You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
एफ़सीआरए क़ानून में संशोधनों के प्रस्ताव को अमेरिकी सांसद ने बताया 'ईसाई विरोधी', क्या है पूरा मामला?
अमेरिका के सांसद राइली मूर ने भारत के विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफ़सीआरए) के प्रस्तावित संशोधनों को ईसाइयों पर हमला बताया और इसे 'भारत और अमेरिका के रिश्तों के लिए सबसे बड़ी चिंता' बताई.
एफ़सीआरए क़ानून ग़ैर सरकारी संगठनों (एनजीओ), सिविक सोसाइटी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे को कंट्रोल करता है.
एफ़सीआरए के विवादास्पद प्रस्तावित संशोधनों पर भारत के ईसाई संगठनों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है और इसे विचार विमर्श के बाद ही पेश करने की मांग की है.
मिज़ोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात के बाद कहा कि यह संशोधित प्रस्ताव संसद में 12 अगस्त को पेश होगा.
लालदुहोमा ने संसद परिसर में पत्रकारों से कहा, "हमने नए एफ़सीआरए विधेयक को लेकर अपनी आशंकाएं गृह मंत्री के सामने रखीं. उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि यह कानून पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं होगा."
लालदुहोमा, मिजोरम कोहरान ह्रुआइतु समिति (एमकेएचसी) के अध्यक्ष जॉन रालदोसांगा और काउंसिल ऑफ चर्चेज़ इन मिजोरम (सीसीएम) के महासचिव लालहमंगाइहा ने अमित शाह को ज्ञापन सौंपा है.
इसमें कहा गया है कि विधेयक और उससे जुड़े नियम केवल भविष्य में लागू होने चाहिए.
उनका कहना था कि यदि इन्हें पूर्व प्रभाव से लागू किया गया तो इससे अनिश्चितता पैदा होगी और ईमानदारी से काम करने वाले संगठनों को पुराने प्रक्रियागत मामलों के लिए दंड का सामना करना पड़ सकता है.
एमकेएचसी और सीसीएम मिजोरम के प्रमुख चर्च संगठनों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
राइली मूर की टिप्पणी और भारत का जवाब
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने एक्स पर लिखा, "ईसाई धर्म भारत में उस समय से मौजूद है. प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद सैंट थॉमस मालाबार तट पहुंचे थे."
"लेकिन इस लंबे ईसाई इतिहास के बावजूद, भारत की संसद विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफ़सीआरए) के नियमों में ऐसे संशोधनों के लाने पर विचार कर रही है, जिससे चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं का नियंत्रण सरकार के हाथ में जा सकता है."
उन्होंने आगे लिखा, "यह साफ़तौर पर ईसाइयों के ख़िलाफ़ एक हमला है. अगर यह विधेयक इसी स्वरूप में आगे बढ़ता है, तो ये भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध में गंभीर चिंता का विषय होगा."
अमेरिकी सांसद के बयान पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "अमेरिका समेत दुनिया भर के देश अपने कानूनी ढांचे के ज़रिए संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे को रेगुलेट करते हैं."
उन्होंने कहा, "भारत में कानून बनाने की एक स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और घरेलू कानूनों को उनके सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए."
भारत में क्यों हो रहा विरोध
नए संशोधन बिल को लेकर कई ईसाई अल्पसंख्यक संगठनों ने अपनी आपत्ति ज़ाहिर की है और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिल कर अपनी आशंकाएं भी ज़ाहिर की हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ़ इंडिया (सीबीसीआई) भी अमित शाह से एफसीआरए विधेयक और उससे जुड़े अधिसूचित नियमों को वापस लेने की मांग कर चुका है. उसका कहना है कि सभी संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही नया मसौदा तैयार किया जाना चाहिए.
सीबीसीआई ने 10 जुलाई को अमित शाह को एक ज्ञापन सौंपकर प्रस्तावित विधेयक को लेकर अपनी चिंताएं भी जताई थीं.
गुरुवार को डीएमके सांसद पी विल्सन के नेतृत्व में जॉइंट एक्शन फ़ोरम ऑन माइनॉरिटीज़ के एक प्रतिनिधिमंडल ने अमित शाह से मुलाक़ात की.
