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पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के चुनावों का बहिष्कार क्यों कर रही इमरान ख़ान की पार्टी?
- Author, असद सोहैब
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) ने जम्मू-कश्मीर संयुक्त लोक कार्रवाई समिति (जेएएसी) के साथ एकजुटता दिखाते हुए चुनावों के सशर्त बहिष्कार की घोषणा की है.
ये संगठन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में विरोध प्रदर्शन कर रहा है.
पीटीआई के मुताबिक़, कश्मीर के राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्री सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी ने कहा है, "हम चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे, चुनाव नहीं लड़ेंगे और संयुक्त कार्रवाई समिति की वैध और संवैधानिक मांगों को पूरा किए जाने तक अपनी जनता के साथ खड़े रहेंगे."
उन्होंने कहा, "इस समय हमारा प्यारा कश्मीर जल रहा है. रावलकोट और कई अन्य ज़िलों सहित हज़ारों नागरिक अपनी जायज मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं, लेकिन सरकार ने बातचीत के बजाय अंधाधुंध बल प्रयोग का रास्ता चुना है, जिसकी वजह से कुछ पुलिसकर्मियों सहित कई अनमोल जानें गई हैं.''
गौरतलब है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में चुनाव 27 जुलाई को हो रहे हैं, जिसके लिए राजनीतिक दलों ने अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया है.
2021 में, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ 26 सीटों के साथ सत्ता में आई और नौ निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन से सरकार बनाई.
उस समय, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की सरकार संघीय सरकार में भी सत्ता में थी.
लेकिन बाद में, पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर की असेंबली में पीटीआई का विभाजन हो गया.
पीटीआई के पहले प्रधानमंत्री अब्दुल कय्यूम नियाज़ी को अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से पद से हटा दिया गया, जबकि चौधरी तनवीर इलियास को अदालत के आदेश के कारण अपना पद गंवाना पड़ा.
'हर चुनाव से पहले विवाद पैदा करना एक नाकाम रणनीति'
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के अध्यक्ष बैरिस्टर गौहर ख़ान का कहना है कि इस फ़ैसले के बाद पीटीआई ने टिकट जारी करने की प्रक्रिया रोक दी.
गौहर ख़ान ने कहा कि चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें लोग निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी तरीकों से अपनी पसंद के वोटों का उपयोग करके अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं, लेकिन स्थिति इसके विपरीत है.
उन्होंने कहा कि हम यह आश्वासन देते हैं कि 'हम ख़ान साहब (इमरान ख़ान) की विचारधारा के अनुसार और आपसी परामर्श के माध्यम से देश, राष्ट्र और लोकतंत्र के हित में हर फ़ैसला लेते हैं.''
गौरतलब है कि संयुक्त कार्रवाई समिति ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के रावलकोट शहर के पास धरना प्रदर्शन किया है, जबकि कुछ दिन पहले सुरक्षा एजेंसियों ने संयुक्त कार्रवाई समिति के नेता शौकत नवाज़ मीर को गिरफ्तार भी किया था.
प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की असेंबली में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटें समाप्त की जाएं.
कश्मीर सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि इन 12 शरणार्थी सीटों पर कोई समझौता नहीं होगा.
'पीटीआई के लिए अब कोई रास्ता नहीं बचा है'
कश्मीर चुनावों का बहिष्कार करने की पीटीआई की घोषणा पर भी सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है, वहीं पीएमएल-एन सरकार ने भी पीटीआई के इस फ़ैसले की आलोचना की है.
पीएमएल-एन नेता और असेंबली सदस्य तारिक फ़ज़ल चौधरी का कहना है कि पीटीआई का चुनाव से भागने का फ़ैसला सैद्धांतिक राजनीति का संकेत नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक कमजोरी, जनसमर्थन की कमी और चुनावी मैदान से भागने का स्पष्ट प्रमाण है.
उन्होंने कहा कि जो पार्टी लंबे समय से खुद को जनता की सबसे बड़ी प्रतिनिधि पार्टी के रूप में पेश करती रही है, वह आज जनता के फ़ैसले का सामना करने से बचने के लिए नए-नए बहाने बना रही है.
तारिक फ़ज़ल चौधरी ने कहा, "अगर वे सचमुच जनता के अधिकारों और लोकतंत्र में विश्वास रखते, तो मैदान छोड़ने के बजाय जनता के पास जाते, वोट मांगते और बैलेट के जरिये अपना पक्ष रखते. हर चुनाव से पहले विवाद खड़ा करना, संस्थानों पर आरोप लगाना और फिर चुनावी प्रक्रिया से पीछे हट जाना एक पुरानी और असफल राजनीतिक रणनीति बन गई है.''
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक मुजीब-उर-रहमान शमी का कहना है कि तहरीक-ए-इंसाफ़ की पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में कोई पंजीकृत पार्टी नहीं है.
इसलिए, चाहे वह चुनाव में भाग ले या न ले, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के उच्च न्यायालय ने पीटीआई को पंजीकृत करने और चुनाव चिन्ह आवंटित करने का आदेश दिया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस फ़ैसले को निलंबित कर दिया था.
उन्होंने कहा, ''पीटीआई के लिए कोई रास्ता नहीं है, जिस तरह गिलगित-बाल्टिस्तान में इसका कोई अस्तित्व ही नहीं था, उसी तरह पाकिस्तान में भी चुनावी राजनीति के दरवाजे इसके लिए बंद हैं, और कश्मीर में भी चुनावी प्रक्रिया में प्रवेश करने का इसके पास कोई रास्ता नहीं है."
उन्होंने कहा कि पीटीआई समर्थक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन अतीत में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में यह देखा गया है कि वहां की असेंबली के सदस्य अपनी निष्ठा बदलते रहते हैं.
पीटीआई की अनुपस्थिति और संयुक्त कार्रवाई समिति के विरोध के कारण चुनावों की विश्वसनीयता के बारे में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में, मुजीब-उर-रहमान शमी ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इससे चुनाव प्रक्रिया में कोई बाधा आएगी.
मुजीब-उर-रहमान ने कहा कि उन्हें लगता है कि बड़ी संख्या में लोग अभी भी मतदान करने के लिए बाहर आएंगे और इससे एक ऐसी सभा का निर्माण होगा जिसे हम बिना चुनी हुई सभा नहीं कह पाएंगे.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजनीतिक स्थिति पर क़रीब से नज़र रखने वाले पत्रकार दानिश इरशाद का कहना है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि जम्मू और कश्मीर संयुक्त कार्रवाई समिति आंदोलन ने पारंपरिक राजनीतिक दलों और जनता के बीच खाई पैदा कर दी है.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पीटीआई द्वारा चुनावों का बहिष्कार निश्चित रूप से चुनावों की विश्वसनीयता पर कुछ हद तक सवाल उठाएगा, क्योंकि देश की एक प्रमुख पार्टी ने चुनावी प्रक्रिया में अविश्वास व्यक्त किया है.
हालांकि, उनके अनुसार, यह भी एक तथ्य है कि वर्तमान में, कश्मीर में पीटीआई के बहुत कम उम्मीदवार ऐसे हैं जिन्हें बड़ी संख्या में वोट मिले हैं, और उनमें से शायद ही किसी के पास चुनाव जीतने का मौका है.
उन्होंने कहा कि जहां तक किसी भी पार्टी का सवाल है, यह कहा जा सकता है कि पीटीआई के वोट खो सकते हैं या कुछ हद तक किसी स्वतंत्र उम्मीदवार को जा सकते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से केवल पीएमएल-एन और पीपीपी को ही फ़ायदा होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.