मुशर्रफ़ ने वाजपेयी को सलामी क्यों नहीं दी थी? 'ऑपरेशन सफ़ेद सागर' में दिखाई गई कारगिल की कहानी की पड़ताल

    • Author, अभ‍िषेक प्रताप स‍िंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

कारगिल पर अब तक हमने 'एलओसी कारग‍िल' से लेकर 'शेरशाह' जैसी कई फ़िल्में देखी हैं. वे सभी ज़मीन की लड़ाई की कहानियाँ थीं.

पहाड़ पर पैदल चढ़ते सैनिक, बंकर और चोटियों पर लहराता तिरंगा. 'नेटफ़्ल‍िक्स' पर हाल में रिलीज़ हुई वेब सिरीज़ 'ऑपरेशन सफ़ेद सागर' पहली बार इस युद्ध को एयर फ़ोर्स के नज़रिए से दिखाती है.

इस सिरीज़ की खूब चर्चा हो रही है लेकिन जब कोई कहानी इतिहास के पन्नों से निकलकर पर्दे पर आती है, तो उसमें कई सवाल भी निकलकर आते हैं.

तारीख़ थी 21 फरवरी 1999. 'ऑपरेशन सफ़ेद सागर' वेब सिरीज में एक बेहद नाटकीय और ऐतिहासिक सीन को दिखाते हुए जीवंत किया गया है.

सीन के मुताब‍िक़, लाहौर के गवर्नर हाउस में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में अपनी एक कविता के साथ अपने संबोधन का समापन किया. इसके बाद घड़ी आई पाकिस्तानी सेना के उच्चतम अधिकारियों से मुलाक़ात की.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ आगे बढ़े और प्रधानमंत्री वाजपेयी के साथ क़दम से क़दम मिलाते हुए उनसे सेनाधिकारियों का परिचय कराने लगे. सबसे पहले वाजपेयी के सामने आए पाकिस्तान नेवी के चीफ एडमिरल फ़सीह बुख़ारी.

इन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री को औपचारिक रूप से सैल्यूट किया. ठीक उनके बाद एयर चीफ़ मार्शल परवेज़ मेहंदी क़ुरैशी ने भी वाजपेयी को सलामी दी.

अब बारी थी पाकिस्तानी थल सेना के प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की. जैसे ही वाजपेयी उनके क़रीब पहुँचे, मुशर्रफ़ एक पल के लिए ठिठक गए. उन चंद सेकंड की भारी ख़ामोशी के बाद, बाकी दोनों सेनाध्यक्षों के उलट, मुशर्रफ़ ने सैल्यूट करने की जगह वाजपेयी की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया.

वेब सिरीज़ में दिखाए गए मुशर्रफ़ के इस हाथ मिलाने के क़दम के साथ ही, नवाज़ शरीफ़ की झेंप और वाजपेयी के चेहरे पर आए गंभीर भावों के बदलाव को दर्शक स्क्रीन पर बेहद साफ़ तौर पर महसूस कर सकते हैं.

'द प्रिंट' में 2019 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़रवरी 1999 में वाजपेयी के लाहौर पहुंचने पर वाघा बॉर्डर पर स्वागत तो पूरे प्रोटोकॉल के साथ हुआ. 21 तोपों की सलामी, गार्ड ऑफ़ ऑनर और दोनों देशों का राष्ट्रगान, पर पाकिस्तान का कोई भी सैन्य प्रमुख वहां मौजूद नहीं था.

लाहौर जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर भी शामिल थे. वे उन 22 लोगों में से एक थे जो उस बस में सवार थे.

गल्फ़ न्यूज़ में लिखे अपने लेख में उन्होंने बताया कि ये मेल-मिलाप इसलिए नहीं हो सका क्योंकि पाकिस्तान की सेना इसके ख़िलाफ़ थी, और ये तब साफ़ हो गया जब पाकिस्तान के तीनों सेना प्रमुखों ने भारतीय प्रधानमंत्री को सलामी देने से इनकार कर दिया.