विल्सन ने कहा कि उन्होंने गृह मंत्री से आग्रह किया कि या तो इस विधेयक को वापस लिया जाए या फिर इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाए.
उधर विपक्ष ने इस बिल के ख़िलाफ़ अपने विरोध को तेज़ कर दिया है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने पांच अगस्त को कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार को स्पष्ट कर दिया है कि 'पूरा विपक्ष एकजुट है और इस दमनकारी बिल को पास नहीं होने देगा.'
क्या है नया एफ़सीआरए बिल
25 मार्च 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में विदेशी अंशदान (विनियमन) (संशोधन) विधेयक 2026 पेश किया.
एफ़सीआरए (संशोधन) बिल को लेकर खासा विवाद रहा है क्योंकि विपक्ष और कई एनजीओ संस्थाओं का कहना है कि इसके कुछ प्रावधानों के तहत केंद्र के पास काफ़ी पावर जा सकती है.
साथ ही इससे अल्पसंख्यकों के लिए चलाए जा रहे संस्थानों पर संभावित कार्रवाई का रास्ता इससे खुल सकता है. विपक्षी दलों का कहना था कि इससे केंद्र सरकार को असीमित अधिकार मिल जाएंगे. उस समय केंद्र सरकार ने इस बिल को रोक लिया था.
लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि मॉनसून सत्र में मोदी सरकार नए संशोधन के साथ एफ़सीआरए 2026 बिल फिर से पेश कर सकती है.
और अब मिज़ोरम के मुख्यमंत्री ने जानकारी दी है कि यह विधेयक 12 अगस्त को संसद में पेश होगा.
लेकिन जब ये बिल पहली बार बजट सत्र के दौरान लाया गया था तो केरल सहित देश के कई हिस्सों में ईसाई संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था.
उस वक्त संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि ये विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करने के उद्देश्य से लाया गया है और इसका किसी भी धर्म को निशाना बनाने का कोई इरादा नहीं है.
केरल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ईसाई समुदाय को भरोसा दिलाते हुए कहा था कि उनकी सरकार कभी भी ईसाई समुदाय के हितों के ख़िलाफ़ काम नहीं करेगी.
पीएम मोदी ने आरोप लगाया था कि विपक्ष एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों को लेकर झूठ फैला रहे हैं.
विधेयक के "स्टेटमेंट ऑफ़ ऑब्जेक्ट्स एंड रीज़न्स" सेक्शन में कहा गया है कि यह संशोधन विदेशी चंदे और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ी कानूनी और प्रशासनिक कमियों को दूर करने के लिए लाया जा रहा है.
ख़ास तौर पर उन मामलों में, जहां किसी संस्था का एफ़सीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हो गया हो, कंपनी ने ख़ुद रजिस्ट्रेशन वापस कर दिया हो या वह संस्था बंद हो गई हो.
मौजूदा क़ानून में यह बताया गया है कि ऐसी स्थिति में विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों का नियंत्रण किसके पास जाएगा. लेकिन इन संपत्तियों की देखरेख कौन करेगा, उनका आगे इस्तेमाल कैसे होगा और ऐसे विवादों को कैसे सुलझाया जाएगा, इसके लिए कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है.
सरकार का कहना है कि इससे क़ानून के दुरुपयोग की आशंका बढ़ सकती है.
प्रस्तावित संशोधन लागू होने पर क्या होगा
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, प्रस्तावित संशोधन में यह प्रावधान है कि संस्थाओं को समय-समय पर अपना एफ़सीआरए रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराना होगा.
अगर कोई संस्था समय पर रिन्यूअल के लिए आवेदन नहीं करती या उसका आवेदन ख़ारिज हो जाता है, तो उसका रजिस्ट्रेशन ख़त्म हो जाएगा.
प्रस्तावित संशोधन के तहत, जिन संस्थाओं का एफ़सीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, उनकी संपत्तियों पर नियंत्रण रखने वाली सरकारी अथॉरिटी की शक्तियां बढ़ाई जाएंगी.
