में सरकार की विफलता, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का हवाला देते हुए नेशनल असेंबली और प्रांतीय विधानसभाओं को भंग करते हुए बेनज़ीर भुट्टो की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया.
अखुंद के अनुसार, बेनज़ीर भुट्टो ने अपने ऊपर लगे अधिकांश आरोपों का खंडन किया और कुछ आरोपों पर स्पष्टीकरण दिया.
उदाहरण के लिए, उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने रिश्तेदारों और करीबी सहयोगियों को कुछ औद्योगिक परमिट दिए थे.
जब मामला अदालत पहुँचा तो कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि गुलाम इशाक खान ने सरकार को बर्ख़ास्त करके अपने संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप सही कार्रवाई की थी.
जावेद जब्बार लिखते हैं कि अगस्त 1990 के आख़िरी सप्ताह में, सरकार को बर्ख़ास्त किए जाने के लगभग तीन सप्ताह बाद, बेनज़ीर भुट्टो ने कराची के बिलावल हाउस में पीपीपी केंद्रीय समिति की एक बैठक बुलाई, जिसमें उन्होंने भी भाग लिया.
जब्बार बीस महीनों तक बेनज़ीर मंत्रिमंडल में रह चुके थे.
उस बैठक में बेनज़ीर भुट्टो ने सरकार की बर्ख़ास्तगी को राष्ट्रपति और कुछ सेना अधिकारियों की साज़िश बताया था.
जावेद जब्बार ने भी इस सभा में अपने विचार रखे.
उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री जी, हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारी सरकार में कुछ व्यक्तियों का भ्रष्टाचार हमारी बर्ख़ास्तगी का एक प्रमुख कारण था. हालांकि आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए थे, लेकिन भ्रष्टाचार ने हमारे प्रदर्शन और जनता की छवि दोनों को नुक़सान पहुंचाया."
जावेद जब्बार लिखते हैं कि बेनज़ीर भुट्टो को उनकी बात नागवार गुज़री.
जब्बार के मुताबिक़, "बेनज़ीर भुट्टो ने बेहद ग़ुस्से और सख़्त लहज़े में मेरी ओर देखते हुए कहा - भ्रष्टाचार? भ्रष्टाचार! बिलकुल नहीं, जावेद, यहां कोई भ्रष्टाचार नहीं था."
"यह आरोप पूरी तरह से मनगढ़ंत है, हमें बदनाम करने के लिए किया गया दुष्प्रचार है. भ्रष्टाचार कहां है? मुझे एक उदाहरण दीजिए, कुछ सबूत दिखाइए. अपने दुश्मनों की बातों को दोहराने के बजाय, सच बताइए. कोई भ्रष्टाचार नहीं था."
"हमारी सरकार को एक साज़िश के कारण ही बर्ख़ास्त किया गया था."
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