बीबीसी ने पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर से टेलीफ़ोन पर बात की. हमने उनसे जानना चाहा क‍ि क्या भारत के प्रधानमंत्री से पाकिस्तान आर्मी के चीफ़ जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने हाथ मिलाया या सैल्यूट किया था.

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ''चूँकि पाकिस्तान के एयरफ़ोर्स चीफ़ और नेवी चीफ़ ने उस वक्त वर्दी और कैप पहनी थी. इसकी वजह से उन्होंने वाजपेयी जी को सैल्यूट किया लेकिन जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने वर्दी तो पहनी थी लेकिन कैप नहीं लगाई थी. इसकी वजह से उन्होंने सैल्यूट करने की बजाय हाथ मिलाया.''

बीबीसी ने हामिद मीर से कुलदीप नैय्यर के ग़ल्फ़ न्यूज के लेख में हाथ मिलाने या सैल्यूट करने वाली बात का हवाला दिया. उन्होंने बांग्लादेश के ढाका में कुलदीप नैय्यर से एक मुलाकात का ज़‍िक्र क‍िया.

हाम‍िद मीर ने बताया, ''जब मैं ढाका में नैय्यर साहब के साथ बैठा था तब भी वाजपेयी जी से मुशर्रफ़ के हाथ मिलाने का जिक्र हुआ था. ये सवाल ख़ुद मेरे साथ बैठे कुलदीप नैय्यर साहब से वहाँ मौजूद एक पत्रकार ने पूछा था. इसके जवाब में नैय्यर साहब ने ख़ुद जवाब देने के बजाय मुझे कहा था कि हामिद जी आप बताएँ, क्या हुआ था उस वक़्त.''

वाजपेयी से मुशर्रफ़ के हाथ मिलाने पर ऑपरेशन सफ़ेद सागर के लेखक ने क्या कहा?

बीबीसी ने ऑपरेशन सफ़ेद सागर के लेख़क संदीप जैन से इस संबंध में बातचीत की. संदीप जैन ने कहा, ''दर्शकों को हम मुशर्रफ़ का व्यक्तित्व दिखाना चाहते थे. वह स्क्रीनप्ले ही ऐसा माध्यम था जिसके ज़र‍िए दर्शक महसूस कर सकें कि उस दौरान मुशर्रफ़ के दिमाग़ में क्या चल रहा था.''

संदीप जैन का मानना है, ''असल में वाजपेयी के लाहौर पहुँचने से पहले ही मुशर्रफ़ कारगिल युद्ध की पूरी प्लानिंग कर चुके थे. ऐसे में स्क्रीनप्ले ही वो ज़रिया था जिससे दिखाया जा सके कि दरअसल मुशर्रफ़ खुद को भारत के प्रधानमंत्री से कम नहीं समझते थे. इसलिए उस कैरेक्टर की गंभीरता को सामने लाने के लिए ये दिखाया गया कि पाकिस्तानी नेवी और एयरफ़ोर्स के प्रमुखों ने वाजपेयी को सलाम किया जबकि मुशर्रफ ने हाथ मिलाया.''

ऑपरेशन सफ़ेद सागर वेब सिरीज़ रिलीज होने के बाद ये चर्चा तेज हो गई है कि साल 2001 के आगरा शिखर सम्मेलन में तत्‍कालीन वायु सेना प्रमुख एवाई टिपनिस ने मुशर्रफ़ को सलामी न देकर लाहौर का 'बदला' लिया था. दरअसल ये घटना आगरा में नहीं, बल्कि 14 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में हुई थी.

15 जुलाई 2001 के 'द ट्रिब्यून' में छपी रिपोर्ट बताती है कि टिपनिस ने वर्दी में होते हुए भी सलामी की जगह हाथ मिलाना चुना. प्रोटोकॉल के तहत, तीनों सेनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख के पास यह विकल्प होता है और सर्विस के लिहाज़ से मुशर्रफ़, टिपनिस से जूनियर थे.