पीआरएस के मुताबिक़, इसके लिए विधेयक में एक नया चैप्टर III-A जोड़ा गया है. इसके तहत केंद्र सरकार एक प्राधिकरण नियुक्त करेगी. यह प्राधिकरण ऐसी संपत्तियों की देखरेख और प्रबंधन करेगा और तय करेगा कि उनका इस्तेमाल कैसे किया जाए.
विदेशी चंदे से पूरी या आंशिक रूप से ख़रीदी गई संपत्तियों का प्रबंधन भी यही प्राधिकरण करेगा. इन संपत्तियों की देखरेख के लिए विदेशी चंदे की बची हुई राशि का भी इस्तेमाल किया जा सकेगा.
अगर बाद में संस्था को एफ़सीआरए रजिस्ट्रेशन दोबारा मिल जाता है या उसका रिन्यूअल हो जाता है, तो बचा हुआ विदेशी चंदा संस्था को लौटा दिया जाएगा. लेकिन अगर तय समय के भीतर ऐसा नहीं होता या संस्था बंद हो जाती है, तो उसकी संपत्तियां और फंड हमेशा के लिए इस प्राधिकरण के पास चले जाएंगे.
संशोधन में यह भी कहा गया है कि अगर किसी संस्था का एफ़सीआरए रजिस्ट्रेशन ख़त्म हो जाता है, तो दोबारा रजिस्ट्रेशन मिलने तक वह न तो विदेशी चंदा ले सकेगी और न ही उसका इस्तेमाल कर सकेगी.
इस प्राधिकरण के पास मौजूद संपत्तियों का इस्तेमाल जनहित के कामों के लिए किया जा सकेगा. इन्हें केंद्र या राज्य सरकार के मंत्रालयों, विभागों या सरकारी एजेंसियों को भी दिया जा सकता है.
ज़रूरत पड़ने पर इन संपत्तियों को बेचा भी जा सकेगा. संपत्ति बेचने से मिलने वाला पैसा और विदेशी चंदे की बची हुई राशि भारत की संचित निधि में जमा होगी.
नामित प्राधिकरण को यह अधिकार भी होगा कि वह उसके पास आई किसी ज़मीन या मकान जैसी अचल संपत्ति को बेच सके.
वह ख़रीदार को बिक्री का सर्टिफ़िकेट देगा. इससे ख़रीदार को उस संपत्ति का पूरा मालिकाना हक़ मिल जाएगा और वह अपने नाम पर उसका रजिस्ट्रेशन करा सकेगा.
इसके लिए यह ज़रूरी नहीं होगा कि ख़रीदार के पास पहले के मालिकाना दस्तावेज़ हों. चूंकि बिक्री सरकारी प्राधिकरण करेगा, इसलिए मालिकाना हक़ के मूल दस्तावेज़ नहीं होने पर भी ख़रीदार को दिक्कत नहीं होगी.
इतना ही नहीं, किसी सिविल कोर्ट, ट्राइब्यूनल या अन्य प्राधिकरण के संपत्ति के ट्रांसफ़र, कुर्की या ज़ब्ती से जुड़े आदेश भी तब तक लागू नहीं होंगे, जब तक क़ानून में इसका विशेष प्रावधान न हो.
यानी इन मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत कम होगी.
एफ़सीआरए 2010 के तहत पहले से ही चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों, जजों, सांसदों-विधायकों और ख़बर छापने वालों सहित कुछ लोगों को विदेशी चंदा लेने की अनुमति नहीं है.
बाद के संशोधनों में समाचार और समसामयिक कार्यक्रम बनाने या प्रसारित करने वाली संस्थाओं और कंपनियों को भी इसमें शामिल किया गया, नए विधेयक में ये प्रतिबंध ऐसे काम से जुड़े व्यक्तिगत लोगों पर भी लागू होगा.
हालांकि, विधेयक में एक राहत भी दी गई है.
पीआरएस के मुताबिक क़ानून का उल्लंघन करने पर अधिकतम सज़ा पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव है. साथ ही, अगर कोई व्यक्ति नामित प्राधिकरण के फैसले से असंतुष्ट है, तो वह 90 दिनों के भीतर ज़िला न्यायाधीश की अदालत में अपील कर सकता है.
प्रस्तावित कानून के तहत, विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों के संबंध में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले संस्थाओं को केंद्र सरकार की मंज़ूरी लेनी होगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.