साल 2013 में डीएनए अख़बार में छपे आर्टिकल में टिपनिस ने ख़ुद कहा था कि उन्होंने '2001 में मुशर्रफ़ को सलामी इसलिए नहीं दी क्योंकि पाकिस्तानी सेना का भारतीय सैनिकों के प्रति रवैया हमेशा शत्रुतापूर्ण रहा है, सलामी देना अनिवार्य नहीं था, और उन्होंने शिष्टाचार के नाते हाथ मिला लिया था.'

ऑपरेशन सफ़ेद सागर वेब सिरीज़ दिखाती है कि मुशर्रफ़ अकेले सारा प्लान बनाते हैं और प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को इस प्लान से जुड़ी कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन कारगिल युद्ध के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपने अलग-अलग बयान दिए. साल 2007 में पत्रकार शेखर गुप्ता को दिए इंटरव्यू में नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि 'उन्हें अंधेरे में रखा गया'.

जुलाई 2006 में बिज़नेस प्लस चैनल को दिए इंटरव्यू में मुशर्रफ़ ने तस्वीरें दिखाते हुए दावा किया कि शरीफ़ को सब पता था .

उन्होंने चार तस्वीरें पेश कीं जो 5 फ़रवरी 1999 को शरीफ़ के केल (कश्मीर) दौरे की थीं, यानी वाजपेयी के 19 फ़रवरी के लाहौर दौरे से भी पहले.

दूसरी ओर, कारगिल के समय आईएसआई के लेफ़्टिनेंट जनरल शाहिद अज़ीज़ ने अपनी किताब 'हाउ लॉन्ग दिस साइलेंस' में लिखा कि मुशर्रफ़ ने यह ऑपरेशन सिर्फ़ चंद अफ़सरों के साथ मिलकर अंजाम दिया. राज चेंगप्पा ने 2013 में 'द ट्रिब्यून' में इसका ज़िक्र करते हुए लिखा कि अज़ीज़ का यह दावा कि पूरी आईएसआई तक को भनक नहीं थी, मानना मुश्किल है.

कारगिल युद्ध में क्या आर्मी और वायुसेना के बीच तालमेल की कमी थी ?

ऑपरेशन सफ़ेद सागर वेब सिरीज़ में दिखाया गया है कि संकट के समय थल सेना और वायुसेना ने तुरंत मिलकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ऑपरेशन शुरू कर दिया था.

लेकिन क्या वाक़ई ऐसा हुआ था? अक्तूबर 2006 में 'फ़ोर्स' मैगज़ीन में (जिसे 2024 में 'द वायर' ने छापा) तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एवाई टिपनिस का एक लेख सामने आया था. इसमें उन्होंने लिखा था कि 10 से 25 मई 1999 के बीच थल सेना और वायुसेना के बीच गंभीर मतभेद थे और सबसे बड़ी शिकायत ये थी कि दोनों के बीच किसी स्तर पर संयुक्त योजना बनी ही नहीं.

14 मई को आर्मी के उप-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल चंद्रशेखर ने एयरफोर्स से एमआई-17 हेलिकॉप्टर का फ़ायर सपोर्ट मांगा और तर्क दिया कि सरकार की मंज़ूरी सिर्फ़ लड़ाकू विमानों के इस्तेमाल पर ज़रूरी है, हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल सेवा मुख्यालयों का आंतरिक फ़ैसला है. टिपनिस मदद देने के ख़िलाफ़ नहीं थे . वे दो बातों पर अड़े थे. 1. मंज़ूरी सरकार से आएगी, और 2. उस भूभाग में हमलावर भूमिका में हेलिकॉप्टर स्टिंगर मिसाइलों के सामने "बैठे हुए शिकार" साबित होंगे.

आख़िरकार 24 मई को जनरल वेद मलिक के साथ तीखी बहस के बाद उन्होंने हामी भरी, और 25 मई को प्रधानमंत्री वाजपेयी की मंज़ूरी के बाद 26 मई से ऑपरेशन शुरू हुआ. 28 मई को एक एमआई-17 स्टिंगर से गिरा दिया गया और चार वायुसैनिकों की मौत हो गई.

अक्तूबर 2006 में 'द ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के अनुसार, टिपनिस के इस लेख से विवाद खड़ा हो गया. उनका कहना था कि आर्मी सरकार को घुसपैठ की गंभीरता बताने में हिचक रही थी. जवाब में जनरल वी.पी. मलिक ने टिपनिस का ही 7 जुलाई 1999 का पत्र सार्वजनिक किया, जिसमें टिपनिस ने कारगिल में सेना के जवानों के साहस की खुलकर तारीफ़ की थी. मलिक ने अपना विस्तृत पक्ष अपनी किताब 'कारगिल: फ़्रॉम सरप्राइज़ टू विक्ट्री' में रखा है. उसी ट्रिब्यून रिपोर्ट में टिपनिस ने यह भी कहा था कि इन मतभेदों का ऑपरेशन पर असर नहीं पड़ा.

बीबीसी से बातचीत में डिफेंस एक्सपर्ट राहुल बेदी बताते हैं, ''कारगिल युद्ध के दौरान थल सेना और वायु सेना के बीच एकसाथ ऑपरेशन को अंजाम देने में कई बार समस्याएँ आई थीं. जबकि ये समस्या अभी तक चली आ रही है. " उन्होंने कारगिल युद्ध को 'इंटेलीजेंस फ़ेलियर' बताया.'

वह दावा करते हैं, ''वाजपेयी के लाहौर पहुँचने से पहले ही पाकिस्तानी सेना टुकड़ियां एलओसी पार करना शुरु कर चुकी थी. क्योंकि सर्दियों के मौसम में भारतीय सेना ऊँची पहाड़ियों से उतरकर नीचे आ जाती थी.'' इनके मुताबिक़, ''कारगिल युद्ध ऐसा युद्ध था जिसमें अगर सेना को पहले इंटेलीजेंस की तरफ से इनपुट मिल गए होते तो इस युद्ध को टाला जा सकता था.''

17 वीं स्क्वाड्रन 'गोल्डन ऐरोज़' का असली काम क्या था?

ऑपरेशन सफेद सागर में गोल्डन ऐरोज़ का जिक्र है कि कैसे इस स्क्वाड्रन ने पता लगाया कि पहाड़ी की ऊंची चोटी पर दुश्मन घुसपैठ कर चुके हैं. गोल्डन ऐरोज मुख्य रूप से टोही स्क्वाड्रन थी. पूर्व वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ कारगिल युद्ध के दौरान 17 वीं स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर थे. एक इंटरव्‍यू में वह बताते हैं, ''ऑपरेशन सफेद सागर का पहला मिशन गोल्डन ऐरोज ने किया था."

उस वक्त एयर चीफ मार्शल टिपनिस वायुसेना अध्यक्ष थे. उन्होंने पूरी एयरफोर्स को अलर्ट पर रहने का ऑर्डर दिया था.

बीएस धनोआ कहते हैं, "हमारे स्क्वाड्रन का रोल रिकॉनसेंस (तस्वीरें खींचने) का था . फिर बाद में स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा और लेफ़्ट‍िनेंट के. नचिकेता की दुर्घटना के बाद हमने रिक्वेस्ट किया कि हमें बॉम्बिंग रोल दे दिया जाए. बाद में हमारे स्क्वाड्रन के छह एयरक्राफ़्ट को बॉम्बिंग रोल दिया गया. ये वही स्क्वाड्रन है जो रफ़ाल उड़ा रहा है."

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की मृत्यु कैसे हुई थी?

कारग‍िल युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट के. नचिकेता के विमान का इंजन बंद होने की वजह से क्रैश हो गया था. इसके बाद क्रैश हुए विमान की तलाश के लिए निकले स्क्वा़ड्रन लीडर अजय आहूजा के विमान को ऊँची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों ने मिसाइल से निशाना बनाया था.

फाइटर जेट पर मिसाइल लगने की वजह से स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का जहाज़ गिरा. टिपनिस लिखते हैं, "इजेक्शन सीट ने उन्हें दूसरी ज़िंदगी दे दी थी, पर दुश्मन की बर्बरता से बचने के लिए तीसरी चाहिए थी"

टिपनिस के मुताबिक़, "फाइटर जेट से इजेक्ट करने के बाद पाकिस्तान ने स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को बंदी बना लिया था."

भारत के आधिकारिक पोस्टमॉर्टम के मुताबिक, ज़मीन पर उतरने के बाद पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें गोलियां मारी थीं. यह कारगिल युद्ध में हुई घटनाओं में सबसे दर्दनाक था.

कोई भी वेब सिरीज़ पूरी तरह से इतिहास की किताब नहीं हो सकती. उसे दर्शकों को बांधे रखने के लिए कुछ नाटकीयता, कुछ भावनाएँ और कुछ समय के हिसाब से तुलनात्मक रूप में दिखाना पड़ता है. ऑपरेशन सफ़ेद सागर वेब सिरीज में उन पायलटों, उन विमानों और उन घटनाओं को दोबारा विमर्श में ला दिया है, जिनकी चर्चा सिर्फ़ फाइलों या मिलिट्री जर्नल्स में ही होती थी.

कारगिल में क्या हुआ था?

मई 1999 में कारगिल की पहाड़ियों पर भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई हुई थी. इस लड़ाई की शुरुआत तब हुई थी जब पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की ऊँची पहाड़ियों पर घुसपैठ करके अपने ठिकाने बना लिए थे.

ये लड़ाई क़रीब 100 किलोमीटर के दायरे में लड़ी गई जहाँ क़रीब 1700 पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा के क़रीब 8 या 9 किलोमीटर अंदर घुस आए. इस पूरे ऑपरेशन में भारत के 527 सैनिक मारे गए और 1363 जवान आहत हुए.

शुरू में भारत को अपने दो मिग विमान और हेलिकॉप्टर खोने पड़े लेकिन भारतीय वायु सेना और बोफ़ोर्स तोपों ने बार-बार और बुरी तरह से पाकिस्तानी ठिकानों को 'हिट' किया.

नसीम ज़ेहरा अपनी किताब 'फ़्रॉम कारगिल टू द कू' में लिखती हैं कि 'ये हमले इतने भयानक और सटीक थे कि उन्होंने पाकिस्तानी चौकियों का 'चूरा' बना दिया. पाकिस्तानी सैनिक बिना किसी रसद के लड़ रहे थे और बंदूक़ों का ढंग से रख-रखाव न होने की वजह से वो बस एक छड़ी बन कर रह गई थीं."

भारतीयों ने ख़ुद स्वीकार किया किया कि एक छोटे-से इलाक़े पर सैकड़ों तोपों की गोलेबारी उसी तरह थी जैसे किसी अख़रोट को किसी बड़े हथौड़े से तोड़ा जा रहा हो.' कारगिल लड़ाई में कमांडर रहे लेफ़्टिनेंट जनरल मोहिंदर पुरी का मानना है कि कारगिल में वायु सेना की सबसे बड़ी भूमिका मनोवैज्ञानिक थी. जैसे ही ऊपर से भारतीय जेटों की आवाज़ सुनाई पड़ती, पाकिस्तानी सैनिक दहल जाते और इधर-उधर भागने लगते.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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